साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 381, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकसप्ततितमोऽध्यायः
(बीजप्रसवः)
कृष्णचक्रसमा कालमाग्नीष्टकसमायुतम्।
बीजानां परमं बीजं शङ्करं परमेश्वरम् ॥१॥
भिन्नं च मार्गमूलेषु विन्यस्तं च सबिन्दुकम्।
शरीरं देवदेवस्य अक्षरं बीजनिःसृतम् ॥२॥
कृष्णचक्र सदा अग्नीष्टक समायुक्त है। बीजसमूह के परम बीज परमेश्वर शङ्कर हैं। सभी मार्गमूल भिन्न हैं। वे बिन्दु के साथ विन्यस्त है। देव-देवीगण का शरीर बीज से उत्पन्न होता है॥१-२॥
धृतं परं स या भक्त्या प्रणवाद्यच्च संहतम्।
भिन्नं चतुर्भिर्वर्णैश्च सदृशश्चात्मनस्तथा ॥३॥
परम धृत भक्ति द्वारा प्रणव से जो संहत है, वह चारो से भिन्न हैं(?)। ऐसे ही वर्णसमूह आत्मा के सदृश हैं॥३॥
अकाराद्यं त्रिकं पूर्वे सुकारात्पूर्वदक्षिणे।
सम्यग्विज्ञाय मेधावी स्थापयेच्चतुरक्षकम् ॥४॥
अकारादि तीन पूर्व में तथा सुकार के पूर्व दक्षिण में है। मेधावी इसे सम्यक्रूपेण जानकर चतुरक्षर की स्थापना करते हैं॥४॥
पश्चिमे तु तकाराद्यं पदयोन्यां तु तत्त्ववित्।
हृदक्षरं पदविन्मन्त्री विन्यसेद् भूतये शुभम् ॥५॥
पश्चिम में तकाराद्य अक्षर है, इसे अयोनि में तत्त्वविद् स्थापित करते हैं। परसमूह का ज्ञाता मन्त्री मंगल-हेतु शुभ अक्षर का विन्यास करता है॥५॥
चकाराद्यन्तरे मार्गे पदमक्षरसंज्ञितम्।
आत्मप्रसूतिं प्राणांश्च विन्यसेत्तत्त्वविद् भुवि ॥६॥
चकारादि के मध्य में अक्षरसंज्ञक पद है। आत्मप्रसूति तथा प्राणसमूह का विन्यास तत्त्वज्ञाता पृथिवी में करता है॥६॥
पकारादि यकारान्ता पञ्चिका शक्तिसंज्ञिता।
शिवधात्री स्थिता मध्यं व्याप्य विश्वं जगत्पतिम् ॥७॥