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साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

षट्षष्टितमोऽध्यायः

(सर्वोपद्रवशान्तये व्रतविधिः)

सामान्यां तु यदा मन्त्री चिकित्सां सार्वलौकिकीम्।
प्रार्थितो वा नृपेन्द्रेण तथा कुर्यादिमं विधिम् ॥१॥
व्रतं पूर्वं समुद्दिष्टं नायकानान्तु शान्तये।
शान्तयेऽद्भुतहोमेन सत्वं वापि विनायकम् ॥२॥
स्वेन गात्रेण वै नश्येत् साधकः सर्वकर्मणि।
तस्माद् व्रतं तु वै कार्यं सर्वोपद्रवशान्तये ॥३॥
अन्यथा हीयते मन्त्रः स्वेन गात्रेण योजयेत्।
श्वेताम्बरधरो मन्त्री श्वेतमाल्यानुलेपनः ॥४॥

जब साधक साधारण रूप से सबकी चिकित्सा करे अथवा राजा द्वारा प्रार्थित होकर (चिकित्सा करें) तब इस विधि का पालन करे। नायक की शान्ति के लिये व्रत की कथा पहले ही कही है। भूतहोम द्वारा सत्व तथा विनायक का प्रशमन करना होगा। साधक सब कर्म में अपने गात्र द्वारा (विघ्न) नाश करे। तदनन्तर समस्त उपद्रव की शान्ति-हेतु व्रत-पालन करे। अन्यथा मन्त्र क्षयीभूत होगा। इसलिये अपनी गात्रयोजना करे। साधक श्वेत वस्त्र धारण करके श्वेत माला द्वारा शोभित हो जाय।।१-४।।

जितेन्द्रियः प्रशान्तात्मा काष्ठमौनी सुमन्त्रितः।
शुद्धवर्णां समादाय पत्नीं शुद्धकुलात्मजाम् ॥५॥
दशाहन्तु तया सार्धं ब्रह्मचारीव्रतं चरेत्।
दासविभ्रमयोगेन न कुर्यादात्मनः कृतम् ॥६॥

जितेन्द्रिय, प्रशामात्मा, काष्ठमौनी संयत होकर शुद्धवर्ण ब्राह्मण शुद्धकुलोत्पन्ना पत्नी लाकर उसके साथ ब्रह्मचर्य व्रत के साथ दस दिन रहे। दास-विभ्रम योग से जो स्वयं करणीय है, ऐसा कुछ न करे।।५-६।।

अतीते दशरात्रे तु द्वितीयां क्षत्रियां तनुम्।
सर्वपीतोपहारेण शृङ्गारैः कृतभूषणः ॥७॥
सुमना दृढचित्तश्च दशाहं क्षत्रियापतिः।
वैश्यो गुणसमायुक्तः पीतवस्त्रानुलेपनः ॥८॥
दृढचित्तश्चरेन् मन्त्री दशाहं वैश्यगोचरः।
कृष्णवस्त्रोपहारेण कृष्णवर्णान् तु योजयेत् ॥९॥

३५२ श्रीसाम्बपुराणम्

दश रात्रि बीतने पर द्वितीय (दूसरी) क्षत्रिय कन्या लाकर (पत्नीरूप) समस्त पीत वर्ण के उपहार के साथ श्रृङ्गार से भूषित करके शोभन मनस्क तथा दृढ़ चित्त होकर १० दिन क्षत्रियपति होकर रहे। इसी प्रकार वैश्य गुणयुक्त (वैश्यकन्या को पत्नीरूपा करके) पीत वस्त्र तथा अनुलेपनादि ग्रहण करके दृढ़ चित्त होकर उसके साथ दस दिन विचरण करे। इसी प्रकार दस दिन कृष्णवर्णा (शूद्रा) को (पत्नी बनाकर) कृष्ण वर्णात्मक वस्त्रादि से विभूषित करके दृढ़ हो, उसके साथ रहे।।७-९।।

गणिकां सर्ववर्णां वै पञ्चमं सार्ववर्णिकम्।
कृत्वा व्रतसमाप्तिं तु योनिचक्रं ततो यजेत् ॥१०॥

सर्ववर्णमयी गणिका के साथ (यह पञ्चम सार्ववर्णिक है) व्रत समापन करके योनि-चक्र का यजन करे।।१०।।

तत्राभिषिच्य चात्मानं हन्याद्रोगांस्त्वशेषतः।
यावत्कालं व्रतं युञ्ज्यात्तावत्कालं यजेन्नरः ॥११॥
अहस्तु पूजयेद् देवं निशायां तु न पूजयेत्।
एतद् व्रतं त्वया प्रोक्तं मन्त्रिणां सिद्धिदं परम् ॥१२॥

वहाँ स्वयं को अभिषिक्त करे। निःशेष रूप से रोग का विनाश करे। जब तक व्रतानुष्ठान करना है, तब तक कालयोजन करना चाहिये। दिन में देवपूजन करे, रात्रि में न करे। इस प्रकार यह जो व्रत तुमसे कहा है, वह मन्त्रज्ञ साधक के लिये परम सिद्धि देने वाला है।।११-१२।।

सर्वसिद्धिपरो मन्त्री व्रतमेतत्समाचरेत्।
न पाणिपादचपलो न नेत्रचपलो भवेत् ॥१३॥
न तु वाक् चपलश्चैव लघ्वाहारो जितेन्द्रियः।
साधयेत् प्रयतो नित्यमुपसर्गान् निजोद्धरेत्।
हन्तारः सर्वविघ्नानां नरा व्रतपरास्तु ये ॥१४॥

इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे सर्वोपद्रवशान्तये व्रतविधिर्नाम षट्षष्टितमेऽध्याये त्रयोदशं पटलम्

सर्वचिकित्सा-परायण मन्त्रज्ञ इस व्रत का आचरण करे। हाथ-पैर न हिलाये, नेत्र चालित न करे तथा वाक्य की चञ्चलता भी न करे। स्वल्पाहार तथा जितेन्द्रिय होकर सयत्न नित्य साधन करे तथा उपसर्गों का विनाश करे। इससे व्रतपरायण व्यक्ति के समस्त विघ्नों का विनाश होता है।।१३-१४।।

श्री साम्बपुराणान्तर्गत ज्ञानोत्तर व्रतविधान नामक छियासठवें अध्याय का त्रयोदश पटल समाप्त

सप्तषष्टितमोऽध्यायः

(वेधयोगवर्णनम्)

एतद् व्रतं महापुण्यं चरेदुत्तरसाधने।
अर्द्धन्त्वधमयोगे तु पादमेकं तथाधमे ॥१॥
यदुक्तं साधने तस्मिन् पुराकल्पे महौजसा।
वेधयोगान् प्रवक्ष्यामि दिव्यभौमार्थसाधकान् ॥२॥
सत्त्वं रजस्तमश्चैव तिस्रो वै मन्त्रयोनयः।
ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रस्ते वै साध्यास्तु मन्त्रिणः ॥३॥

