भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ३८३

संहार चक्षु ऊर्ध्व में होते हैं। उसे अष्टबीज कहा गया है। ध्यान करके सबको आहुति प्रदान करे तथा साधक में उसका विन्यास करे। पुष्प के साथ अंगुष्ठ द्वारा न्यास प्रशंसनीय है। भस्म है—प्रतिमान। उसे पात्राधिवासित करके देना होगा। विश्वस्रष्टा को तर्पण करना उचित हैं। तथा (यहाँ साधक का सम्पुट है। इसके द्वारा विघ्नों का निवारण होता है, अन्यत्र भी ऐसा प्रयोग करना चाहिये)॥१४-१६॥

देवस्याथ सकाशे तु श्राव्यं तस्यानुशासनम्।
अनुग्राह्यास्त्वया शिष्या यथा शास्त्रमनिन्दिताः ॥१७॥
संयुज्य देववच्चापि गुरुं तद्वत् सगोचरम्।
सर्वं प्रदक्षिणीकृत्य ततो देवं विसर्जयेत् ॥१८॥

इति श्रीसाम्बपुराणे विसर्जनविधिर्नाम सप्तसप्ततितमोऽध्यायः

देवता के सामने उसके अनुशासन को सुनाये तथा अनिन्दित शिष्यों पर अनुग्रह करे। देवता के समान गुरुदेव को देखना चाहिये। सबकी प्रदक्षिणा करे। तदनन्तर देवता का विसर्जन करे॥१७-१८॥

श्री साम्बपुराणोक्त विसर्जनविधि नामक सतहत्तरवाँ अध्याय समाप्त