भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 348

३३४ श्रीसाम्बपुराणम्

यो योऽन्तस्थः प्रकृत्यन्तो विसर्गश्च पुनश्चतो। नभस्व एष व्याख्यातो वर्षाख्यश्च ऋतुस्त्वयम्। इनस्त्विये अधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। इय अपर अथ अम एत अय एत अपद्रुत षोडशो विसर्गः। यिनः प्रथमः। तेजः ॐ ज्योतिः ऊं षष्ठो वः नभस्यो मासः। वर्षाख्य ऋतुः सिद्धा द्वादशी प्रधिः।

जो जो अन्तस्थ हैं तथा प्रकृति के अन्त में जो विसर्ग है, इन्हें भाद्रमास कहकर व्याख्या की जाती है। यह है—वर्षाकाल। ‘इन’ नीचे है, व्योम ऊपर है। ‘इय’ से लेकर ‘अपर’ (अपद्रुत) पर्यन्त षोडश विसर्ग हैं। ‘ॐ ज्योति’ से लेकर ‘षष्ठो वः’ पर्यन्त भाद्रमास है, वर्षा ऋतु। यह है सिद्ध द्वादशी प्रधि।

इष आदिगकारः स्याद्धूयाच्च तदनन्तरम्।
अश्श्लो लग्न ऐकारं आद्यः स्यात्तदनन्तरम्॥३४॥
धुकारश्च यआद्यश्च तस्मेशाद्यस्तथैव च।
अकाराद्दीपितो नः स्यादश्रैकारेण दीपितः॥३५॥

‘इ ष’ आदि गकार है। उसमें ‘अश्श्ल’ लग्न है। उसमें ऐकार आद्य होगा। धूकार एवं आद्य य, उसी तरह भस्मेशाद्य अकार के पश्चात् दीपित है एवं नकार ऐकार के द्वारा दीपित है॥३४-३५॥

क च ट त प य शा भूतिरधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। अदूर अयम अ अगन अभव अम अ अभय सम अ आन य ऐ षोडशतत्त्वअरूपअनये अधूप अभस्म अनादियं सिद्धा त्रयोदशी प्रधिः।

‘क च ट त प य श’ भूति के निम्न है। व्योम ऊपर है। ‘अदूर अयम’ इत्यादि से लेकर ‘आन य ऐ’ षोडश तत्त्व हैं। ‘अरूप अनग्न अधूप अभस्म अनादिः’ त्रयोदश प्रधि सिद्ध है।

दीर्घा नकाराश्चत्वारो धूकाराश्च तथैव च।
ऊकारान्तः समो ज्ञेयः सोक्षरोभयदीपितः॥३६॥
पुनर्विसर्गरहितो ह्रस्वो वसु विसर्गवान्।
अक्षरश्शोथवक्रान्तो विसर्गेण विभूषितः॥३७॥

दीर्घ नकार तथा उसके धूकार को उकारान्त समान जानना चाहिये। वह उकार उभय दीपित है। अकार विसर्गरहित ‘र’ स्व वसु विसर्गयुक्त है। ‘श’ अक्षर यक्रान्त विसर्ग से विभूषित है॥३६-३७॥

भूरधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। आन आन ऊध ऊध ऊं ऊं रभ ऊभ ऊं आवसः षोडशः। ना ना ना ना धू धू धू धू ऊं भुवः ऊं स्वः आसप्तमो रसः इषो मासः। सिद्धा चतुर्दशी प्रधिः।