उत्तर-साधन में महापूजा तथा व्रतानुष्ठान करना चाहिये। अधम योग में अर्ध तथा अधमाधम में एकपाद। पूजाकल्प में उस साधन के विषय में महान् तेजस्वी ने जैसा कहा है, दिव्य तथा भौम प्रयोजन के साधकों के लिये वेधयोग का वर्णन मैं करता हूँ। सत्व, रज तथा तम—ये तीनों मन्त्रयोनि हैं। ब्रह्मा (रजोगुण में), विष्णु (सत्वगुण में) तथा रुद्र (तमोगुण में) साधकों के साध्य हैं॥१-३॥

अर्चायां कामसङ्कल्पश्चाग्निकार्ये यथा पुनः।
नारी दुःखप्रकृत्यां च लिङ्गे वा सार्वकामिके ॥४॥
चतुर्भुजा भवेत् सा हि नरमाक्रम्य संस्थिता।
खट्वाङ्गं दक्षिणे तस्याः कपालं वामके करे ॥५॥
चक्रं वरः क्रमाद्धस्ते अर्धा स्याद्दिव्यमानुषैः।
क्रूरा दन्तांश्च विन्यस्य तेजोराशिपुटानि षट् ॥६॥

अर्चनीय प्रतिमा में यथाभिलषित संकल्प, अग्निकार्य (होम), नारी दुःख प्रकृति में (?) अथवा सार्वकामिक लिङ्ग में साधन करे। वह नारी चतुर्भुजा, महादेव पर संस्थिता, उनके दाहिने हाथ में खट्वाङ्ग तथा बाँयें हाथ में कपाल है। अन्य हस्तद्वय में क्रमशः चक्र तथा वरमुद्रा है। दिव्य मनुष्यमाला से (कपालमाला) शोभित हैं, उससे उनका अर्द्धांग ढका है। क्रूर दन्तों को विन्यस्त करके छः तेजोराशिपुट का विस्तार हो रहा है॥४-६॥

क्रमान् मन्त्रपदं चैकं शिष्टं तस्यैव सम्पुटम्।
जपित्वा क्रमयोगेन लक्षमन्त्रान् सुसंयतः ॥७॥
व्रतं त्वनन्तरं कार्यं कामं तत्साधकेन तु।
पासं गुग्गुलुहोमः स्याच्छागमांसेन योजितः ॥८॥
त्रिसंध्यं ताडनं प्रीत्या होमश्चाथमनन्तरम्।
प्रतिसन्ध्यं सहस्रं तु यावन्मासो विनिर्गतः ॥९॥

३५४ श्रीसाम्बपुराणम्

क्रम से एक मन्त्र पद है और उसका सम्पुट है शिष्ट (?)। सुसंयत होकर क्रमयोग से एक लाख मन्त्र-जप करना चाहिये। तदनन्तर साधक यथाभिलषित व्रत करे। एक मास पर्यन्त बकरे के मांसयुक्त गुग्गुलु से होम करे। प्रीतिपूर्वक तीन सन्ध्या ताड़न, तदनन्तर यह होम करे। प्रतिसन्ध्या १००० होम करे जब तक १ मास पूर्ण न हो जाय॥७-९॥

एवं संसाधितो मन्त्रः कामदस्तु सदा भवेत्।
तन्त्रज्ञः साधयेदेवमथवा मन्त्रवित्तमः ॥१०॥

इस प्रकार का मन्त्र-साधन समस्त कामना पूर्ण करता है। तन्त्रज्ञ साधक इस प्रकार साधन करे अथवा मन्त्रज्ञों में से श्रेष्ठ व्यक्ति साधन करे॥१०॥

सुसहायः प्रसन्नात्मा नित्ययुक्तश्च सात्त्विकः।
मोहादारभते यस्तु साधनं वेधवर्जितः ॥११॥
कृत्या भवति वै सा हि देवता हीनकर्मणि।
विपिने काष्ठमौनी स्यादथवा साधकैर्वदेत् ॥१२॥
समयज्ञैस्ततो विप्रैरन्यथा हीनसाधनः।
यादृशः साधको ज्ञेयः सहायस्तस्य तादृशः ॥१३॥

उपयुक्त सहायक के साथ प्रसन्न अन्तःकरण से नित्ययुक्त सात्विक साधक साधन करे। जो वेधवर्द्धित होकर मोह के कारण साधन प्रारम्भ करते हैं, देवताहीन कर्म उसके लिये अनिष्ट-कारिणी हो जाते हैं। वन में काष्ठमौनी हो अथवा समान याज्ञिक ब्राह्मण साधकों के साथ ही वार्त्ता करे। अन्यथा वह हीन साधन होगा। उसका सहायक भी ऐसा ही होगा॥११-१३॥

तत्त्वदृष्टेन योगेन साध्यं मन्त्री समारभेत्।
तपस्वी च जितात्मा च नित्यभक्तो महेश्वरे ॥१४॥
एवंविधस्तु वै मन्त्री काले यो मृत्युमाप्नुयात्।
अनन्तास्तस्य वै लोका इति मन्त्रव्यवस्थितिः ॥१५॥

तत्त्वदृष्ट योग द्वारा साधक साधन प्रारम्भ करे। वह मननशील साधक तेजस्वी हो, जितात्मा तथा महेश्वर के प्रति भक्तियुक्त हो। ऐसा साधक पूर्ण परिणत काल में (पूर्णायु में) मृत्यु को प्राप्त होता है। उसे अनन्त लोक मिलता है। यही मन्त्र की व्यवस्था है॥१४-१५॥

पुण्यात्मा सुकृते स्थाने राजा वा सार्वभौमिकः।
विद्या सिद्धा भवन्त्येते साधकास्तु महीतले ॥१६॥

इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे वेधयोगवर्णनं नाम सप्तषष्टितमेऽध्याये चतुर्दशं पटलम्

साधक एक पृथ्वी पर (किसी एक लोक में) पुण्यवान् व्यक्ति के गृह में जन्म लेकर अथवा सार्वभौम राजा के घर में जन्म लेकर विद्यासिद्ध होता है॥१६॥

श्रीसाम्बपुराणान्तर्गत ज्ञानोत्तर वेधयोग वर्णननामक सड़सठवें अध्याय का चौदहवाँ पटल समाप्त

अष्टषष्टितमोऽध्यायः

(सर्वसामान्यसाधनम्)

साधनं संप्रवक्ष्यामि यथा सिद्ध्यन्ति साधकाः ।
वेधयोगांश्च विमलान् नानासिद्धिफलप्रदान् ॥ १॥
षाण्मासिकं तु वै योज्यं पुरश्चरणमादिशेत् ।
शाकादिना विधानेन जलैर्वापि च शोधनम् ॥ २॥
ध्यायेच्च प्रणवं पश्चात् सहस्रं शतषड्गुणम् ।
आयच्छन्न तु सम्भ्रान्तः पूर्वेणापूर्णचेतसा ॥ ३॥
शुद्धकायस्ततो मन्त्री कृत्वा वासगृहं ततः ।
तस्मिन् संस्थापयेद् देवं विधिना शास्त्रचोदितम् ॥ ४॥

