साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 354, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्विषष्टितमोऽध्यायः
(सर्वकार्यसिद्धिविधानम्)
सिद्धये सर्वकार्याणां विधानमभिधीयते।
सम्पुटानां यथा तत्त्वं कर्मणां सिद्धयेऽपि च ॥१॥
सकलीकृत्य देहं त्वं प्राणायामश्च योजयेत्।
शिवाख्यां परमाख्यां च योनिं हृन्नाभितस्तथा ॥२॥
वायुरग्नेरधस्ताच्च संहरन्सह पातकैः।
अन्तरे प्राणमायच्छेत्सद्यः सिध्यति योगवित् ॥३॥
ब्रह्मतत्त्वस्त्रिभिः शोध्यापद्य तेन शुभं भवेत्।
परस्यापि दहेन्मन्त्री ग्रामं नगरमेव च ॥४॥
समस्त कार्यसिद्धि-हेतु विधान तथा कर्मसिद्धि-हेतु सम्पुट के यथार्थ तत्त्व को कहा जा रहा है। अपनी देह को एकत्र (एकाग्र) करके प्राणायाम करे। शिवा एवं परमा योनि को हृदय तथा नाभि से, वायु को अग्नि के नीचे से पातक का संहार करे। अन्तर को प्राणयुक्त करने से योगी तत्काल सिद्धिलाभ करता है। ब्रह्मतत्त्व से तीन द्वारा (उपरोक्त तीन से) शोधन करने से अपना तथा अन्य का शुभ होता है। इसका मन्त्री (मननकारी साधक) ग्राम तथा नगर को भी दग्ध कर सकता है॥१-४॥
गृहं चापि दुराधर्षः भूतं चापि महाबलम्।
निहन्ति वै प्रयुक्तः सन् क्षणादग्निरिवेन्धनम् ॥५॥
व्याधिं चापि दुराबाधां तनुत्थां दैविकां तथा।
निहन्ति तत्र तूर्णं च दिवाकरव्रती नरः ॥६॥
दुर्धर्ष गृह तथा महाबलशाली भूत को (प्रयुक्त होने पर क्षणकाल में अग्नि जैसे काष्ठ को दग्ध करती है, वैसे) यह दग्ध कर देता है। सूर्यव्रतधारी नर देह के तथा दैव से दुराराध्य व्याधि का भी शीघ्र विनाश कर देता है॥५-६॥
बीजयोनिर्भवन्मध्ये पृथिव्याश्चारुणस्य च।
पूर्ववद् ध्यानयोगः स्यात्प्राणयोगस्तथैव च ॥७॥
तेषामध्ययने चैव ये पूर्वं चैव साधिताः।
शान्तिं चैतां प्रयुञ्जीत कृतकृत्यो भवेत्तदा ॥८॥