भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ३७५

परमं कारणं चैव क्रियाभूतात्मना सह।
बीजयोनिश्च सृष्टिश्च संहारश्चाष्टमः पुनः॥१८॥

बीजयोनि परम कारण है तथा भूतात्मा के साथ क्रियारूप, सृष्टिरूप और अष्टम संहार, रूप है॥१८॥

विधानं देवदेवस्य मनसाप्यथ कीर्त्तयेत्।
प्रविशेत् परमं देवं विमुक्तः सर्वबन्धनैः ॥१९॥

देवदेव (सूर्यदेव) के विधान का मन ही मन स्मरण रखना चाहिये। इससे समस्त बन्धनों से मुक्ति मिलती है तथा परमदेव की प्राप्ति होती है॥१९॥

एवमेव सदा देवः कृत्स्नस्य जगतो गुरुः।
पूज्यो ध्येयस्तथेज्यश्च विद्वद्भिः परमार्थकः॥२०॥

इति श्रीसाम्बपुराणे बीजप्रसवो नाम चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

इस प्रकार से सूर्यदेव सर्वदा समस्त जगत् के गुरु हैं। वे विद्वद् गण द्वारा यथार्थतः पूज्य हैं। ध्येय तथा स्तुत हुये हैं॥२०॥

श्रीसाम्बपुराण में बीजप्रसव नामक चौहत्तरवाँ अध्याय समाप्त