जिससे साधकों को सिद्धि प्राप्त होती है, उन साधनों की कथा कहूँगा। यह निर्मल, वेधयोग्य तथा नाना सिद्धिदायिनी है। छः मास पुरश्चरण करे। शाकादि विधान द्वारा अथवा केवल जल द्वारा शोधन करे। प्रणव का ध्यान करना चाहिये। तदनन्तर छः सौ हजार जप करना चाहिये। जल्दबाजी अथवा असन्तुष्ट मन से जप कभी न करे। मननशील साधक देहशुद्धि करके निवास का गृह निश्चित करे और उस गृह में यथाशास्त्र विधान से देव-स्थापना करनी चाहिये॥१-४॥

विद्याङ्गानि त्वरिष्टानि स्वमन्त्रं विधिना क्रमात् ।
सहस्रदशपर्यायमेवैकं परिवर्त्तयेत् ॥ ५॥
ततो मन्त्रं समाधाय ईप्सितं मनसः शुभम् ।
आप्यायितुं विरक्तं च दीपितैः शास्त्रतः क्रमात् ॥ ६॥

क्रमश यथाविधि विद्याङ्ग, अरिष्टसमूह तथा अपना मन्त्र पर्याय क्रम से दस हजार जपे। तदनन्तर मन में ईप्सित मन्त्र को सम्यक् रूप से धारण करे और यथाशास्त्र आप्यायित, विरक्त तथा दीपित करे॥५-६॥

जपान्ते तु व्रतं योज्यं व्रतान्तेऽपि च साधनम् ।
अतस्तान् मण्डले योगः साध्यमन्त्रस्य साधने ॥ ७॥
प्रोक्ताः क्रमेण विधयः सर्वमन्त्रानुसारिणः ।
असिध्यमेध्यमायोज्यं कृते वा व्यञ्जनादिके ॥ ८॥

३५६ श्रीसाम्बपुराणम्

जपान्त में व्रत करना चाहिये। व्रत के पश्चात् भी साधन किया जाता है। साध्य मन्त्र के साधन के अन्त में मण्डल में योग करना चाहिये। सभी मन्त्र के अनुसार क्रमशः विधि का वर्णन किया गया। व्यञ्जनादि का योग करने से मन्त्र की असिद्धि होती है। अमेध्य युक्त होता है(?)॥७-८॥

तन्त्रोक्तं वेधमादध्याद् स्वमन्त्राकारमेव च।
साधयेदथ तन्त्रज्ञो यज्ञस्य नवसः क्रियात् ॥९॥

अपने मन्त्र के अनुसार तन्त्रोक्त वेध को ग्रहण करे। तदनन्तर तन्त्रज्ञ व्यक्ति यज्ञ का साधन करे॥९॥

होमान्ते ह्यग्निकुण्डायां चोदितो विधिनोत्थितः।
नरो न सिद्धिमान् यः स्यान्मन्त्ररूपी स दृश्यते ॥१०॥
चलत्यपि तथा मन्त्रं मन्यन्ते परिचारिकाः।
उद्यताश्च महाघोरा लक्ष्यन्ते मन्त्रिणः परे ॥११॥

अब विधिवत् उठकर होमान्त में अग्निकुण्ड का चालन करने से केवल लोक में ही सिद्धि नहीं मिलती, अपितु जो मन्त्ररूपी (देवता) हैं, वे भी दृश्यमान होते हैं॥१०-११॥

लक्ष्येद्यदि रूपेण शास्त्रस्योक्तस्य लक्षितम्।
सिद्धमन्त्रं विजानीयादन्यथा तु विनाशकः ॥१२॥
उत्थाय यदि मन्त्रेण स्वेनार्थः सम्प्रदृश्यते।
साध्यः स एव विज्ञेयोऽन्यथा घातयते तु तम् ॥१३॥

यदि इसे शास्त्रलक्षण के अनुसार स्वरूप में देखा जाय तब इसे मन्त्रसिद्धि कहा जाता है, अन्यथा यह विनाशक है। यदि मन्त्र उत्थित (जाग्रत) होकर अपने अर्थ को प्रकट कर दे तब उसे साध्य कहते हैं, अन्यथा वह मन्त्र साधक का विनाश करता है॥१२-१३॥

पातालदिशि वान्तस्तु क्रमतस्तत्र साधकः।
विद्यासिद्धो तु वै मन्त्री कामाद्वै घोरकं प्रदम् ॥१४॥
सिद्धो यः स श्रिया राजा सप्तद्वीपाधिपो बली।
भुक्त्वा तु पार्थिवान् भोगान् शिवं याति तनुक्षये ॥१५॥

पाताल (?) की ओर अथवा अन्तःकरण में क्रमशः साधक विद्यासिद्धि के विषय में कामना करे। विद्यासिद्धि से वह......(कामाद्वै घोरकं प्रदम् का कोई तात्पर्य ही नहीं है। प्रतीत होता है कि यहाँ कुछ पंक्तियाँ लुप्त हैं)। जो सिद्ध हो जाते हैं, वे ऐश्वर्य के साथ ही बलवान् सप्तद्वीप के अधिपति होते हैं। सभी पार्थिव भोगों का भोग करके देह के अन्त होने के पश्चात् शिवलोक प्राप्त करते हैं॥१४-१५॥

अष्टषष्टितमोऽध्यायः ३५७

एतास्तु सिद्धयः प्रोक्ता उत्तमाः सर्वकामदाः। तदर्द्धा मध्यमा ज्ञेयाः कनीयस्योर्द्ध्वतोऽप्यतः॥१६॥

इस प्रकार सभी कामनाओं की उत्तम सिद्धि की बातें कही गयीं। इससे आधी मिलने पर मध्यम तथा आधे से कम मिलने पर कनिष्ठ सिद्धि कही गयी है॥१६॥

स स कामयति सिद्धो ह्यन्यस्मिन्सिद्धिमिच्छति। सहायैर्गुग्गुलुयोगैः सिद्धो ध्यानी ततोऽन्यथा॥१७॥

साधक एक विषय में सिद्ध होकर अन्य विषय की सिद्धि चाहने लगता है। गुग्गुलु के योग से ध्यानी साधक सिद्ध हो जाता है॥१७॥

भ्रष्टराज्यो नरो देवो यदि स्यात्सिद्धिशोधिते। असिद्धे तु गुणो योगे जपादेर्व्रतिनो नराः॥१८॥

यह न होने पर वह राज्यभ्रष्ट होता है। सिद्धि से शोधित होकर नर ही देवत्व लाभ कर लेता है। गुणयोग (त्रिगुणयोग) से असिद्ध हो जाने पर व्यक्ति जपादि द्वारा व्रत ग्रहण कर सकता है॥१८॥

सुखं क्रामन्ति वै सिद्धिं संतृप्ता मन्त्रदीपिताः। हीनो यो हि नरो योज्यः किं पुनः साधकेक्षते॥१९॥

मन्त्र द्वारा दीपित साधक तृप्त होकर सुख में सिद्धिलाभ के पथ पर अग्रसर होता है। हीन व्यक्ति भी मन्त्र द्वारा युक्त हो जाते हैं, फिर अन्य साधकों की तो बात ही क्या है॥१९॥

मासं गुग्गुलुहोमस्तु सर्वदा सर्वकर्मसु। जपवृद्धिः सदा योज्या संक्रमे मन्त्रिणा सदा॥२०॥

