भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 372

३५८ श्रीसाम्बपुराणम्

न सम्भाषेत वै शूद्रं प्रमादान् मन्त्रसाधकः।
अरक्तो रञ्जयेल्लोकान् कामी चेत्स्यादकामुकः ॥२३॥
मन्त्रसाधक प्रमाद के कारण भी कभी शूद्र से वार्त्ता न करे। अनासक्त होकर लोगों का मनोरञ्जन करे तथा (लोगों के) कामी होने पर भी स्वयं अकामुक निस्पृह ही रहे॥२३॥

गूढविद्याव्रतश्चापि प्रमादी स्यात् स साधकः।
क्रियां च सुदृढां कुर्यान्निविधि चेत्स साधकः ॥२४॥
गूढ़विद्या व्रताचरण में प्रमादी (?) हो जाय, सुदृढ़ क्रिया करे; किन्तु किसी की हिंसा न करे (यहाँ प्रमादी पद उचित नहीं लगता, इसे अप्रमादी होना चाहिये)॥२४॥

यावद् व्रतं तु यः कुर्यात्तस्य सिद्ध्यन्ति लौकिकाः।
जपित्वा संहितां मासं ततः साध्यं प्रयोजयेत् ॥२५॥
जो इतने दिनों तक व्रत करते हैं, उनके लौकिक कार्य सिद्ध हो जाते हैं। एक मास जप करने के उपरान्त साध्य का प्रयोग करना चाहिये॥२५॥

प्रसूतिं घातकं कृत्वा लवणस्याहुतिं क्रमात्।
सप्तरात्रं तथा हुत्वा वशे जन्तून् करोति सः ॥२६॥
प्रतिलोमैस्तथा वर्णैः साधको घातकस्य तु।
शृङ्गवेरविषे हुत्वा घातयेत् सर्वजन्तुकान् ॥२७॥
प्रसूति के घात का (?) समर्पण करके क्रमशः लवण की आहुति देनी चाहिये। सात रात्रि आहुति देने पर साधक सभी प्राणीगण को वश में कर लेता है। घातक के प्रतिलोम (?) वर्ण द्वारा साधक को शृंगवेर के विष की आहुति देनी चाहिये, इससे वह सभी जन्तुओं का विनाश कर सकता है॥२६-२७॥

अव्रती नैव संसिद्धेदजयः साधकः स वै।
मोहादारभते यस्तु हन्यते स विधानवित् ॥२८॥
जो व्रतानुष्ठान नहीं करते, उन्हें कभी भी सिद्धि प्राप्त नहीं होती। वह असंयमी है। जो मोहवशात् विधान जाने विना आरम्भ करता है, वह विनष्ट हो जाता है॥२८॥

वेधकामस्तु मन्त्रस्तु यदि रूपं समालिखेत्।
पूर्वोक्तेन विधानेन त्रिमुखान्तां चतुर्भुजाम् ॥२९॥
अष्टशक्तिपरो चैव दिक्पतीनां च रूपकैः।
रश्मयस्तु यथार्कस्य तथा मन्त्रस्य ताः स्मृताः ॥३०॥
यदि वेधकामना से मन्त्र का रूप अंकित किया जाय, तब पूर्वोक्त विधानानुसार त्रिमुखान्त चतुर्भुजा का अङ्कन करे। अष्टशक्ति तथा दिक्पाल का रूप, सूर्य की रश्मिसमूह जिस प्रकार से मन्त्र में स्मृत है, उसे अङ्कित करना चाहिये॥२९-३०॥