साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 355, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्विषष्टितमोऽध्यायः ३४१
पृथ्वी तथा आरुण के मध्य बीजयोनि होगी एवं पूर्व के समान ध्यानयोग एवं प्राणयोग होगा। उनके अध्ययन के पूर्व जो साधित हुआ है, उसका शान्ति विधान करके वह कृतकृत्य हो जाता है॥७-८।।
द्रव्यापहरणो वापि न्यासनिर्यातनेऽपि वा।
नाशने चैव देवानां ग्रहोत्पादनकर्मणि ॥९॥
कुर्वन्नेतानि योगी स्याद्वायुरग्निमिवेन्धनम्।
परस्थानां च सर्वेषामपाहारः प्रयुज्यते ॥१०॥
द्रव्य का अपहरण, न्यास का निर्यातन, किंवा नाशन तथा देवताओं के ग्रहोत्पादन कर्म में इनका विधान करके योगी वायु के समान होता है अर्थात् प्रज्ज्वलित अग्नि के लिये जैसे वायु सहायक होती है, वैसे ही योगी इन कर्मों में सहायक हो जाता है। अन्य से इसको गोपित रखना होता है॥९-१०॥
एष संहरते सर्वं यत्किञ्चिज्जगतीगतम्।
आरूढः संशये युञ्जन्नान्यथा तु कदाचन ॥११॥
स तु होमस्तथाग्नौ तु यदा रोगेण युज्यते।
तत्क्षणाद्धन्ति तान् सर्वान् सरोगान् हन्ति योनिजान् ॥१२॥
स्थावरं जङ्गमं वापि कृत्रिमं चापि यद्विषम्।
क्षणान्नाशयति ह्येषः यदि सम्यक् प्रयुज्यते ॥१३॥
वे इस जगत् के सब कुछ का संहार कर सकते हैं। आरूढ़ योगी संशय उपस्थित होने पर ऐसा करते हैं, अन्यथा नहीं करते। रोग होने पर अग्नि में होम करे। ऐसा होने पर यह सब, विशेषकर योनिज समस्त रोग तत्काल विनष्ट हो जाते हैं। यदि सम्यक् रूप से प्रयोग किया जाय तब स्थावर, जंगम अथवा कृत्रिम विष भी तत्काल नष्ट हो जाता है॥११-१३॥
संक्रमेण तथा व्याधिर्विपरीतेन योजितः।
चिकित्सामन्त्रपूर्वेण क्रीडार्थमनुयोजयेत् ॥१४॥
ध्यायेत्तु वारुणे वायुं शांत्यर्थं शिवसम्पुटे।
वृष्टिं कारयते ह्येष भूतयोनिः सबीजकः ॥१५॥
षड्विधं च सृजत्यस्य भूतसंहारिणस्ततः।
वायुनावेष्टयेत्सर्वं स्तमितं स्याज्जगन्महत् ॥१६॥
संक्रामक व्याधि होने पर विपरीत भाव से युक्त करना होगा। मन्त्र से इसकी चिकित्सा होगी। उसे क्रीड़ार्थ युक्त करे। शान्ति-हेतु शिवसम्पुट वारुण में वायु का ध्यान करना चाहिये। ऐसा करने से वृष्टि होगी। यह है—बीज के साथ भूतयोनि॥१४-१६॥