एक मास-पर्यन्त सभी कर्म में गुग्गुलु का होम करना चाहिये। मन्त्री साधक सर्वदा जप-वृद्धि करता रहे॥२०॥

सङ्कल्पक्रमणं युज्यान्नासङ्कल्पस्तु सिद्ध्यति। सङ्कल्पं तु ततः कृत्वा साध्यं मन्त्री तु साधयेत्॥२१॥

सभी कार्य में सङ्कल्प करना आवश्यक है। सङ्कल्प के अभाव में सिद्धि नहीं मिलती। अतः सङ्कल्प करके साधक (मन्त्रसाधक) साधार साधन करे॥२१॥

जितेन्द्रियः सत्यवादी दृढचर्यरतः शुचिः। मितभुग्मितभाषश्च साधयेत्सिद्धिमुत्तमाम्॥२२॥

सत्यवादी, द्वन्द्वों को जीतने वाला, दृढ़ रूप से आचरण में रत, पवित्र, अल्पाहारी तथा वाक् संयमी साधक उत्तम सिद्धि प्राप्त करते हैं॥२२॥

३५८ श्रीसाम्बपुराणम्

न सम्भाषेत वै शूद्रं प्रमादान् मन्त्रसाधकः।
अरक्तो रञ्जयेल्लोकान् कामी चेत्स्यादकामुकः ॥२३॥
मन्त्रसाधक प्रमाद के कारण भी कभी शूद्र से वार्त्ता न करे। अनासक्त होकर लोगों का मनोरञ्जन करे तथा (लोगों के) कामी होने पर भी स्वयं अकामुक निस्पृह ही रहे॥२३॥

गूढविद्याव्रतश्चापि प्रमादी स्यात् स साधकः।
क्रियां च सुदृढां कुर्यान्निविधि चेत्स साधकः ॥२४॥
गूढ़विद्या व्रताचरण में प्रमादी (?) हो जाय, सुदृढ़ क्रिया करे; किन्तु किसी की हिंसा न करे (यहाँ प्रमादी पद उचित नहीं लगता, इसे अप्रमादी होना चाहिये)॥२४॥

यावद् व्रतं तु यः कुर्यात्तस्य सिद्ध्यन्ति लौकिकाः।
जपित्वा संहितां मासं ततः साध्यं प्रयोजयेत् ॥२५॥
जो इतने दिनों तक व्रत करते हैं, उनके लौकिक कार्य सिद्ध हो जाते हैं। एक मास जप करने के उपरान्त साध्य का प्रयोग करना चाहिये॥२५॥

प्रसूतिं घातकं कृत्वा लवणस्याहुतिं क्रमात्।
सप्तरात्रं तथा हुत्वा वशे जन्तून् करोति सः ॥२६॥
प्रतिलोमैस्तथा वर्णैः साधको घातकस्य तु।
शृङ्गवेरविषे हुत्वा घातयेत् सर्वजन्तुकान् ॥२७॥
प्रसूति के घात का (?) समर्पण करके क्रमशः लवण की आहुति देनी चाहिये। सात रात्रि आहुति देने पर साधक सभी प्राणीगण को वश में कर लेता है। घातक के प्रतिलोम (?) वर्ण द्वारा साधक को शृंगवेर के विष की आहुति देनी चाहिये, इससे वह सभी जन्तुओं का विनाश कर सकता है॥२६-२७॥

अव्रती नैव संसिद्धेदजयः साधकः स वै।
मोहादारभते यस्तु हन्यते स विधानवित् ॥२८॥
जो व्रतानुष्ठान नहीं करते, उन्हें कभी भी सिद्धि प्राप्त नहीं होती। वह असंयमी है। जो मोहवशात् विधान जाने विना आरम्भ करता है, वह विनष्ट हो जाता है॥२८॥

वेधकामस्तु मन्त्रस्तु यदि रूपं समालिखेत्।
पूर्वोक्तेन विधानेन त्रिमुखान्तां चतुर्भुजाम् ॥२९॥
अष्टशक्तिपरो चैव दिक्पतीनां च रूपकैः।
रश्मयस्तु यथार्कस्य तथा मन्त्रस्य ताः स्मृताः ॥३०॥
यदि वेधकामना से मन्त्र का रूप अंकित किया जाय, तब पूर्वोक्त विधानानुसार त्रिमुखान्त चतुर्भुजा का अङ्कन करे। अष्टशक्ति तथा दिक्पाल का रूप, सूर्य की रश्मिसमूह जिस प्रकार से मन्त्र में स्मृत है, उसे अङ्कित करना चाहिये॥२९-३०॥

अष्टषष्टितमोऽध्यायः ३५९

यथा विष्णुस्तथा रुद्रो वीरभद्रश्च पार्श्वतः ।
एते मन्त्रस्य वै योज्याः सर्वकालं च मन्त्रवित् ॥३१॥
होमकाले तु मन्त्रस्य जपेन विनियोजयेत् ।
शान्तने चापि रोगाणामेष दृष्टो विधिः परः ॥३२॥

जैसे विष्णु हैं, उसी प्रकार से रुद्र हैं। पार्श्व में वीरभद्र रहते हैं। मन्त्रज्ञ व्यक्ति मन्त्र में सर्वदा इसी प्रकार से योग करे। होमकाल में मन्त्र को जपयुक्त करने से (मन्त्रजप द्वारा) रोगों के विनाश की यह श्रेष्ठ विधि है॥३१-३२॥

संशयी तु यदा स स्यात्तदा कुर्यादिमं विधिम् ।
साधयेत् कामतो ह्यर्थान् पतिः स्याद् बीजसत्तमः ॥३३॥

साधक जब संशयापन्न हो जाय, तब इस विधि का पालन करे। यथाकामना प्रयोजन साधन करे। पति (?) श्रेष्ठ बीज है॥३३॥

राष्ट्रभङ्गनिपाते वा स्थानत्यागे तथा बुधः ।
सम्पुटे स्थापयेन्मन्त्रं यावत्कालविपर्ययः ॥३४॥
संहारात्तं ततः कृत्वा मध्ये मन्त्रं तु योजयेत् ।
पुनः संहारमायोज्य मध्ये बीजेन वेष्टयेत् ॥३५॥

राष्ट्रभंग अथवा विपदा के समय, किंवा स्थानत्याग-काल में तत्त्वज्ञ व्यक्ति संपुट मन्त्र स्थापित करे, जब तक कालविपर्यय न हो जाय। तदनन्तर संहार-पर्यन्त करके मध्य में मन्त्र योजित करे। पुनः संहार करे। मध्य में बीज से वेष्टन करे॥३४-३५॥

दशवर्णेन बीजेन स्वङ्गप्रत्यङ्गयोजनम् ।
न्यस्तो भवति वै मन्त्रः कालमाकल्पमन्त्रिणाम् ॥३६॥
अधस्तात् प्रणवं कृत्वा प्लुतो भवति पादयोः ।
पुनः पुनस्तथा हस्ते व्योकारश्चापि वामके ॥३७॥
हृदये तु मकारः स्याद् व्योकारः जठरे स्थितः ।
पिकारः पृष्ठसंस्थो वै नकारो मुखसंस्थितः ॥३८॥
प्रणवं स्थापयेन्मूर्ध्नि स च दृष्टो विधिः परः ।
न्यस्तो भवति वै मन्त्रो यावत्कालं तु साधनम् ॥३९॥

