साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 370, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ें३५६ श्रीसाम्बपुराणम्
जपान्त में व्रत करना चाहिये। व्रत के पश्चात् भी साधन किया जाता है। साध्य मन्त्र के साधन के अन्त में मण्डल में योग करना चाहिये। सभी मन्त्र के अनुसार क्रमशः विधि का वर्णन किया गया। व्यञ्जनादि का योग करने से मन्त्र की असिद्धि होती है। अमेध्य युक्त होता है(?)॥७-८॥
तन्त्रोक्तं वेधमादध्याद् स्वमन्त्राकारमेव च।
साधयेदथ तन्त्रज्ञो यज्ञस्य नवसः क्रियात् ॥९॥
अपने मन्त्र के अनुसार तन्त्रोक्त वेध को ग्रहण करे। तदनन्तर तन्त्रज्ञ व्यक्ति यज्ञ का साधन करे॥९॥
होमान्ते ह्यग्निकुण्डायां चोदितो विधिनोत्थितः।
नरो न सिद्धिमान् यः स्यान्मन्त्ररूपी स दृश्यते ॥१०॥
चलत्यपि तथा मन्त्रं मन्यन्ते परिचारिकाः।
उद्यताश्च महाघोरा लक्ष्यन्ते मन्त्रिणः परे ॥११॥
अब विधिवत् उठकर होमान्त में अग्निकुण्ड का चालन करने से केवल लोक में ही सिद्धि नहीं मिलती, अपितु जो मन्त्ररूपी (देवता) हैं, वे भी दृश्यमान होते हैं॥१०-११॥
लक्ष्येद्यदि रूपेण शास्त्रस्योक्तस्य लक्षितम्।
सिद्धमन्त्रं विजानीयादन्यथा तु विनाशकः ॥१२॥
उत्थाय यदि मन्त्रेण स्वेनार्थः सम्प्रदृश्यते।
साध्यः स एव विज्ञेयोऽन्यथा घातयते तु तम् ॥१३॥
यदि इसे शास्त्रलक्षण के अनुसार स्वरूप में देखा जाय तब इसे मन्त्रसिद्धि कहा जाता है, अन्यथा यह विनाशक है। यदि मन्त्र उत्थित (जाग्रत) होकर अपने अर्थ को प्रकट कर दे तब उसे साध्य कहते हैं, अन्यथा वह मन्त्र साधक का विनाश करता है॥१२-१३॥
पातालदिशि वान्तस्तु क्रमतस्तत्र साधकः।
विद्यासिद्धो तु वै मन्त्री कामाद्वै घोरकं प्रदम् ॥१४॥
सिद्धो यः स श्रिया राजा सप्तद्वीपाधिपो बली।
भुक्त्वा तु पार्थिवान् भोगान् शिवं याति तनुक्षये ॥१५॥
पाताल (?) की ओर अथवा अन्तःकरण में क्रमशः साधक विद्यासिद्धि के विषय में कामना करे। विद्यासिद्धि से वह......(कामाद्वै घोरकं प्रदम् का कोई तात्पर्य ही नहीं है। प्रतीत होता है कि यहाँ कुछ पंक्तियाँ लुप्त हैं)। जो सिद्ध हो जाते हैं, वे ऐश्वर्य के साथ ही बलवान् सप्तद्वीप के अधिपति होते हैं। सभी पार्थिव भोगों का भोग करके देह के अन्त होने के पश्चात् शिवलोक प्राप्त करते हैं॥१४-१५॥