साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 376, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकोनसप्ततितमोऽध्यायः
(तत्त्वमण्डलवर्णनम्)
तत्त्वानुसारेण पथः क्रमशोऽथानुवर्ण्यते ।
शिवलोकं यथा येन प्रविशेद् गृहवद् गृही ॥१॥
तन्त्रानुसार पदों का क्रमशः वर्णन करता हूँ, जिसके द्वारा जैसे गृही घर में प्रवेश करता है, तदनुसार ही साधक शिवलोक (शिवगृह) में प्रवेश करता है॥१॥
गणमण्डलतत्त्वज्ञस्तेषु पापरतः सदा ।
अनेकशोऽभिषिक्तश्च शिववद्गुरुपूजकः ॥२॥
गणमण्डल के तत्त्व को न जानने वाला, उसमें सदा पापरत (?), अनेक बार अभिषिक्त व्यक्ति शिवतुल्य होता है॥२॥
अर्पितः शिवयोनौ च गर्भश्चाम्बिकया धृतः ।
योगेन जनितश्चैव योगात्मा योगसम्भवः ॥३॥
शिवयोनि में अर्पित होकर अम्बिका द्वारा जब गर्भ को धारण किया जाता है तभी योग द्वारा योगात्मा योगसम्भव की उत्पत्ति होती है॥३॥
जातकर्मगुणैर्युक्तः स्नानादिगतकल्मषः ।
कृतरक्षश्च धूपेन सत्यात्मा सत्यसम्भवः ॥४॥
जन्म-कर्म-गुण द्वारा युक्त होकर स्नान से पाप हटता है। धूप से रक्षित होकर सत्यात्मा सत्यसम्भव हो जाता है॥४॥
प्रसृतस्त्रिवृतान्तं च मूर्ध्न्याघ्रातः शिवात्मना ।
कर्तृवत् कृतचूड़ोऽयं मन्त्रशक्तितनुस्थितः ॥५॥
निर्गत त्रिवृत्तान्त शिवरूप में मस्तक द्वारा आघ्रात होने पर मन्त्रशक्ति का देहस्थित चूड़ाकरण होता है॥५॥
विधिना चोपनीतस्तु मुञ्जाजिनधरः शुचिः ।
देवव्रतधरो मुण्डी जटी वा भैक्ष्यभोजनः ॥६॥
विधिवत् उपवीत धारण करके, मुञ्जा, मृगचर्म धारण करके पवित्र होकर देवता का व्रत पालन करना चाहिये। मस्तक का मुण्डन करके जटाधारी होकर भिक्षालब्ध वस्तु का भोजन करना चाहिये॥६॥