भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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३३८ श्रीसाम्बपुराणम्

तथा आसक्ति के कारण जो दोष उत्पन्न होता है, वह इस व्रत से निश्चित नष्ट हो जाता है। भूत व्रतान्त सिद्धि के लिये एकान्त मनोरम स्थान में अपने समान सहायक रखकर बीज मन्त्रों द्वारा पाप (कल्मष) निर्दग्ध कर दिया जा सकता है॥५३-५५॥

एकादशा निजव्याधिर्बोद्धव्याङ्गुष्ठमस्तके।
ललाटे तेन संपीड्य सर्वविघ्नान्निवारयेत्॥५६॥

एकादश व्याधि (नाश-हेतु) अंगुष्ठ को मस्तक (पर लाकर) जानकर उससे ललाट को दबाने से समस्त विघ्न शान्त हो जाते हैं॥५६॥

आहारार्थं च सर्वेषां चरेत्सम्यग्यथाक्रमम्।
वारुणे सलिलाहारं शुक्त्यजाक्षीरपोऽपि वा॥५७॥
शक्तस्य जपतस्तस्य विघ्नान्येतानि लक्षयेत्।
मेघानां स्तनितं विद्युद्वृष्टिक्षोभश्च सागरे॥५८॥
मत्स्यादयश्च दृश्यन्ते व्रते वारुणसंज्ञके।
कापिलं घृतमाग्नेये भुञ्जतो व्रतमाचरेत्॥५९॥

सबके आहारार्थ यथाक्रम से आचरण करे। जल में जल का पान करे अथवा चार तोला परिमाण बकरी के दुग्ध का पान करे। जप में समर्थ व्यक्ति इन विघ्नों को लक्ष्य करे—मेघ ध्वनि, विद्युत्, वृष्टि से सागर की क्षुब्धता (तूफान आदि)। वारुण नामक व्रत में मत्स्यादि। आग्नेय व्रत में कपिला गौ के दूध से घृत निकाल कर (उसका भोजन करके) व्रत का आचरण करे॥५७-५९॥

सर्वमादीप्यते तस्य शुक्लाद्धं च तथोदकम्।
वायव्येऽनिलभक्ष्यः स्याच्छ्वेताजाक्षीरभुग्यथा॥६०॥
विघ्नं पात्राशने पातो वातक्षोभश्च दारुणः।
आशोकं गोरसं पीत्वा व्रतमेतत्समाचरेत्॥६१॥

(अग्नि व्रत में) तदनन्तर कुछ दीप्त होकर तथा शुक्ल अर्घ्य का जल (ग्रहण करे)। वायुव्रत में वायुपान करे तथा श्वेत वर्ण की बकरी के दुग्ध का भक्षण करे। विघ्न परिलक्षित होते हैं—विद्युत्पात, दारुण वातक्षोभ। दुःख उपस्थित होने के पूर्व तक गाय का दुग्ध पान करे तथा व्रताचरण करे॥६०-६१॥

विघ्नं सर्गस्य सम्पातो ज्योतिषां पतनं तथा।
भूतानामिह सर्वेषामशक्तश्चरितुं व्रता॥६२॥
भूतयोनिव्रतं कुर्यादेषामन्यतमेन तु।
व्रतेन माससिद्धायामस्यां सिद्धा भवन्ति ते॥६३॥
हन्यादेतेन वै रोगान्दिव्यान्भौमान्स्वदेहजान्।
एतदेव व्रतङ्कुर्य्याच्छान्तिकर्मणि मन्त्रवित्॥६४॥