साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 364, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ें३५० || श्रीसाम्बपुराणम्
मस्तक का बिल्व से पोषण करे। मुख तथा नेत्रद्वय में कदर, कर्णों में यास्यक प्रस्तर की कील का विन्यास करे। वक्ष में शाकजात (शाक से उत्पन्न) का, पृष्ठ में कूलजात (वादर), उदर में शिग्रु (सहजन) तथा शिश्न एवं जानु में चन्दन का विन्यास करे। निम्न शरीर में देवदारु का, चरण में वैतस का तथा मन्त्रज्ञ साधक सभी स्थान में कील स्थापित करे।।७-९।।
विनाशाय विवक्ताः स्युः श्लेष्मान्तकविभीतकाः ।
तथा सहचरश्चैव कीला वै सर्वकर्मणि ॥१०॥
अथवा स्नपयेद्रक्तमावृतिश्चात्र कीलयेत् ।
ध्यायेत्तु घातकं रोगे यदिच्छेद् घातनं परम् ॥११॥
अदग्धमवतार्य्यन्तु यदा शान्तिः प्रवर्त्तते ।
हतो दावेन तेन स्याद् ब्रह्मापि यदि च स्वयम् ॥१२॥
आकृतिस्तु सदा मांसैः क्रियते विघ्नकारिणः ।
सकलस्तस्य परशुः संक्रमे नायकस्य वै ॥१३॥
विनाशार्थ श्लेष्मात्मक तथा विभीतक की लकड़ी देनी होगा। ऐसे सभी कार्य में कीलक सहचर होगा। अथवा रक्त से स्नान कराये। यहाँ आकृति कीलक होगी। रोग में घातक का ध्यान करके उसके विनाश की इच्छा करनी होगी। जब शान्ति हो जाय, तब अदग्ध अवस्था में उतर कर फेंकना होता है। उसके फल से शत्रु दावानल में पड़ जाता है, यदि ब्रह्मा भी शत्रु हों, वे भी। विघ्नकारी की मांस से आकृति बनानी होगा। नायक के संक्रम में समस्त अंश है उसका परशु (?)।।१०-१३।।
संहारं क्रमशो युञ्ज्यात्तथा मांसेन वै बुधः ।
योनिबीजविभागेन स्थानस्थानेषु सर्वतः ॥१४॥
सर्वाङ्गतरोगा हि चिकित्स्याः सर्वतोमुखाः ।
संक्रामस्तस्य वै यो हि क्रीडा संमन्त्रिणः स तु ॥१५॥
योनि तथा बीजविभाग द्वारा सभी स्थान में विज्ञ जन मांस द्वारा क्रमशः संहार करे। सर्वाङ्ग-जात रोग की सर्वतोभावेन चिकित्सा करनी चाहिये। उसका जो संक्रमण है, वह मन्त्रज्ञ साधक की क्रीड़ा है।।१४-१५।।
ये ये वै कीलकाः प्रोक्ताः समिधो पिहिता यतः ।
चतुर्माल्योपहारेण तेन तस्य चिकित्सितम् ॥१६॥
इति श्रीसाम्बपुराणे देहजातरोगाणां चिकित्सा नाम पञ्चषष्टितमेऽध्याये द्वादशं पटलम्
जिन-जिन कीलक की चर्चा की गयी है, उसे काष्ठ से आबद्ध करे। चार माल्य उपहार से उसकी चिकित्सा की जाती है।।१६।।
श्रीसाम्बपुराण देहजात रोग की चिकित्सा नामक पैंसठवें अध्याय का द्वादश पटल समाप्त