साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनसप्ततितमोऽध्यायः ३६३
विधिनाऽधीतविद्यश्च सर्वज्ञो बीजवित्तमः ।
कृतात्मा कृतविद्यश्च कृतगोदानदक्षिणः ॥७॥
पाकयज्ञो हविर्यज्ञो सोमयाजी तथैव च ।
शिवमार्गानुसारि च धनवान् योगनिश्चयः ॥८॥
यथाविधि विद्याध्ययन तथा सर्वज्ञता लाभकर श्रेष्ठ बीजविद् कृतात्मा, कृतविद्य को जिन्होंने गोदान दिया है, जो पाकयज्ञ, हविर्यज्ञ तथा सोमयाग करता है, जो शिवमार्ग का अनुसरण करने वाले हैं, वे धनवान तथा योगविषय के ज्ञाता हो जाते हैं॥७-८॥
यथोक्तज्ञानकर्मस्थो गुणदोषविवर्जितः ।
नास्ति निर्माल्यदोषश्च सर्वतत्त्वेषु सिद्ध्यति ॥९॥
यथोक्त ज्ञान तथा कर्म में अवस्थित व्यक्ति गुण तथा दोष से रहित हो जाते हैं। उनको निर्माल्य दोष भी नहीं होता और वे सर्वतत्त्वों को सिद्ध कर लेते हैं॥९॥
एवंगुणविशिष्टात्मा तपस्वी द्वन्द्ववर्जितः ।
क्रोधादिभिर्वियुक्तश्च समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥१०॥
ऐसे गुणयुक्त तपस्वी द्वन्द्व-वर्जित (शीतोष्ण, सुख-दुःख रहित) क्रोधादि रहित होते हैं। वे लोष्ठ (मिट्टी), प्रस्तर तथा काञ्चन में समदृष्टि होते हैं॥१०॥
आत्मवत् सर्वभूतेषु सर्वमात्मनि पश्यति ।
प्राणायामादिभिः खिन्नस्तुत्या च पुटसंशयः ॥११॥
सभी प्राणियों को आत्मवत् देखते हैं तथा अपनी आत्मा में ही सब कुछ देख लेते हैं। प्राणायाम-प्रभृति द्वारा खिन्न होने पर भी संशयरहित हो जाते हैं॥११॥
विशुद्धाचार आचार्यों भावतः प्रणियुज्यते ।
अनेन क्रमयोगेन विशेद् देवं परं प्रभुम् ॥१२॥
विशुद्ध आचारयुक्त आचार्य भाव से (गुरुभक्ति से) युक्त हो जायें। इस क्रमयोग द्वारा प्रभु परम देवता में प्रवेश करे॥१२॥
प्रतिकर्तृ प्रतिध्यायी विधिना तत्तदात्मनः ।
ध्यायँश्च शिवमात्मस्थमाचार्य्यं चापि शेषयेत् ॥१३॥
विधिवत् तत्तदात्मा का एवं आत्मस्थ शिव का ध्यान करके आचार्य का भी ध्यान करना चाहिये॥१३॥
प्रवक्ष्यति प्रयुक्तश्च दीक्षया विमलीकृतः ।
ध्यानयुक्तः सदा गच्छेद् ध्यायिनं परमं पदम् ॥१४॥