साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३३२ श्रीसाम्बपुराणम्
हीद्यायतश्च यस्तस्मादिकारान्तस्तथैव यत्। आवेद्भिद्धिः पुनर्यश्च गतकान्तः स उत्तमः॥२४॥
ऐकारान्त यकार अक्षय परम पद है। नकार मौन ‘म’ हो जाता है। तदनन्तर उकारयुक्त होगा। जो आयत है, वह रहता है विकारान्त। इस प्रकार पुनः गतकान्त उत्तम है। रेफयुक्त दो प़कारान्त उसके शेष स्वर हैं। ये दोनों ग्रीष्म मास हैं। अन्त में नमः शब्द कहना चाहिये॥२३-२४॥
पकारान्तौ सरेफौ द्वौ तदन्ते स्वर एव च। तावेतौ ग्रैष्मिकौ मासौ नमोऽन्तः सम्प्रवक्ष्यते॥२५॥
चारिणि अधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। ऐं ष ॐ ङ अ न ॐ ङ म अ न अ म ङ ग मा ह य त ह गमाहयः ॐ ङ य स्त ओ र अः षोडशो विसर्गः। ॐ यः ॐ नमो नमो नमः गुह्यातिगुह्याय गोप्तेन शा चतुर्थो चः। शुचिर्मासो ग्रैष्मऋतुः सिद्धा अष्टमी प्रधिः।
चारिणी नीचे है। ऊपर है व्योम। मूल मे अंकित ‘ऐं ष ॐ’ से लेकर ‘ओ र अः’ तक षोडश विसर्ग है। ‘ॐ यः ॐ नमो नमो नमः’ गुह्य से अतिगुह्य रक्षक है ‘न श’ चतुर्थ च। यह है—ज्येष्ठ मास, ग्रीष्म ऋतु तथा अष्टमी प्रधि सिद्ध॥२५॥
हकारान्तो नकारः स्याद्वस्तुत आयतः स्वरः। स्वरवन्तौ यशौ तश्च रेफादीरोयुतश्च यः॥२६॥
हकारान्त नकार वास्तव में आयत स्वर है। स्वरवन्त ‘य श’ तथा ‘त’ है। रेफ के पश्चात् ‘ई र’ होगा ‘य’ से संयुक्त॥२६॥
गोदीर्घार्धः प्रकृत्यन्तः ककारस्तच्च दीर्घवान्। यकारः स्वरवान् जादि यश्चैवोकारदीपितः॥२७॥ हकारान्तस्तथाकारो रेफ उकारवांस्ततः। बिन्दुरित्यपदो ज्ञेयो नभस्यः पूर्वपक्षकृत्॥२८॥
गोदीर्घार्ध प्रकृत्यन्त तथा दीर्घयुक्त ककार, स्वरयुक्त यकार आदि तथा उकार दीपित यकार। हकारान्त ‘आ’कार, तदनन्तर ‘उ’कारयुक्त रेफ। बिन्दु को अपद जानना चाहिये। नभस्य (भाद्रमास) पूर्व पक्षकारक॥२७-२८॥
अ क च ट त प य शा आत्मतन्त्रे। अधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। हे न अ घ आरी अ प अ सारव उप आ ग हे ध स क आत औ प उ जय हे त ऊ त निधनाय सर्वगोधकृता कठोऽतिरूपसिद्धा नवमी प्रधिः।