दशवर्ण बीज द्वारा अंग प्रत्यङ्ग को योजित करना चाहिये। मन्त्र विन्यस्त हो जाने पर मन्त्र साधक के यावत् जीवन के लिये हो जाता है। निम्न में प्रणव करे। पादद्वय में दो प्लुतस्वर हो। ऐसा बारम्बार करते हुये बाँयें हाथ में व्योकार, हृदय में मकार, जठर में व्योकार, पृष्ठ में पिकार, मुख में नकार तथा मस्तक में प्रणव की योजना करनी चाहिये। यह श्रेष्ठ विधि है। जब तक साधन है, तब तक मन्त्र न्यस्त रहता है॥३६-३९॥

३६० | श्रीसाम्बपुराणम्

विधिरेष तु मन्त्राणां सूक्ष्मो वै सर्वतोमुखः।
असन्देहैन सिद्धेन विधिगुप्तेन मन्त्रवित् ॥४०॥

सर्वतोभाव से मन्त्र की यही सूक्ष्म विधि है। मन्त्रज्ञ व्यक्ति निःसंदेह विधि को गोपनीय रखकर सिद्धि प्राप्त करता है॥४०॥

ग्रहणे चापि मन्त्रस्य भिन्नकार्याश्च मन्त्रिणः।
मूलन्तु साधनं युञ्ज्यादाद्यन्तकविधिः क्रमात् ॥४१॥

सूर्य-चन्द्रग्रहण काल में मन्त्र का भिन्न कार्य होगा। मूल मन्त्र से साधन करनी चाहिये। क्रमशः आदि तथा अन्त की विधि युक्त करे॥४१॥

क्रमाद्वा नैव कुर्वन्ति कृतमित्यत्र साधनम्।
आमन्त्र्य तु विवर्त्तेत तन्त्रयुक्तं तु साधयेत् ॥४२॥

अथवा क्रमशः करे। यह न विचारे कि साधन किया जा रहा है। आमन्त्रण करके विवर्तन करना चाहिये। तन्त्रोक्त विधि से साधन करना उचित है॥४२॥

मन्त्रे जपे च ये लग्नास्तथा व्रतविधौ स्थिताः।
साधनं तु पुनस्तेषां यथाशास्त्रसमागमम् ॥४३॥

मन्त्र तथा जप में इस विधि से जो लग्न रहता है, यथाशास्त्र पुनः उसका साधन होता है॥४३॥

स्वल्पेऽपि साधने युञ्ज्याज्जपव्रतरतैस्तु वै।
अन्यथा हीयते मन्त्री कर्म वापि निरर्थकम् ॥४४॥

अल्प साधन में भी जप तथा व्रतपरायण होना चाहिये; अन्यथा साधक भ्रष्ट हो जाता है और उसका कर्म भी निरर्थक होता है॥४४॥

मासं साधनयोगेन जपित्वा चापि संहिताम्।
पञ्चरात्रव्रतं पश्चादसिधारं यथाक्रमम् ॥४५॥

एक मास साधन योग द्वारा संहित होकर जप करना चाहिये। पञ्चरात्र व्रत का अनुष्ठान करे। तदनन्तर यथाक्रमेण असिधार व्रत का पालन करना चाहिये॥४५॥

क्षुद्रान् रोगान् गृहांश्चापि तथा व्याधीनुपद्रवान्।
इच्छातः साधयेत् सर्वांस्तीक्ष्णव्रतरतो नरः ॥४६॥

तीव्र व्रतरत व्यक्ति क्षुद्र रोग, गृहदोष, व्याधि तथा उपद्रवों का इच्छामात्र से शमन कर सकता है॥४६॥

अष्टषष्टितमोऽध्यायः ३६१

महातपस्वी च जितेन्द्रियश्च न चान्यभक्तश्च महेश्वरादसौ । विद्यासु तत्त्वेषु महास्थितिंश्च प्राप्नोति विद्याधरमुक्तलक्ष्मीम् ॥४७॥

जो महातपस्वी, जितेन्द्रिय हैं, महेश्वर के ही भक्त हैं, वे विद्या तथा तत्त्वसमूहं की महास्थिति का तथा विद्याधरत्व का ऐश्वर्य प्राप्त करते हैं॥४७॥

दशात्मकं तु तं बुद्ध्वा बीजतत्त्वन्तु कृत्स्नतः। नियोगं पदबीजानां बुद्धिसिद्धिं यथोदिताम् ॥४८॥

उसे दशात्मक जान लेने पर समग्र भाव से बीजतत्त्व तथा पदबीज में नियोग होता है। यथोदित बुद्धिसिद्धि प्राप्त होती है॥४८॥

सर्वमन्त्रात्मका देवाः सर्वदेवाः शिवात्मकाः। शिवतन्त्रपदैर्बीजैः कालकालकृपादिभिः। बुद्ध्या सम्यग्यथान्यायं सिद्धिं चाशु प्रवर्तते ॥४९॥

इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे अष्टषष्टितमेऽध्याये सर्वसामान्यसाधनं नाम पञ्चदशं पटलम्

सभी देवगण मन्त्रात्मक हैं। सभी देवता शिवात्मक हैं। शिवोक्त तन्त्रोक्त बीज तथा काल में महादेव की कृपा से बुद्धि की सहकारिता से यथान्याय सिद्धि की शीघ्र प्राप्ति होती है॥४९॥

श्रीसाम्बपुराणान्तर्गत ज्ञानोत्तर अड़सठवें अध्याय में सर्वसामान्य-साधन नामक पन्द्रहवाँ पटल समाप्त

एकोनसप्ततितमोऽध्यायः

(तत्त्वमण्डलवर्णनम्)

तत्त्वानुसारेण पथः क्रमशोऽथानुवर्ण्यते ।
शिवलोकं यथा येन प्रविशेद् गृहवद् गृही ॥१॥
तन्त्रानुसार पदों का क्रमशः वर्णन करता हूँ, जिसके द्वारा जैसे गृही घर में प्रवेश करता है, तदनुसार ही साधक शिवलोक (शिवगृह) में प्रवेश करता है॥१॥

गणमण्डलतत्त्वज्ञस्तेषु पापरतः सदा ।
अनेकशोऽभिषिक्तश्च शिववद्गुरुपूजकः ॥२॥
गणमण्डल के तत्त्व को न जानने वाला, उसमें सदा पापरत (?), अनेक बार अभिषिक्त व्यक्ति शिवतुल्य होता है॥२॥

अर्पितः शिवयोनौ च गर्भश्चाम्बिकया धृतः ।
योगेन जनितश्चैव योगात्मा योगसम्भवः ॥३॥
शिवयोनि में अर्पित होकर अम्बिका द्वारा जब गर्भ को धारण किया जाता है तभी योग द्वारा योगात्मा योगसम्भव की उत्पत्ति होती है॥३॥

जातकर्मगुणैर्युक्तः स्नानादिगतकल्मषः ।
कृतरक्षश्च धूपेन सत्यात्मा सत्यसम्भवः ॥४॥
जन्म-कर्म-गुण द्वारा युक्त होकर स्नान से पाप हटता है। धूप से रक्षित होकर सत्यात्मा सत्यसम्भव हो जाता है॥४॥

