साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 365, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंषट्षष्टितमोऽध्यायः
(सर्वोपद्रवशान्तये व्रतविधिः)
सामान्यां तु यदा मन्त्री चिकित्सां सार्वलौकिकीम्।
प्रार्थितो वा नृपेन्द्रेण तथा कुर्यादिमं विधिम् ॥१॥
व्रतं पूर्वं समुद्दिष्टं नायकानान्तु शान्तये।
शान्तयेऽद्भुतहोमेन सत्वं वापि विनायकम् ॥२॥
स्वेन गात्रेण वै नश्येत् साधकः सर्वकर्मणि।
तस्माद् व्रतं तु वै कार्यं सर्वोपद्रवशान्तये ॥३॥
अन्यथा हीयते मन्त्रः स्वेन गात्रेण योजयेत्।
श्वेताम्बरधरो मन्त्री श्वेतमाल्यानुलेपनः ॥४॥
जब साधक साधारण रूप से सबकी चिकित्सा करे अथवा राजा द्वारा प्रार्थित होकर (चिकित्सा करें) तब इस विधि का पालन करे। नायक की शान्ति के लिये व्रत की कथा पहले ही कही है। भूतहोम द्वारा सत्व तथा विनायक का प्रशमन करना होगा। साधक सब कर्म में अपने गात्र द्वारा (विघ्न) नाश करे। तदनन्तर समस्त उपद्रव की शान्ति-हेतु व्रत-पालन करे। अन्यथा मन्त्र क्षयीभूत होगा। इसलिये अपनी गात्रयोजना करे। साधक श्वेत वस्त्र धारण करके श्वेत माला द्वारा शोभित हो जाय।।१-४।।
जितेन्द्रियः प्रशान्तात्मा काष्ठमौनी सुमन्त्रितः।
शुद्धवर्णां समादाय पत्नीं शुद्धकुलात्मजाम् ॥५॥
दशाहन्तु तया सार्धं ब्रह्मचारीव्रतं चरेत्।
दासविभ्रमयोगेन न कुर्यादात्मनः कृतम् ॥६॥
जितेन्द्रिय, प्रशामात्मा, काष्ठमौनी संयत होकर शुद्धवर्ण ब्राह्मण शुद्धकुलोत्पन्ना पत्नी लाकर उसके साथ ब्रह्मचर्य व्रत के साथ दस दिन रहे। दास-विभ्रम योग से जो स्वयं करणीय है, ऐसा कुछ न करे।।५-६।।
अतीते दशरात्रे तु द्वितीयां क्षत्रियां तनुम्।
सर्वपीतोपहारेण शृङ्गारैः कृतभूषणः ॥७॥
सुमना दृढचित्तश्च दशाहं क्षत्रियापतिः।
वैश्यो गुणसमायुक्तः पीतवस्त्रानुलेपनः ॥८॥
दृढचित्तश्चरेन् मन्त्री दशाहं वैश्यगोचरः।
कृष्णवस्त्रोपहारेण कृष्णवर्णान् तु योजयेत् ॥९॥