साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 373, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टषष्टितमोऽध्यायः ३५९
यथा विष्णुस्तथा रुद्रो वीरभद्रश्च पार्श्वतः ।
एते मन्त्रस्य वै योज्याः सर्वकालं च मन्त्रवित् ॥३१॥
होमकाले तु मन्त्रस्य जपेन विनियोजयेत् ।
शान्तने चापि रोगाणामेष दृष्टो विधिः परः ॥३२॥
जैसे विष्णु हैं, उसी प्रकार से रुद्र हैं। पार्श्व में वीरभद्र रहते हैं। मन्त्रज्ञ व्यक्ति मन्त्र में सर्वदा इसी प्रकार से योग करे। होमकाल में मन्त्र को जपयुक्त करने से (मन्त्रजप द्वारा) रोगों के विनाश की यह श्रेष्ठ विधि है॥३१-३२॥
संशयी तु यदा स स्यात्तदा कुर्यादिमं विधिम् ।
साधयेत् कामतो ह्यर्थान् पतिः स्याद् बीजसत्तमः ॥३३॥
साधक जब संशयापन्न हो जाय, तब इस विधि का पालन करे। यथाकामना प्रयोजन साधन करे। पति (?) श्रेष्ठ बीज है॥३३॥
राष्ट्रभङ्गनिपाते वा स्थानत्यागे तथा बुधः ।
सम्पुटे स्थापयेन्मन्त्रं यावत्कालविपर्ययः ॥३४॥
संहारात्तं ततः कृत्वा मध्ये मन्त्रं तु योजयेत् ।
पुनः संहारमायोज्य मध्ये बीजेन वेष्टयेत् ॥३५॥
राष्ट्रभंग अथवा विपदा के समय, किंवा स्थानत्याग-काल में तत्त्वज्ञ व्यक्ति संपुट मन्त्र स्थापित करे, जब तक कालविपर्यय न हो जाय। तदनन्तर संहार-पर्यन्त करके मध्य में मन्त्र योजित करे। पुनः संहार करे। मध्य में बीज से वेष्टन करे॥३४-३५॥
दशवर्णेन बीजेन स्वङ्गप्रत्यङ्गयोजनम् ।
न्यस्तो भवति वै मन्त्रः कालमाकल्पमन्त्रिणाम् ॥३६॥
अधस्तात् प्रणवं कृत्वा प्लुतो भवति पादयोः ।
पुनः पुनस्तथा हस्ते व्योकारश्चापि वामके ॥३७॥
हृदये तु मकारः स्याद् व्योकारः जठरे स्थितः ।
पिकारः पृष्ठसंस्थो वै नकारो मुखसंस्थितः ॥३८॥
प्रणवं स्थापयेन्मूर्ध्नि स च दृष्टो विधिः परः ।
न्यस्तो भवति वै मन्त्रो यावत्कालं तु साधनम् ॥३९॥
दशवर्ण बीज द्वारा अंग प्रत्यङ्ग को योजित करना चाहिये। मन्त्र विन्यस्त हो जाने पर मन्त्र साधक के यावत् जीवन के लिये हो जाता है। निम्न में प्रणव करे। पादद्वय में दो प्लुतस्वर हो। ऐसा बारम्बार करते हुये बाँयें हाथ में व्योकार, हृदय में मकार, जठर में व्योकार, पृष्ठ में पिकार, मुख में नकार तथा मस्तक में प्रणव की योजना करनी चाहिये। यह श्रेष्ठ विधि है। जब तक साधन है, तब तक मन्त्र न्यस्त रहता है॥३६-३९॥