प्रसृतस्त्रिवृतान्तं च मूर्ध्न्याघ्रातः शिवात्मना ।
कर्तृवत् कृतचूड़ोऽयं मन्त्रशक्तितनुस्थितः ॥५॥
निर्गत त्रिवृत्तान्त शिवरूप में मस्तक द्वारा आघ्रात होने पर मन्त्रशक्ति का देहस्थित चूड़ाकरण होता है॥५॥

विधिना चोपनीतस्तु मुञ्जाजिनधरः शुचिः ।
देवव्रतधरो मुण्डी जटी वा भैक्ष्यभोजनः ॥६॥
विधिवत् उपवीत धारण करके, मुञ्जा, मृगचर्म धारण करके पवित्र होकर देवता का व्रत पालन करना चाहिये। मस्तक का मुण्डन करके जटाधारी होकर भिक्षालब्ध वस्तु का भोजन करना चाहिये॥६॥

एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ३६३

विधिनाऽधीतविद्यश्च सर्वज्ञो बीजवित्तमः ।
कृतात्मा कृतविद्यश्च कृतगोदानदक्षिणः ॥७॥
पाकयज्ञो हविर्यज्ञो सोमयाजी तथैव च ।
शिवमार्गानुसारि च धनवान् योगनिश्चयः ॥८॥

यथाविधि विद्याध्ययन तथा सर्वज्ञता लाभकर श्रेष्ठ बीजविद् कृतात्मा, कृतविद्य को जिन्होंने गोदान दिया है, जो पाकयज्ञ, हविर्यज्ञ तथा सोमयाग करता है, जो शिवमार्ग का अनुसरण करने वाले हैं, वे धनवान तथा योगविषय के ज्ञाता हो जाते हैं॥७-८॥

यथोक्तज्ञानकर्मस्थो गुणदोषविवर्जितः ।
नास्ति निर्माल्यदोषश्च सर्वतत्त्वेषु सिद्ध्यति ॥९॥

यथोक्त ज्ञान तथा कर्म में अवस्थित व्यक्ति गुण तथा दोष से रहित हो जाते हैं। उनको निर्माल्य दोष भी नहीं होता और वे सर्वतत्त्वों को सिद्ध कर लेते हैं॥९॥

एवंगुणविशिष्टात्मा तपस्वी द्वन्द्ववर्जितः ।
क्रोधादिभिर्वियुक्तश्च समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥१०॥

ऐसे गुणयुक्त तपस्वी द्वन्द्व-वर्जित (शीतोष्ण, सुख-दुःख रहित) क्रोधादि रहित होते हैं। वे लोष्ठ (मिट्टी), प्रस्तर तथा काञ्चन में समदृष्टि होते हैं॥१०॥

आत्मवत् सर्वभूतेषु सर्वमात्मनि पश्यति ।
प्राणायामादिभिः खिन्नस्तुत्या च पुटसंशयः ॥११॥

सभी प्राणियों को आत्मवत् देखते हैं तथा अपनी आत्मा में ही सब कुछ देख लेते हैं। प्राणायाम-प्रभृति द्वारा खिन्न होने पर भी संशयरहित हो जाते हैं॥११॥

विशुद्धाचार आचार्यों भावतः प्रणियुज्यते ।
अनेन क्रमयोगेन विशेद् देवं परं प्रभुम् ॥१२॥

विशुद्ध आचारयुक्त आचार्य भाव से (गुरुभक्ति से) युक्त हो जायें। इस क्रमयोग द्वारा प्रभु परम देवता में प्रवेश करे॥१२॥

प्रतिकर्तृ प्रतिध्यायी विधिना तत्तदात्मनः ।
ध्यायँश्च शिवमात्मस्थमाचार्य्यं चापि शेषयेत् ॥१३॥

विधिवत् तत्तदात्मा का एवं आत्मस्थ शिव का ध्यान करके आचार्य का भी ध्यान करना चाहिये॥१३॥

प्रवक्ष्यति प्रयुक्तश्च दीक्षया विमलीकृतः ।
ध्यानयुक्तः सदा गच्छेद् ध्यायिनं परमं पदम् ॥१४॥

३६४ श्रीसाम्बपुराणम्

दीक्षा से निर्मल होकर सर्वदा ध्यानयुक्त होकर ध्येय परम पद का लाभ करना चाहिये॥१४॥

चरेदुत्पन्नविज्ञानो मुक्तिव्रतमनिन्दितम्।
भूतव्रतादिसिद्ध्यर्थमेकान्ते सर्वतः क्षमी ॥१५॥

विज्ञानोत्पत्ति हो जाने पर अनिन्दित मुक्तिव्रत का आचरण करना चाहिये। सिद्धि के लिये भूतव्रताचरण करके सर्वतोभावेन धैर्यवान् होकर निर्जन में अवस्थान करना चाहिये॥१५॥

सन्त्यज्य सर्वकालात्मप्रधानहितवादिनम्।
मतानि विपरीतानि ध्यायेन्नित्यं सदाशिवम् ॥१६॥

सर्वकालात्म-प्रधान हितवादियों का तथा विपरीत मतसमूह का परित्याग करके नित्य सदाशिव का ध्यान करना चाहिये॥१६॥

निर्निमित्तं निराकारं वाग्विशुद्धं परात्परम्।
प्रमाणं विषयातीतमदृष्टान्तादिलक्षणम् ॥१७॥

वे निर्निमित्त, निराकर, विशुद्ध, परात्पर तत्त्व हैं। वे प्रमाणरूप, विषयातीत एवं दृष्टान्तरहित हैं॥१७॥

ज्योतिषां च परं धाम ज्ञानानां परमं पदम्।
तत्त्वानां परमं तत्त्वं गतीनां परमां गतिम् ॥१८॥

वे ज्योतियों के परम धाम (स्थान), ज्ञानसमूह के परमपद, तत्त्वसमूह के परमतत्त्व तथा गतियों की परमगति हैं॥१८॥

तत्त्वेन तन्तुतत्त्वं तन्तुता चैव सन्ततम्।
तेनैव तन्तुना नित्यं चिन्तयेत्तत्सुनिष्कलम् ॥१९॥

तत्त्व के द्वारा उनका तन्तुतत्त्वत्व है। ओत-प्रोतभाव से सर्वत्र उनकी सत्ता है। अतः तन्तु के द्वारा उन निष्कल सदाशिव का नित्य प्रति चिन्तन करना चाहिये॥१९॥

क्षुनिकाध्येययोगज्ञो बिन्दुनादतनुस्थितम्।
मुञ्चति क्षिप्रमात्मानं बुद्ध्वा ज्ञानमयं परम् ॥२०॥

क्षुनिका ध्येय योग (?) को जो जानते हैं, वे ज्ञानमय परमतत्त्व को जानते हैं और बिन्दु तथा नाद देहस्थ आत्मा का (देहबोध का) शीघ्र त्याग कर देते हैं॥२०॥

