भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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सप्ततितमोऽध्यायः

(बीजप्रसवः)

उक्तो जपो विधिर्विश्वो बीजं च सह कर्मभिः।
सहयोज्यं यथा बीजमिच्छते परमेश्वरः॥१॥
वक्तुमर्हस्य शेषेण भक्ताय सततं प्रभो।
एवमुक्तः प्रभुर्देवः प्राह तस्मै यथाविधि॥२॥

हे प्रभो! जप-विधि तथा समस्त कर्म के साथ बीज कहा गया है। परमेश्वर योज्य के साथ जैसे बीज की इच्छा की जाती है, वह भक्त से समग्र रूप से आप द्वारा कहना उचित है। ऐसा कहने पर सूर्यदेव ने साम्ब को यथाविधि बतलाना प्रारम्भ किया॥१-२॥

अक्षराणि दशत्रिंशद्योनिरुक्ता मया पुरा।
सर्वं वै चोच्यते तस्माद्यथाबीजं प्रसूयते॥३॥

दस अक्षर तथा ३० योनि की बात मैंने पहले बतलायी है। उसमें सब कुछ कह दिया गया है कि बीज कैसे उत्पन्न होता है॥३॥

त्रीणि चत्वारि च द्वे च त्रीणि पञ्च चतुष्टयम्।
त्रीणि चत्वारि द्वे त्रीणि पञ्च चैव चतुश्रुतुः॥४॥
तद्द्विकेन समायुक्तो योनिरेषा हि विश्वभुक्।
संपृक्तैषा प्रसूयेत अक्षरेण दशात्मकम्॥५॥

३, ४, २, ३, ५ तथा ४, ३, ४, २, ३, ५ एवं १६। दो के द्वारा युक्त होने पर योनि विश्वभुक् होती है। यह मिलित होकर अक्षर के साथ दशात्मक प्रसव करती है॥४-५॥

व्यञ्जनानि स्वरश्चैव परमेष्ठ्यादयस्तथा।
भूताधिपतयश्चैव तेभ्यो ज्योतिः परं ततः॥६॥

इति श्रीसाम्बपुराणे बीजप्रसवे सप्ततितमोऽध्यायः

व्यञ्जनसमूह एवं स्वर का, ऐसे ही परमेष्ठि प्रभृति, भूताधिपति गण का तदनन्तर उससे परम ज्योति का प्रकाश होता है॥६॥

श्रीसाम्बपुराण में बीजप्रसव नामक सत्तरवाँ अध्याय समाप्त