भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 347

एकषष्टितमोऽध्यायः ३३३

‘अ क च त प य श’ आत्मतन्त्र है। निम्न में व्योम है, यह (आत्मतन्त्र) है ऊपर। मूल में अंकित ‘हे न अ’ से लेकर ‘हे त ऊ त’ यह है निधन का निमित्त अतिरूप सिद्ध नवमी प्रधि।

षोडशर्चपरो दीर्घः पकारः स्यात्पराश्रये स्वरो दीपितः । आद्यश्च चेत्यान्ना स्युश्च शुश्चैकारेण दीपितः ॥१२९॥ व्याख्यातो वै नमस्त्वेष यथावल्लक्षणान्वितः । नमश्चैवोच्यते भूयोः यथा वर्णो यथाक्रमम् ॥१३०॥

१६ अक्षरों के पश्चात् दीर्घ ‘प’कार है। पराश्रय में स्वर दीप्त है। ‘च शु च’ ऐकार द्वारा दीपित है। इस प्रकार उन लक्षणयुक्त ‘नमः’ शब्द व्याख्यात हुआ। अब वर्ण तथा क्रम के अनुसार नमः शब्द की व्याख्या होगी।।२९-३०।।

आत्मतन्त्र अधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। आय अय अय अर आय अयन्तर अप अपय अत अनय एव विसर्गः षोडशः। अजाय परमेश्वरपराय अचेतन अपञ्चमो नभोमासः सिद्धा दशमी प्रधिः।

आत्मतन्त्र नीचे है। व्योम ऊपर है। ‘आय अय’ से लेकर ‘अपय अत अनय’ पर्यन्त षोडश विसर्ग है। अज परमेश्वर का अचेतन अपंचम नभो मास (श्रावण मास) दशमी प्रधि सिद्ध है।

स्वर एवास्तुत वनव्योम्नि स्यात्सानुनासिकः । पुनः सत्यश्च दीर्घश्च पश्चात्स्यादि नकारवान् ॥१३१॥ अयमेवमथाप्रमेय स्वरेफउकारदीपितः । पूर्ववच्च यकारः स्यात्तत्सर्वं पुनरेव तु ॥१३२॥

जो भी हो ‘त व न’ अनुनासिक के साथ व्योम में स्थित है। सत्य तथा दीर्घ है। बाद में ‘इ’ नकारयुक्त है। यही अनन्तर अप्रमेय है। स्वरेफ में ‘उ’कार दीपित है। पहले की तरह ‘म’कार होगा। वे सब (जो पहले कहे गये) पुनः होंगे।।३१-३२।।

अ क च ट त प य शान्ता इति स्थिते। अधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। अव अन उवय इ यन आवय इयन अधर षोडशो विसर्गः। तेन व्योम्नि अव्योम्नि ऊ रूपिन्। अरूपं सिद्धा एकादशी प्रधिः।

अ क च त ट प इत्यादि के रहने के कारण नीचे व्योम है। ये ‘अकचट’ आदि उसके ऊपर हैं। ‘अव अन’ (मूलोक्त) इत्यादि षोडश विसर्ग है। उसके द्वारा व्योम तथा अव्योम में ‘अ ऊ’ रूपवान है। अरूप सिद्ध है एकादश प्रधि।

परेऽपिन्यश्च रेफान्तः स्थश्च स्यात्स्वरवांस्ततः । मकारः प्रथमाश्चेत्युस्तेजश्च विविसर्गवान् ॥१३३॥

रेफान्तस्थ-स्वरयुक्त होगा। मकार प्रथमा होने के कारण तेज विसर्गयुक्त होगा।।३३।।