भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 363

पञ्चषष्टितमोऽध्यायः

(देहगतरोगाणां चिकित्सा)

अथ भेदान् प्रवक्ष्यामि चाङ्गप्रत्यङ्गयोगजान्।
उभयस्यार्थविन्मन्त्री योन्यां बीजेन घातयेत् ॥१॥
बीजस्य चोद्भवत्वाय व्याधयोऽन्यान्यघातिनाम्।
योनिस्थं बीजयोगेन स्थानस्तम्भं विनिर्दिशेत् ॥२॥

तदनन्तर अंग तथा प्रत्यङ्ग के योगजात भेदों को कहूँगा। अंग तथा प्रत्यङ्ग के अर्थ को जानने वाला मन्त्री योनि तथा बीज द्वारा आघात करे। बीज का उद्भव ही व्याधि का अन्तिम विनाशक अर्थात् रोग का अन्त करने वाला है। बीजयोग द्वारा योनिस्थ स्थानस्तम्भ का निर्देश करे।।१-२।।

नेत्रयोः श्रवणं पीतं मुखे सिन्दूरवर्णकम्।
बाह्वंसयोश्च हरितमुदरे कृष्णमेव च ॥३॥
गुदशिश्ने विचित्रं तु नीलचित्रं तु जङ्घयोः।
चरणे कुक्कुटं युञ्ज्याद्वलिं माल्यं च सर्वतः ॥४॥

नेत्रद्वय तथा श्रवण में पीत वर्ण, मुख में सिन्दूर वर्ण, बाहु तथा स्कन्धद्वय में हरित् वर्ण, उदर में कृष्ण वर्ण, गुदा तथा शिश्न में विचित्र वर्ण, जङ्घाओं में नील चित्र, चरणों में कुक्कुट वर्ण तथा समस्त स्थान को बलि तथा माला द्वारा युक्त करे।।३-४।।

स्वस्थाने पूजयेत् तज्ज्ञो विपरीतेन नाशयेत्।
न नश्येत यदा व्याधिः स्नेहाहारेण योजितः ॥५॥
निग्रहस्तस्य वै कार्यः शारेण मन्त्रिणा तदा।
कीलयित्वा तु वै तं च योनिस्थं वर्णजैर्दृढम् ॥६॥

तत्त्वज्ञ जन स्वस्थान में पूजन करे। विपरीत का विनाश करे। स्नेहाहार द्वारा युक्त करने पर भी यदि व्याधि का विनाश न हो, तब मन्त्री 'शार' (?अस्त्र) द्वारा उसका निग्रह करे। योनिस्थ (व्याधि का) वर्णजात द्वारा दृढ़भाव से बन्धन करना चाहिये।।५-६।।

बिल्वं शिरसि वै पुष्यात्कन्दरं वक्रनेत्रयोः।
श्रोत्रे तु यास्यकं कीलं विन्यसेदश्मकन्तु वै ॥७॥
शाकजं वक्षसि प्रोक्तं बादरं पृष्ठ एव च।
उदरे च तथा शिग्रुं चन्दनं शिश्नजानुनी ॥८॥
सुरदारुमधःकाये वैतसं चरणे स्मृतम्।
प्रतिस्थाने न्यसेत् कीलं सर्वस्थानेषु मन्त्रवित् ॥९॥