सतस्यास्य योगेन कालेन बहुधा नरः।
विधिना भावशुद्धेन देही बिन्दति सत्पदम् ॥२१॥

बहुधा निरन्तर अभ्यास के फल से देहधारी जीव भावशुद्ध विधान द्वारा सत्पद का लाभ करता है॥२१॥

एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ३६५

मुहूर्त्ताद्र्द्धार्द्धमात्रेण मन्त्रबीजकलादिभिः ।
दिवार्र्द्धं रविभागेन देही बिन्दति तत्क्षणात् ॥२२॥

मुहूर्त काल के आधे के आधे में मन्त्र, बीज तथा कला के द्वारा दिन के अर्द्धभाग रविभाग के द्वारा देही तत्क्षण उस सम्पत्ति को पाता है॥२२॥

प्राकृतानि च तत्त्वानि प्रकृत्या प्रकृतानि वै।
तीव्रं तत्त्वं परं सूक्ष्मं मन्त्रात्मा पञ्चविंशकम् ॥२३॥
तीव्रस्यात्मनि तत्त्वज्ञो योगवान् योगपण्डितः ।
अचिराल्लभते शान्तिं देही तत्त्वेन यो हितः ॥२४॥

तत्त्वसमूह प्राकृत हैं। प्रकृति द्वारा (तत्त्वसमूह) प्रस्तुत ये तीव्र तत्त्व परमसूक्ष्म, मन्त्रात्मा २५ हैं। आत्मा में तीव्रतत्त्व से अभिज्ञ योगयुक्त देही तत्त्वों से युक्त होकर शीघ्र शान्ति-लाभ करता है॥२३-२४॥

धारणात्ससततं योगो जपध्यानादिदीपितः ।
योजयंस्तु परं योज्यं लिलिहेत्पत्रमव्ययम् ॥२५॥

जप, ध्यानादि से दीप्त होकर निरन्तर धारणा योग से परम योज्य वस्तु में चित्त को युक्त करके अव्यय पत्र का लेहन करे॥२५॥

एवंगुणविशिष्टस्तु योजयेत्तत्त्वमण्डलम् ।
अगुणस्त्वेव योज्यः स्यान्मन्त्री विद्येश्वर्रादृते ॥२६॥
इति श्रीसाम्बपुराणे तत्त्वमण्डलवर्णनं नाम एकोनसप्ततितमोऽध्यायः

ऐसा गुणयुक्त होकर तत्त्वमण्डल को युक्त करे। इससे साधक विद्येश्वर से व्यतीत (सगुण से परे) अगुण (निर्गुण) से युक्त हो जाता है॥२६॥

श्रीसाम्बपुराण में तत्त्वमण्डल-वर्णन नामक उनहत्तरवाँ अध्याय समाप्त

सप्ततितमोऽध्यायः

(बीजप्रसवः)

उक्तो जपो विधिर्विश्वो बीजं च सह कर्मभिः।
सहयोज्यं यथा बीजमिच्छते परमेश्वरः॥१॥
वक्तुमर्हस्य शेषेण भक्ताय सततं प्रभो।
एवमुक्तः प्रभुर्देवः प्राह तस्मै यथाविधि॥२॥

हे प्रभो! जप-विधि तथा समस्त कर्म के साथ बीज कहा गया है। परमेश्वर योज्य के साथ जैसे बीज की इच्छा की जाती है, वह भक्त से समग्र रूप से आप द्वारा कहना उचित है। ऐसा कहने पर सूर्यदेव ने साम्ब को यथाविधि बतलाना प्रारम्भ किया॥१-२॥

अक्षराणि दशत्रिंशद्योनिरुक्ता मया पुरा।
सर्वं वै चोच्यते तस्माद्यथाबीजं प्रसूयते॥३॥

दस अक्षर तथा ३० योनि की बात मैंने पहले बतलायी है। उसमें सब कुछ कह दिया गया है कि बीज कैसे उत्पन्न होता है॥३॥

त्रीणि चत्वारि च द्वे च त्रीणि पञ्च चतुष्टयम्।
त्रीणि चत्वारि द्वे त्रीणि पञ्च चैव चतुश्रुतुः॥४॥
तद्द्विकेन समायुक्तो योनिरेषा हि विश्वभुक्।
संपृक्तैषा प्रसूयेत अक्षरेण दशात्मकम्॥५॥

३, ४, २, ३, ५ तथा ४, ३, ४, २, ३, ५ एवं १६। दो के द्वारा युक्त होने पर योनि विश्वभुक् होती है। यह मिलित होकर अक्षर के साथ दशात्मक प्रसव करती है॥४-५॥

व्यञ्जनानि स्वरश्चैव परमेष्ठ्यादयस्तथा।
भूताधिपतयश्चैव तेभ्यो ज्योतिः परं ततः॥६॥

इति श्रीसाम्बपुराणे बीजप्रसवे सप्ततितमोऽध्यायः

व्यञ्जनसमूह एवं स्वर का, ऐसे ही परमेष्ठि प्रभृति, भूताधिपति गण का तदनन्तर उससे परम ज्योति का प्रकाश होता है॥६॥

श्रीसाम्बपुराण में बीजप्रसव नामक सत्तरवाँ अध्याय समाप्त

एकसप्ततितमोऽध्यायः

(बीजप्रसवः)

कृष्णचक्रसमा कालमाग्नीष्टकसमायुतम्।
बीजानां परमं बीजं शङ्करं परमेश्वरम् ॥१॥
भिन्नं च मार्गमूलेषु विन्यस्तं च सबिन्दुकम्।
शरीरं देवदेवस्य अक्षरं बीजनिःसृतम् ॥२॥

कृष्णचक्र सदा अग्नीष्टक समायुक्त है। बीजसमूह के परम बीज परमेश्वर शङ्कर हैं। सभी मार्गमूल भिन्न हैं। वे बिन्दु के साथ विन्यस्त है। देव-देवीगण का शरीर बीज से उत्पन्न होता है॥१-२॥

धृतं परं स या भक्त्या प्रणवाद्यच्च संहतम्।
भिन्नं चतुर्भिर्वर्णैश्च सदृशश्चात्मनस्तथा ॥३॥

परम धृत भक्ति द्वारा प्रणव से जो संहत है, वह चारो से भिन्न हैं(?)। ऐसे ही वर्णसमूह आत्मा के सदृश हैं॥३॥

अकाराद्यं त्रिकं पूर्वे सुकारात्पूर्वदक्षिणे।
सम्यग्विज्ञाय मेधावी स्थापयेच्चतुरक्षकम् ॥४॥

अकारादि तीन पूर्व में तथा सुकार के पूर्व दक्षिण में है। मेधावी इसे सम्यक्रूपेण जानकर चतुरक्षर की स्थापना करते हैं॥४॥

पश्चिमे तु तकाराद्यं पदयोन्यां तु तत्त्ववित्।
हृदक्षरं पदविन्मन्त्री विन्यसेद् भूतये शुभम् ॥५॥

पश्चिम में तकाराद्य अक्षर है, इसे अयोनि में तत्त्वविद् स्थापित करते हैं। परसमूह का ज्ञाता मन्त्री मंगल-हेतु शुभ अक्षर का विन्यास करता है॥५॥

