साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 345, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकषष्टितमोऽध्यायः । ३३१
उकारो दीपितो यः स्याद्रेफादिन्द्रायुधो धनुः।
स्वरवन्तौ यतौ तेन युयुक्त्यनु तथा भवेत्॥१८॥
उकार दीपित मकार होगा, रेफ के पश्चात् इन्द्र का आयुध धनुष। ‘य’ तथा ‘त’ स्वरयुक्त होंगे (?)। ‘प’ तथा ‘च’ स्वरयुक्त तथा कादि रेफान्त-युक्त होंगे। उसके पश्चात् खद्योत तथा जैसे कहा गया हृदय जानना चाहिये।।१७-१८।।
स्वरवन्तौ पचौ कादिरेफान्तश्च यथा युतः।
पश्चात्खद्योतविज्ञेयो हृदयश्च यथोदितः॥१९॥
भवेदधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। य म आ र द ध न अ यः अ त त उ प भः अ सः अ व आ क त र अ य अ उ ध अ र ऋ ह अ दः षोडशो विसर्गः। मूर्धाय तत्पुरुषाय व्यक्ताय अघोरहृदयाय च। अतस्तृतीयोरः शुक्नो मासः सिद्धा षष्ठी प्रधिः।
ऊपर व्योम है। ‘य म आ’ से लेकर ‘ह अ दः’ पर्यन्त (मूल में अंकित) १६ विसर्ग हैं। मस्तकरूप तत्पुरुष व्यक्त है तथा अघोर हृदय के उद्देश्य से तृतीय शुक्र (ज्येष्ठ) मास है। यह षष्ठी प्रधि सिद्ध है।
असौ ययतोऽन्यश्च ह्रस्वो यश्चायतो यतः।
मदमामध्यमेकाराद्गुकारेणैव दीपिताः॥२०॥
अदीर्घश्चैव दीर्घः स्यात्स्वरवन्तौ यशौ ततः।
दकारादियर्तुश्च स्याद्दीर्घो यस्तः स्वरेण च॥२१॥
उकारवान् मकारः स्याद् रेफादिस्तन्मनोन्नतः।
यद्देहान्ते च बिन्दुः स्यात्पक्षे शुक्ले तु पूजितः॥२२॥
यह ‘य य’ एवं अन्य ह्रस्व ‘ष’ आयत है। ‘म द म’, मध्यम ‘ऐ’ ‘गु’कार से दीपित है। अदीर्घ तथा दीर्घ होगा। तत्पश्चात् स्वरयुक्त ‘य’ तथा ‘श’, दकारादि ‘य’ एवं ‘तु’ दीर्घ होगा। ‘य’ तथा ‘त’ स्वरयुक्त होगा। ‘उ’कार-युक्त मकार होगा। रेफादि उसका मनोन्नत होगा। जिसके देह में बिन्दु है, वह शुक्ल पक्ष में पूजित होता है।।२०-२२।।
क च ट त प य शाः चारिणि अधस्ताद् व्योम अयमुपरिष्टात्। आ य अ ष आ च अ म य प द अ व व उ आ इ य अ स उ द य आ य त उ म अ र तः पा य वामदेवगुह्याय सद्योजाताय मूर्त्तये। असिद्धा सप्तमी प्रधिः।
‘क च ट त प’ इत्यादि मूल में अंकित अक्षर वामदेवगुह्य सद्योजात मूर्ति के उद्देश्य से कहे गये हैं। यह है सप्तमी प्रधि।
ऐकारान्तो यकारः स्यादक्षरं परमं पदम्।
नकारो मौन मश्च स्यात्ततो गाभ्यादुकारवान्॥२३॥