भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 367

सप्तषष्टितमोऽध्यायः

(वेधयोगवर्णनम्)

एतद् व्रतं महापुण्यं चरेदुत्तरसाधने।
अर्द्धन्त्वधमयोगे तु पादमेकं तथाधमे ॥१॥
यदुक्तं साधने तस्मिन् पुराकल्पे महौजसा।
वेधयोगान् प्रवक्ष्यामि दिव्यभौमार्थसाधकान् ॥२॥
सत्त्वं रजस्तमश्चैव तिस्रो वै मन्त्रयोनयः।
ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रस्ते वै साध्यास्तु मन्त्रिणः ॥३॥

उत्तर-साधन में महापूजा तथा व्रतानुष्ठान करना चाहिये। अधम योग में अर्ध तथा अधमाधम में एकपाद। पूजाकल्प में उस साधन के विषय में महान् तेजस्वी ने जैसा कहा है, दिव्य तथा भौम प्रयोजन के साधकों के लिये वेधयोग का वर्णन मैं करता हूँ। सत्व, रज तथा तम—ये तीनों मन्त्रयोनि हैं। ब्रह्मा (रजोगुण में), विष्णु (सत्वगुण में) तथा रुद्र (तमोगुण में) साधकों के साध्य हैं॥१-३॥

अर्चायां कामसङ्कल्पश्चाग्निकार्ये यथा पुनः।
नारी दुःखप्रकृत्यां च लिङ्गे वा सार्वकामिके ॥४॥
चतुर्भुजा भवेत् सा हि नरमाक्रम्य संस्थिता।
खट्वाङ्गं दक्षिणे तस्याः कपालं वामके करे ॥५॥
चक्रं वरः क्रमाद्धस्ते अर्धा स्याद्दिव्यमानुषैः।
क्रूरा दन्तांश्च विन्यस्य तेजोराशिपुटानि षट् ॥६॥

अर्चनीय प्रतिमा में यथाभिलषित संकल्प, अग्निकार्य (होम), नारी दुःख प्रकृति में (?) अथवा सार्वकामिक लिङ्ग में साधन करे। वह नारी चतुर्भुजा, महादेव पर संस्थिता, उनके दाहिने हाथ में खट्वाङ्ग तथा बाँयें हाथ में कपाल है। अन्य हस्तद्वय में क्रमशः चक्र तथा वरमुद्रा है। दिव्य मनुष्यमाला से (कपालमाला) शोभित हैं, उससे उनका अर्द्धांग ढका है। क्रूर दन्तों को विन्यस्त करके छः तेजोराशिपुट का विस्तार हो रहा है॥४-६॥

क्रमान् मन्त्रपदं चैकं शिष्टं तस्यैव सम्पुटम्।
जपित्वा क्रमयोगेन लक्षमन्त्रान् सुसंयतः ॥७॥
व्रतं त्वनन्तरं कार्यं कामं तत्साधकेन तु।
पासं गुग्गुलुहोमः स्याच्छागमांसेन योजितः ॥८॥
त्रिसंध्यं ताडनं प्रीत्या होमश्चाथमनन्तरम्।
प्रतिसन्ध्यं सहस्रं तु यावन्मासो विनिर्गतः ॥९॥