चकाराद्यन्तरे मार्गे पदमक्षरसंज्ञितम्।
आत्मप्रसूतिं प्राणांश्च विन्यसेत्तत्त्वविद् भुवि ॥६॥

चकारादि के मध्य में अक्षरसंज्ञक पद है। आत्मप्रसूति तथा प्राणसमूह का विन्यास तत्त्वज्ञाता पृथिवी में करता है॥६॥

पकारादि यकारान्ता पञ्चिका शक्तिसंज्ञिता।
शिवधात्री स्थिता मध्यं व्याप्य विश्वं जगत्पतिम् ॥७॥

३६८ | श्रीसाम्बपुराणम्

पकारादि चकारान्त पञ्जिका शक्ति है। शिवधात्री (शिव को धारण करने वाली) विश्व के तथा जगत्पति के मध्य में स्थित रहती है॥७॥

विशिष्टानि ततोऽन्यस्य बिन्दुना भूपतिः क्रमात्।
द्वे द्वे यथा पतत्वं वै चैशान्यां दिशि दक्षिणे ॥८॥

भूपतिक्रम से विन्दु द्वारा विशिष्ट समूह का विन्यास करके ईशान तथा दक्षिण में २-२ करके पातित करे॥८॥

अकारेकारभूताद्या रेफाद्याश्च ततः परम्।
एकाराद्ये तथा द्वे च शन्तर्योत्तरवर्मिकाः ॥९॥

इति श्रीसाम्बपुराणे बीजप्रसवे एकसप्ततितमोऽध्यायः

अकार, ईकार, भूतादि का, तदनन्तर रेफादि एवं एकाराद्य दो शन्तर्योत्तर (?) वर्म होगा॥९॥

श्रीसाम्बपुराण में बीजप्रसव नामक इकहत्तरवाँ अध्याय समाप्त

द्वितीयं नैर्ऋते स्थाप्यः तृतीयो वायुदैवते।

द्विसप्ततितमोऽध्यायः

(वर्णनाशविधिः)

वर्णनाशविधिस्तु स्याद्व्यञ्जनानि यथाक्रमम्।
सिद्धये सर्वरूपाणां प्रथमः पूर्वदक्षिणे ॥१॥
द्वितीयं नैर्ऋते स्थाप्यः तृतीयो वायुदैवते।
चतुर्थः सर्वदैवत्ये विन्यासं शृण्वतः परम् ॥२॥

वर्णनाश-विधि कहते हैं। यथाक्रमेण व्यञ्जन वर्णों को शब्दरूप की सिद्धि के विषय में पहले पूर्व दक्षिण में, द्वितीय नैर्ऋत में, तृतीय वायुदैवत में, चतुर्थ सर्वदैवत में श्रेष्ठ विन्यास होगा। अब आगे सुनो॥१-२॥

अन्तस्थाः प्रथमं च स्याद्विन्यस्य दक्षिणे तथा।
शेषास्तथा शकाराद्या विन्यस्य पश्चिमां दिशम् ॥३॥

अन्तःस्थ वर्णों को प्रथमतः तथा वैसे ही दक्षिण में विन्यास करे। अन्त में अवशिष्ट शकारादि का पश्चिम दिशा में विन्यास करे॥३॥

उत्तरस्यां च सन्न्यस्याश्चत्वारो मुखनासिकाः।
परतश्च सुरास्तेभ्यो बहिःस्थानं यथाक्रमम् ॥४॥

उत्तर में ष, स नासिकोद्भव, ४ मुख-नासिका, तत्पश्चात् देवगण को यथाक्रम से उनके बाहर स्थान प्रदत्त करे॥४॥

पूर्वेण तु समान्यस्य ह्रस्वदीर्घप्लुतास्त्रयः।
उत्तरेण त्रयस्त्वन्ये तदेवं द्वादशैव तु ॥५॥

पूर्व से ह्रस्व, दीर्घ तथा प्लुत—ये तीन, उत्तर में अन्य तीन, सब १२ होंगे॥५॥

ऐकारो नैर्ऋते स्थाप्य उत्तरे वायुदैवतम्।
चक्रमेतद्धि शक्तिस्थं बीजं वै शब्दतां वरम् ॥६॥

इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे वर्णनाशविधिर्नाम द्विसप्ततितमोऽध्यायः

नैर्ऋत्य कोण में ऐकार को स्थापित करे। उत्तर में वायु दैवत को स्थापित करे। यह बीजशक्तिस्थ चक्र शब्दों में श्रेष्ठ हैं॥६॥

श्रीसाम्बपुराण-ज्ञानोत्तर में वर्णनाश-विधि नामक बहत्तरवाँ अध्याय समाप्त

त्रिसप्ततितमोऽध्यायः

(बीजप्रसवः)

आद्यन्तं प्रणवं ज्ञेयं योनिबीजं पुनः पुनः।
न्यसेत् पञ्चाक्षरं भूमौ फलार्थी परमेष्ठिनम् ॥१॥
न्यसेदष्टाक्षरं तस्य बीजमादौ सबिन्दुकम्।
शेषाः स्युः प्रणवाद्यन्ताः परस्यां दिशि कारणम् ॥२॥

आदि तथा अन्त में प्रणव को जाने, बारम्बार योनिबीज का विन्यास करे। फलार्थी भूमि में परमेष्ठी रूप पञ्चाक्षर का विन्यास करे। अष्टाक्षर विन्यास करे। उसका बीज आदि में बिन्दुयुक्त होगा। शेष के आदि तथा अन्त में प्रणवयुक्त रहेगा। यह है—पश्चिम का कारण॥१-२॥

दक्षिणस्यां परो देवः परस्यां स्यात् सबिन्दुकः ।
ईशान्यादौ सबिन्दुः स्यात्तदन्यानि तु पूर्ववत् ॥३॥
न चाक्षरः परस्यां स्यात् सबिन्दूकारपूर्वकः ।
अष्टौ क्रिया यदन्यानि भूतात्मा नामतस्तु सः ॥४॥

दक्षिण दिशा में परमदेवता हैं। यह बिन्दुयुक्त होंगे। इनके आदि में बिन्दु होगा, अन्य पूर्ववत् होगा। परयोनि में बिन्दु तथा उकारयुक्त कोई अक्षर नहीं होगा। अन्य जो आठ क्रिया है, वह भूतात्मा है॥३-४॥

व्योमाद्यन्तं परो देवो विरामे प्रणवस्ततः ।
अक्षराणि च विज्ञेया बीजयोनिस्तु यादृशी ॥५॥

व्योमाद्यन्त परमदेवता है। तदनन्तर विराम में प्रणव है। जैसा योनिबीज होगा, वैसे ही अक्षर होंगे॥५॥

सुप्रणवादि च भवेद् व्यापिने मध्यतो भवेत् ।
प्रासूत्याख्यो यदा देवः वर्णा दश च सप्त च ॥६॥

आदि में प्रणव होगा। व्याप्ति होने पर मध्य में होगा। प्रसूति नामक देवता १० तथा ७ (अर्थात् १७) वर्णयुक्त होगा॥६॥

ओंकारावभितो यस्य व्योममध्ये ततः परः।
विन्यस्य सृष्टिसंज्ञोऽथ देवः पञ्चदशाक्षरः ॥७॥