साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 390, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चसप्ततितमोऽध्यायः
(बीजप्रसवः)
उक्तं तद्योनिबीजं च साङ्कुरं प्रसवं महत्।
तत्पुण्यफलदं मह्यं मुक्तिदं सर्वदेहिनाम्॥१॥
यह योनिबीज की कथा अंकुर तथा महत् की उत्पत्ति के साथ कही गयी, जो हमारे लिये पुण्यप्रद तथा फलप्रद है एवं सभी देहधारियों को मुक्ति देने वाली है॥१॥
पूर्वस्यां संशयश्चैवं दीप्तायामुच्यतां पुनः।
तं विधिं संशयं देव भक्तः स्यामहम्भास्करेः॥२॥
पूर्व में जो संशय था, दीप्त सूर्य के सम्बन्ध में उस संशय को दूर करिये। हे देव! वह विधि कहिये, जिससे मैं दुर्लभ भक्त हो जाऊँ॥२॥
श्रुत्वा विज्ञापनं तस्मै प्रोवाच विधिवत् प्रभुः।
समयादि यथातत्त्वं दीक्षां सम्यक्चतुर्विधाम्॥३॥
परीक्षिताय भक्ताय सुश्रूषणरताय च।
तपस्विने विनीताय क्रोधादिरहिताय च॥४॥
उनका निवेदन सुनकर प्रभु सूर्यदेव ने यथाविधि समयादि यथार्थ तत्त्व एवं सम्यक् चतुर्विध दीक्षा की बातें कहीं; क्योंकि साम्ब परीक्षित भक्त थे, वे शुश्रूषा में रत, तपस्वी, विनीति तथा क्रोधादि से रहित थे॥३-४॥
पूजयित्वाथ देवेशं प्रागुक्तेन विधानतः।
आवाहयत्ततस्तस्मिन् भूतयोनिदशात्मिकाम्॥५॥
सूर्यदेव कहते हैं—पूर्वोक्त विधान के अनुसार देवाधिपति सूर्यदेव की पूजा करे। उनमें दशात्मिका भूतयोनि का आवाहन करे॥५॥
दृष्ट्वा च सर्वभूतैश्च श्मशाने सकलीकृतम्।
सप्तकृत्वोऽथ संपात्य दर्भपुञ्जे स्थितस्ततः॥६॥
अन्यत्र स्थापितं शिष्यमाज्याद्यैश्च सुपूजितम्।
पावयेत्तत्तिरूर्ध्वं वै नार्यैः पिङ्गलकैरघः॥७॥
आहुतीर्जुहुयाद्भूतैः सर्वैरिव यथाक्रमम्।
सम्पातान् पातयेच्छिष्यो मुक्तदोषस्तथा भवेत्॥८॥