भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 366

३५२ श्रीसाम्बपुराणम्

दश रात्रि बीतने पर द्वितीय (दूसरी) क्षत्रिय कन्या लाकर (पत्नीरूप) समस्त पीत वर्ण के उपहार के साथ श्रृङ्गार से भूषित करके शोभन मनस्क तथा दृढ़ चित्त होकर १० दिन क्षत्रियपति होकर रहे। इसी प्रकार वैश्य गुणयुक्त (वैश्यकन्या को पत्नीरूपा करके) पीत वस्त्र तथा अनुलेपनादि ग्रहण करके दृढ़ चित्त होकर उसके साथ दस दिन विचरण करे। इसी प्रकार दस दिन कृष्णवर्णा (शूद्रा) को (पत्नी बनाकर) कृष्ण वर्णात्मक वस्त्रादि से विभूषित करके दृढ़ हो, उसके साथ रहे।।७-९।।

गणिकां सर्ववर्णां वै पञ्चमं सार्ववर्णिकम्।
कृत्वा व्रतसमाप्तिं तु योनिचक्रं ततो यजेत् ॥१०॥

सर्ववर्णमयी गणिका के साथ (यह पञ्चम सार्ववर्णिक है) व्रत समापन करके योनि-चक्र का यजन करे।।१०।।

तत्राभिषिच्य चात्मानं हन्याद्रोगांस्त्वशेषतः।
यावत्कालं व्रतं युञ्ज्यात्तावत्कालं यजेन्नरः ॥११॥
अहस्तु पूजयेद् देवं निशायां तु न पूजयेत्।
एतद् व्रतं त्वया प्रोक्तं मन्त्रिणां सिद्धिदं परम् ॥१२॥

वहाँ स्वयं को अभिषिक्त करे। निःशेष रूप से रोग का विनाश करे। जब तक व्रतानुष्ठान करना है, तब तक कालयोजन करना चाहिये। दिन में देवपूजन करे, रात्रि में न करे। इस प्रकार यह जो व्रत तुमसे कहा है, वह मन्त्रज्ञ साधक के लिये परम सिद्धि देने वाला है।।११-१२।।

सर्वसिद्धिपरो मन्त्री व्रतमेतत्समाचरेत्।
न पाणिपादचपलो न नेत्रचपलो भवेत् ॥१३॥
न तु वाक् चपलश्चैव लघ्वाहारो जितेन्द्रियः।
साधयेत् प्रयतो नित्यमुपसर्गान् निजोद्धरेत्।
हन्तारः सर्वविघ्नानां नरा व्रतपरास्तु ये ॥१४॥

इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे सर्वोपद्रवशान्तये व्रतविधिर्नाम षट्षष्टितमेऽध्याये त्रयोदशं पटलम्

सर्वचिकित्सा-परायण मन्त्रज्ञ इस व्रत का आचरण करे। हाथ-पैर न हिलाये, नेत्र चालित न करे तथा वाक्य की चञ्चलता भी न करे। स्वल्पाहार तथा जितेन्द्रिय होकर सयत्न नित्य साधन करे तथा उपसर्गों का विनाश करे। इससे व्रतपरायण व्यक्ति के समस्त विघ्नों का विनाश होता है।।१३-१४।।

श्री साम्बपुराणान्तर्गत ज्ञानोत्तर व्रतविधान नामक छियासठवें अध्याय का त्रयोदश पटल समाप्त

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