साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टषष्टितमोऽध्यायः ३५७
एतास्तु सिद्धयः प्रोक्ता उत्तमाः सर्वकामदाः। तदर्द्धा मध्यमा ज्ञेयाः कनीयस्योर्द्ध्वतोऽप्यतः॥१६॥
इस प्रकार सभी कामनाओं की उत्तम सिद्धि की बातें कही गयीं। इससे आधी मिलने पर मध्यम तथा आधे से कम मिलने पर कनिष्ठ सिद्धि कही गयी है॥१६॥
स स कामयति सिद्धो ह्यन्यस्मिन्सिद्धिमिच्छति। सहायैर्गुग्गुलुयोगैः सिद्धो ध्यानी ततोऽन्यथा॥१७॥
साधक एक विषय में सिद्ध होकर अन्य विषय की सिद्धि चाहने लगता है। गुग्गुलु के योग से ध्यानी साधक सिद्ध हो जाता है॥१७॥
भ्रष्टराज्यो नरो देवो यदि स्यात्सिद्धिशोधिते। असिद्धे तु गुणो योगे जपादेर्व्रतिनो नराः॥१८॥
यह न होने पर वह राज्यभ्रष्ट होता है। सिद्धि से शोधित होकर नर ही देवत्व लाभ कर लेता है। गुणयोग (त्रिगुणयोग) से असिद्ध हो जाने पर व्यक्ति जपादि द्वारा व्रत ग्रहण कर सकता है॥१८॥
सुखं क्रामन्ति वै सिद्धिं संतृप्ता मन्त्रदीपिताः। हीनो यो हि नरो योज्यः किं पुनः साधकेक्षते॥१९॥
मन्त्र द्वारा दीपित साधक तृप्त होकर सुख में सिद्धिलाभ के पथ पर अग्रसर होता है। हीन व्यक्ति भी मन्त्र द्वारा युक्त हो जाते हैं, फिर अन्य साधकों की तो बात ही क्या है॥१९॥
मासं गुग्गुलुहोमस्तु सर्वदा सर्वकर्मसु। जपवृद्धिः सदा योज्या संक्रमे मन्त्रिणा सदा॥२०॥
एक मास-पर्यन्त सभी कर्म में गुग्गुलु का होम करना चाहिये। मन्त्री साधक सर्वदा जप-वृद्धि करता रहे॥२०॥
सङ्कल्पक्रमणं युज्यान्नासङ्कल्पस्तु सिद्ध्यति। सङ्कल्पं तु ततः कृत्वा साध्यं मन्त्री तु साधयेत्॥२१॥
सभी कार्य में सङ्कल्प करना आवश्यक है। सङ्कल्प के अभाव में सिद्धि नहीं मिलती। अतः सङ्कल्प करके साधक (मन्त्रसाधक) साधार साधन करे॥२१॥
जितेन्द्रियः सत्यवादी दृढचर्यरतः शुचिः। मितभुग्मितभाषश्च साधयेत्सिद्धिमुत्तमाम्॥२२॥
सत्यवादी, द्वन्द्वों को जीतने वाला, दृढ़ रूप से आचरण में रत, पवित्र, अल्पाहारी तथा वाक् संयमी साधक उत्तम सिद्धि प्राप्त करते हैं॥२२॥