साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 349, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकषष्टितमोऽध्यायः ३३५
नीचे पृथ्वी। व्योम ऊपर। 'आन आन' से लेकर 'ॐ आवसः' पर्यन्त षोडश तत्त्व हैं। 'नाना नाना' से लेकर 'स्व आसप्तमो रसः' पर्यन्त आश्विन मास है। यह चतुर्दश प्रधि सिद्ध है।
ऊर्जस्योर्क आदिः स्यान्नद्रेकारेण दीपितः।
स्वरवन्तौ धनौ भूयो निधौ नः परिकीर्त्तितः॥३८॥
ओंकारान्तो नकारः स्याद्भादिर्भौवस्वरान्वितः।
प्रकृत्यासो मकारश्च शकारो बिन्दुरेव च॥३९॥
उर्ज का अर्क आदि होता है। नद् ऐकार द्वारा दीपित 'ध' तथा 'न' स्वरयुक्त है। और 'नि' तथा 'ध' यह दो 'न' कहकर कीर्तित हो गये। ॐकारान्त 'न'कार का 'भादि' 'भौव' स्वरयुक्त है। प्रकृति के साथ सोमकार तथा शकार बिन्दु है॥३८-३९॥
अ क च ट प यशाः महीरधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। आ इ न अ धः अ म इ न अ ध अ न ल इ न अधः ॐ न अ द भ अ व इ श अवः अ स षोडशतत्त्वं अनिधननिधानोद्भवशिवशः। सिद्धा पञ्चदशी प्रधिः।
'अ क च ट त प य श' पृथ्वी के नीचे है। व्योम ऊपर है। मूलोक्त 'आ इ न' से लेकर 'अवः अ स' षोडश तत्त्व अनिधन निधानोद्भव शिव है। पञ्चदश प्रधि सिद्ध है।
रेफपूर्वो दकारः स्यात्परो स्वरेण मानवः।
आदिर्मध्याह्वकारेण मकारश्च स्वरान्वितः॥४०॥
पकारादीपितो हश्च साक्षाद्दीर्घैरमाततेः।
हकार अपतोदः स्यादेकारेण तु दीपितः॥४१॥
वः स्वः स्यात् स्वरवान् रश्च दकारोभयतस्तथा।
अन्तवतींशरेखा लक्षणतश्च शरद्ऋतुः॥४२॥
रेफपूर्वक दकार 'आ' के पश्चात् स्वरयुक्त मानव। आदि मध्याह्नकार के साथ स्वरयुक्त मकार। पकार दीपित 'ह' साक्षात् दीर्घयुक्त अम्। हकार एकार द्वारा दीपित। 'वः स्वः' एवं स्वरयुक्त 'र'। ऐसे ही उभयतः दकार अन्तवतीश रेखा-लक्षणार्थ यह है शरद् ऋतु॥४०-४२॥
महाधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। अर च अप अर आम अत मनप असव अर अम आह यत अस आद्यः षोडशो विसर्गः। पूर्वपरआत्मने महेश्वर महादेवसमाः अष्टमोदीरः। ऊर्जो मासः। शरद्ऋतुः। असिद्धा षोडशी प्रधिः।
महा नीचे। व्योम ऊपर। 'अर च' से लेकर 'अस आद्यः' षोडश विसर्ग। (?)...… कीर्त्तिक मास। शरत् ऋतु। असिद्ध षोडश प्रधि।