साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६४ श्रीसाम्बपुराणम्
दीक्षा से निर्मल होकर सर्वदा ध्यानयुक्त होकर ध्येय परम पद का लाभ करना चाहिये॥१४॥
चरेदुत्पन्नविज्ञानो मुक्तिव्रतमनिन्दितम्।
भूतव्रतादिसिद्ध्यर्थमेकान्ते सर्वतः क्षमी ॥१५॥
विज्ञानोत्पत्ति हो जाने पर अनिन्दित मुक्तिव्रत का आचरण करना चाहिये। सिद्धि के लिये भूतव्रताचरण करके सर्वतोभावेन धैर्यवान् होकर निर्जन में अवस्थान करना चाहिये॥१५॥
सन्त्यज्य सर्वकालात्मप्रधानहितवादिनम्।
मतानि विपरीतानि ध्यायेन्नित्यं सदाशिवम् ॥१६॥
सर्वकालात्म-प्रधान हितवादियों का तथा विपरीत मतसमूह का परित्याग करके नित्य सदाशिव का ध्यान करना चाहिये॥१६॥
निर्निमित्तं निराकारं वाग्विशुद्धं परात्परम्।
प्रमाणं विषयातीतमदृष्टान्तादिलक्षणम् ॥१७॥
वे निर्निमित्त, निराकर, विशुद्ध, परात्पर तत्त्व हैं। वे प्रमाणरूप, विषयातीत एवं दृष्टान्तरहित हैं॥१७॥
ज्योतिषां च परं धाम ज्ञानानां परमं पदम्।
तत्त्वानां परमं तत्त्वं गतीनां परमां गतिम् ॥१८॥
वे ज्योतियों के परम धाम (स्थान), ज्ञानसमूह के परमपद, तत्त्वसमूह के परमतत्त्व तथा गतियों की परमगति हैं॥१८॥
तत्त्वेन तन्तुतत्त्वं तन्तुता चैव सन्ततम्।
तेनैव तन्तुना नित्यं चिन्तयेत्तत्सुनिष्कलम् ॥१९॥
तत्त्व के द्वारा उनका तन्तुतत्त्वत्व है। ओत-प्रोतभाव से सर्वत्र उनकी सत्ता है। अतः तन्तु के द्वारा उन निष्कल सदाशिव का नित्य प्रति चिन्तन करना चाहिये॥१९॥
क्षुनिकाध्येययोगज्ञो बिन्दुनादतनुस्थितम्।
मुञ्चति क्षिप्रमात्मानं बुद्ध्वा ज्ञानमयं परम् ॥२०॥
क्षुनिका ध्येय योग (?) को जो जानते हैं, वे ज्ञानमय परमतत्त्व को जानते हैं और बिन्दु तथा नाद देहस्थ आत्मा का (देहबोध का) शीघ्र त्याग कर देते हैं॥२०॥
सतस्यास्य योगेन कालेन बहुधा नरः।
विधिना भावशुद्धेन देही बिन्दति सत्पदम् ॥२१॥
बहुधा निरन्तर अभ्यास के फल से देहधारी जीव भावशुद्ध विधान द्वारा सत्पद का लाभ करता है॥२१॥