साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 350, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ें३३६ श्रीसाम्बपुराणम्
एकारान्तः सहैवः स्यात्तरादिस्तु छान्तवः।
नमो दीर्घो हकारः स्यादेकारेण तु तत्सह ॥४३॥
स्वरवान्वै जकारोद्वयशोकारेण दीपितः।
ग आयतः प्रकृश्नावयकारस्तच्च पूर्ववत् ॥४४॥
वयव्यौमाधुकारेण दीपितौ तु सबिन्दुकौ।
विन्द्वन्तः शुक्लपक्षः स्याद्व्योमन्तः स्यादिरुच्यते ॥४५॥
ऐकारान्त के साथ 'इव' तरादि छान्तव। 'न' तथा 'म' दीर्घ। उसके साथ 'ए'कार युक्त होगा। हकार स्वरयुक्त होकर दो 'श' द्वारा दीपित इत्यादि॥४३-४५॥
(श्लोक ४४-४५ का अर्थ कुछ स्पष्ट नहीं है; अतः अनुवाद में असमर्थता है)
भूम्यधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। ऐव असर अन अम आह ऐत अज आय आग इव अव ऊम षोडशतत्त्वं चेश्वरम्। हृातेजावायोगाधिपतये मुष्ण मां च असिद्धा सप्तदशी प्रधिः।
भूमि नीचे है। व्योम ऊपर है। 'ऐव असर' से लेकर 'इव अव ऊम' षोडश तत्त्व तथा ईश्वर हैं। 'गणाधिपति हमें मुक्त करो'। यह असिद्ध सप्तदश प्रधि है।
चकारादिर्मे शुक्लेऽथ स्याद्रान्तो यो मधौ ततः।
पुनरेतेशकारा फो दीर्घाभूयडवचतौ ॥४६॥
स्वरवन्तौ च तौ द्विस्तौ विसर्गश्चान्तिमे पदे।
सह ऐष समाख्यातस्सहस्यः सूर्यसंततः ॥४७॥
(इन दोनों का अर्थ स्पष्ट नहीं है; अतः आंशिक अर्थ प्रस्तुत है)
चकारादि 'म', रान्त 'म'................। पुनः ये 'शकार', 'फ' दीर्घ.........। स्वरयुक्त दो मकार। शेष विसर्ग। इसे 'ऐष' कहा है। यह है—पौष मास॥४६-४७॥
भूम्यधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। अव अपर अम अल अपर अल अप अथ अश अर च अम अर अव षोडशो विसर्गः। वः प्रथमः ऊं सर्वः ऊं भवः ऊं अनवमोनः सहोमासः सिद्धाष्टादशी प्रधिः।
भूमि है निम्न, ऊपर है यह व्योम। 'अव अपर' से लेकर 'अम अर अव' षोडश विसर्ग। 'व' प्रथम, सर्व, भव, अनवमान। पौष मास। यह अष्टादशी प्रधि सिद्ध।
भं आदिर्व ओंकारान्तो दादिर्भः स्यात्स्वरेणवः।
शकारो वश्च रेफान्तो द्विरकारान्तो तस्तथा ॥४८॥
उकारवान् सश्च सोऽथ रेफान्तः पादशौ ततः।
रेफादीर्घः सदीर्घान्तः शुक्लोऽयं बिन्दुदीपितः ॥४९॥