भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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३५४ श्रीसाम्बपुराणम्

क्रम से एक मन्त्र पद है और उसका सम्पुट है शिष्ट (?)। सुसंयत होकर क्रमयोग से एक लाख मन्त्र-जप करना चाहिये। तदनन्तर साधक यथाभिलषित व्रत करे। एक मास पर्यन्त बकरे के मांसयुक्त गुग्गुलु से होम करे। प्रीतिपूर्वक तीन सन्ध्या ताड़न, तदनन्तर यह होम करे। प्रतिसन्ध्या १००० होम करे जब तक १ मास पूर्ण न हो जाय॥७-९॥

एवं संसाधितो मन्त्रः कामदस्तु सदा भवेत्।
तन्त्रज्ञः साधयेदेवमथवा मन्त्रवित्तमः ॥१०॥

इस प्रकार का मन्त्र-साधन समस्त कामना पूर्ण करता है। तन्त्रज्ञ साधक इस प्रकार साधन करे अथवा मन्त्रज्ञों में से श्रेष्ठ व्यक्ति साधन करे॥१०॥

सुसहायः प्रसन्नात्मा नित्ययुक्तश्च सात्त्विकः।
मोहादारभते यस्तु साधनं वेधवर्जितः ॥११॥
कृत्या भवति वै सा हि देवता हीनकर्मणि।
विपिने काष्ठमौनी स्यादथवा साधकैर्वदेत् ॥१२॥
समयज्ञैस्ततो विप्रैरन्यथा हीनसाधनः।
यादृशः साधको ज्ञेयः सहायस्तस्य तादृशः ॥१३॥

उपयुक्त सहायक के साथ प्रसन्न अन्तःकरण से नित्ययुक्त सात्विक साधक साधन करे। जो वेधवर्द्धित होकर मोह के कारण साधन प्रारम्भ करते हैं, देवताहीन कर्म उसके लिये अनिष्ट-कारिणी हो जाते हैं। वन में काष्ठमौनी हो अथवा समान याज्ञिक ब्राह्मण साधकों के साथ ही वार्त्ता करे। अन्यथा वह हीन साधन होगा। उसका सहायक भी ऐसा ही होगा॥११-१३॥

तत्त्वदृष्टेन योगेन साध्यं मन्त्री समारभेत्।
तपस्वी च जितात्मा च नित्यभक्तो महेश्वरे ॥१४॥
एवंविधस्तु वै मन्त्री काले यो मृत्युमाप्नुयात्।
अनन्तास्तस्य वै लोका इति मन्त्रव्यवस्थितिः ॥१५॥

तत्त्वदृष्ट योग द्वारा साधक साधन प्रारम्भ करे। वह मननशील साधक तेजस्वी हो, जितात्मा तथा महेश्वर के प्रति भक्तियुक्त हो। ऐसा साधक पूर्ण परिणत काल में (पूर्णायु में) मृत्यु को प्राप्त होता है। उसे अनन्त लोक मिलता है। यही मन्त्र की व्यवस्था है॥१४-१५॥

पुण्यात्मा सुकृते स्थाने राजा वा सार्वभौमिकः।
विद्या सिद्धा भवन्त्येते साधकास्तु महीतले ॥१६॥

इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे वेधयोगवर्णनं नाम सप्तषष्टितमेऽध्याये चतुर्दशं पटलम्

साधक एक पृथ्वी पर (किसी एक लोक में) पुण्यवान् व्यक्ति के गृह में जन्म लेकर अथवा सार्वभौम राजा के घर में जन्म लेकर विद्यासिद्ध होता है॥१६॥

श्रीसाम्बपुराणान्तर्गत ज्ञानोत्तर वेधयोग वर्णननामक सड़सठवें अध्याय का चौदहवाँ पटल समाप्त