साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 396, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ें३८२ श्रीसाम्बपुराणम्
यथोक्तं पुरुषं देवं सन्निवेश्य प्रपूज्य च।
विज्ञापयेच्च तस्यार्थं यथानुग्रहवान् भवेत् ॥८॥
तदनन्तर अग्नि के दक्षिण में सूर्ययोनि में विधानतः कुशासन बिछाकर वहाँ संयत होकर बैठ जाय। यथोक्त देवता पुरुष को सन्निवेशित करके पूजा द्वारा निवेदन करे, जिससे अनुग्रह मिले॥७-८॥
आग्नेय्यां दिशि च प्राच्यां पुरुषं सन्निवेश्य च।
आपदं संस्थितैर्मन्त्रैर्जुहुयात्तु शिरः पुमान् ॥९॥
आग्नेय तथा पूर्व की दिशा में सूर्यदेव का सन्निवेश करके आपत्ति में संस्थित मन्त्र द्वारा आहुति देनी चाहिये॥९॥
अभिमन्त्र्य च तं शिष्यं जुहुयाच्च शतं शतम्।
स्वेन स्वेन तु मन्त्रेण सृष्ट्वा येन यथाविधि ॥१०॥
वह शिष्य को अभिमन्त्रित करके अपने-अपने मन्त्र से यथाविधि सृष्टि करे। शत-शत बार आहुति देनी चाहिये॥१०॥
अक्षयेन तु दैवेन सर्वेषामनु मन्त्रिणाम्।
जानुतो भूतयोनिः स्याद्वनात्मा धातुना समम् ॥११॥
लिङ्गे प्रसवयोनिश्च प्रतिबीजस्तु विनिःसृता।
नाभौ च भावयोनिः स्याद्बीजमस्य दशात्मकम् ॥१२॥
अक्षय दैव सबकी अनुमन्त्रणा है। जानु तक भूतयोनि होती है। वनात्मा धातु के समान है। लिङ्ग प्रसवयोनि प्रतिर्वन्ति (?) विनिसूत होती है। नाभि में भावयोनि है। इसका बीज है—दशात्मक॥११-१२॥
हृदये परमा योनिर्जाता सा परमेष्ठिनः।
कारणाख्या क्रियायोनिर्बाह्वी चैषा च बीजयेत्॥१३॥
परमेष्ठि के हृदय में परम योनि उत्पन्न होती है। कारण नामक यह क्रिया योनि है। इससे वाल्ही (गन्धर्वविशेष) बीज उत्पन्न होती है॥१३॥
संहारः चक्षुरुर्ध्वं स्यादष्टबीजं प्रकीर्तितम्।
सर्वाश्च जुहुयाद् ध्यायन् साधके चात्र विन्यसेत् ॥१४॥
अङ्गुष्ठेन सपुष्पेण न्यासः सर्वत्र शस्यते।
प्रतिमानं च भस्म स्याद्देयं पात्राधिवासितम् ॥१५॥
विश्वसृक्तर्पणं कुर्यात् साधकस्य च सम्पुटम्।
निवारस्तेन विघ्नानामन्यत्रापि प्रयुज्यते ॥१६॥