साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 361, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुःषष्टितमोऽध्यायः ३४७
हाथ में स्रुवा लेकर दक्षिण की ओर मुख करके खड़ा हो मन्त्रज्ञ साधक क्रुद्ध होकर 'फट्' कहते हुये त्रिसन्ध्या (प्रातः-मध्याह्न-सायं) होम करे। तीन कपालों (मनुष्य की खोपड़ी) पर आरूढ़ होकर दोनों पैरों को (शत्रु की प्रतिमा) उसके पैरों पर रखे॥१४-१६॥
ऊर्ध्वं शुक्लतरूणां च समिद्भिर्जुहुयान्नरः।
खदिरै रुधिराक्तैर्वा तथा निम्बमयैरपि ॥१७॥
अन्येन तु यथोक्तेन अव्यक्तं होमयेद् बुधः।
कुर्यात्प्रकुपितो होमं यावत्क्रोधो न नश्यति ॥१८॥
कल्पोक्तमभिचारं तु कुर्यात्सिद्धार्थमात्मनः।
सिद्धिस्त्रयो दशविधा अभिचारेण मन्त्रिणाम् ॥१९॥
शत्रोर्देशपरित्यागो व्याधिरर्थविनाशनम्।
उन्मत्ततान्धता चैव तथा चैवाङ्गहीनता ॥२०॥
वधो बन्धो नृपक्रोधोऽकस्माच्चापि धनक्षयः।
प्रयातं याचितं चापि आरण्यं च त्रयोदश ॥२१॥
ऊर्ध्व शुक्ल वृक्ष के काष्ठ से होम करना चाहिये। रक्त लिप्त खैर अथवा नीम की लकड़ी के द्वारा भी होम हो सकता है। यथाविधि अन्य काष्ठ द्वारा भी पण्डित व्यक्ति अव्याहत होम कर सकते हैं। अपनी सिद्धि के लिये कल्पोक्त अभिचार करना उचित है। मन्त्रज्ञ साधक के अभिचार द्वारा सिद्धि तेरह प्रकार की है। शत्रु देश-परित्याग, व्याधि, अर्थनाश, उन्मत्तता, अन्धता, अंगहीनता, वध, बन्धन, नृपक्रोध, अकस्मात् धनक्षय, परलोक-गमन, याच्ञा वृत्ति तथा वनगमन।।१७-२१।।
आभिर्निर्मिलितो दीप्तः प्रोक्षितो विधिना पुनः।
तत्त्वेनाप्यायितश्चैव कथं मन्त्रो न सिद्ध्यति ॥२२॥
आभिचारिक शब्द का अर्थ है—आभि = विमुक्त करना, दीप्त होना। उसमें विधिपूर्वक प्रोक्षित एवं तत्त्व द्वारा आप्यायित होने पर मन्त्र क्यों सिद्ध नहीं होगा? ।।२२।।
असिद्धौ तु पुरो दण्डः स्वमन्त्रात्ताडनं भवेत्।
अभिवार्य परं गच्छन् करं हन्यात्तथान्तकी ॥२३॥
ततो निकृन्तप्राणोऽसौ देहमुत्सृजति क्षणात्।
विधिना द्रव्यघटने क्रोधार्तः शत्रुपीड़ितः ॥२४॥
प्रतिलोमेन युञ्जीत घातके प्राणसंयुतः।
तत्क्षणाद् घातयेत्सर्वान् सेन्द्रब्रह्मपुरस्सरान् ॥२५॥
मन्त्र असिद्ध होने पर सर्वप्रथम कर्त्तव्य है उसमें स्वमन्त्र से ताड़ना। विनाशकारी अन्य को बाधा देने के लिये शत्रु (प्रतिमा) का हस्तच्छेदन करे। तदनन्तर शत्रु निष्प्राण होकर देहत्याग करेगा। यथाविधि द्रव्यसंग्रह होने पर शत्रुपीड़ित साधक क्रोधित होकर (पुरश्चरण