भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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३४८ || श्रीसाम्बपुराणम्

को) प्रतिलोम द्वारा युक्त करे। इससे तत्क्षण ही साधक इन्द्र, ब्रह्मादि प्रमुख का भी विनाश कर सकता है॥२३-२५॥

आपत्सु योजयेन्मन्त्री यदा संशयितो भवेत्।
शरीरा मानसाश्चैव उपसर्गास्तु कीर्तिता ॥२६॥

जब संशयापन्न हो तब आपत्ति काल में साधक यह सब क्रिया करे। उपसर्ग दो प्रकार का मानसिक एवं शारीरिक कहा गया है॥२६॥

शारीरा व्याधयो ज्ञेया मानसा बहु विस्तराः।
स्त्रीकृत्वेवं त्यजैश्चैव बन्धुमित्रपुरःसरैः ॥२७॥
पीड्यते मन्त्रिणो ह्येते चोपसर्गैः सुदारुणैः।
सिद्धवाक्यमुपेतस्तु मन्त्रहोमपुरस्कृतः ॥२८॥
असंदेहात्तु सिद्ध्यन्ति बुद्ध्या योगाः सुमन्त्रिणः।
स्त्रीलोलास्तु न सिद्ध्यन्ति तथा चार्थविचिन्तकाः ॥२९॥

शारीरिक उपसर्ग व्याधियों को जानना चाहिये। मानसिक अनेक प्रकार के होते हैं। स्त्री लोगों को उपलक्ष्य करके ऐसे बन्धु-मित्र प्रभृति द्वारा किये (कर्तृक) सुदारुण उपसर्गों से साधक पीड़ित हो जाते हैं। सिद्ध वाक्य (उपदेश) प्राप्त करके मन्त्र, होम प्रभृति द्वारा मन्त्रज्ञ निःसंदेह सिद्धि प्राप्त करते हैं। जो स्त्रीलोलुप तथा स्वार्थी होते हैं, उनको सिद्धि नहीं प्राप्त होती॥२७-२९॥

स्त्रीभार्याशूद्रभार्यायां तथान्यासु च संरता।
क्रियालोपी चानुरोधी व्यसनी तृष्णया हतः ॥३०॥

स्त्रीगण, भार्या, शूद्र की भार्या अथवा अन्य स्त्री में जो आसक्त हैं, उनका क्रियालोप हो जाता है। जो अन्य से अनुरोध करते हैं, व्यसनी हैं, तृष्णा से आक्रान्त हैं—ऐसे लोग अग्राह्य हैं। विधानतः ये सभी उपसर्गयुक्त हैं॥३०॥

अग्राह्या मन्त्रिणो ह्येते विधाने ह्युपसर्गिणः।
आचार्ये चातिभक्तश्च तपस्वी च जितेन्द्रियः।
घातयेत्सर्वरोगांश्च बुद्ध्वा ज्ञानं सविस्तरम् ॥३१॥

इति श्रीसाम्बपुराणे मारणाभिचारे चतुःषष्टितमेऽध्याये एकादशं पटलम्

जो आचार्य के प्रति भक्तिमान हैं, तपस्वी तथा जितेन्द्रिय हैं, वे सविस्तार ज्ञान प्राप्त करते हैं एवं समस्त रोगों का विनाश करते हैं॥३१॥

श्री साम्बपुराणोक्त चौंसठवें अध्याय का एकादश पटल समाप्त