साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 374, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ें३६० | श्रीसाम्बपुराणम्
विधिरेष तु मन्त्राणां सूक्ष्मो वै सर्वतोमुखः।
असन्देहैन सिद्धेन विधिगुप्तेन मन्त्रवित् ॥४०॥
सर्वतोभाव से मन्त्र की यही सूक्ष्म विधि है। मन्त्रज्ञ व्यक्ति निःसंदेह विधि को गोपनीय रखकर सिद्धि प्राप्त करता है॥४०॥
ग्रहणे चापि मन्त्रस्य भिन्नकार्याश्च मन्त्रिणः।
मूलन्तु साधनं युञ्ज्यादाद्यन्तकविधिः क्रमात् ॥४१॥
सूर्य-चन्द्रग्रहण काल में मन्त्र का भिन्न कार्य होगा। मूल मन्त्र से साधन करनी चाहिये। क्रमशः आदि तथा अन्त की विधि युक्त करे॥४१॥
क्रमाद्वा नैव कुर्वन्ति कृतमित्यत्र साधनम्।
आमन्त्र्य तु विवर्त्तेत तन्त्रयुक्तं तु साधयेत् ॥४२॥
अथवा क्रमशः करे। यह न विचारे कि साधन किया जा रहा है। आमन्त्रण करके विवर्तन करना चाहिये। तन्त्रोक्त विधि से साधन करना उचित है॥४२॥
मन्त्रे जपे च ये लग्नास्तथा व्रतविधौ स्थिताः।
साधनं तु पुनस्तेषां यथाशास्त्रसमागमम् ॥४३॥
मन्त्र तथा जप में इस विधि से जो लग्न रहता है, यथाशास्त्र पुनः उसका साधन होता है॥४३॥
स्वल्पेऽपि साधने युञ्ज्याज्जपव्रतरतैस्तु वै।
अन्यथा हीयते मन्त्री कर्म वापि निरर्थकम् ॥४४॥
अल्प साधन में भी जप तथा व्रतपरायण होना चाहिये; अन्यथा साधक भ्रष्ट हो जाता है और उसका कर्म भी निरर्थक होता है॥४४॥
मासं साधनयोगेन जपित्वा चापि संहिताम्।
पञ्चरात्रव्रतं पश्चादसिधारं यथाक्रमम् ॥४५॥
एक मास साधन योग द्वारा संहित होकर जप करना चाहिये। पञ्चरात्र व्रत का अनुष्ठान करे। तदनन्तर यथाक्रमेण असिधार व्रत का पालन करना चाहिये॥४५॥
क्षुद्रान् रोगान् गृहांश्चापि तथा व्याधीनुपद्रवान्।
इच्छातः साधयेत् सर्वांस्तीक्ष्णव्रतरतो नरः ॥४६॥
तीव्र व्रतरत व्यक्ति क्षुद्र रोग, गृहदोष, व्याधि तथा उपद्रवों का इच्छामात्र से शमन कर सकता है॥४६॥