भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 398, कुल 424 में से

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अष्टसप्ततितमोऽध्यायः

(संन्यासमार्गः)

संन्यासस्य त्वहं मार्गं संवक्ष्ये तत्त्वतः परम्।
समयाद्यं च पाशान्तं कृत्वा तु श्रावणादृते ॥१॥
न च पूजा प्रयोक्तव्या हुत्वा होमं यथाविधि।
हृदये हृदये न्यस्य होमभस्मादि निर्मितम् ॥२॥
स्वयोनौ पातयेदेवं ब्रह्मसूत्रं सकर्मकम्।
जुहुयाद्विश्वसृक्चाग्नौ वाचयेदगृहागतम् ॥३॥
स्वयोनौ यातयेदेवं ब्रह्मसूत्रं सकर्मकम्।
जुहुयाद्विश्वसृगग्नौ वाचयेदगृहागतम् ॥४॥

संन्यास श्रेष्ठ पथ है। उसे अब तत्त्वतः मैं कहूँगा। नियम से लेकर पाशान्त (पाशों के उच्छेद तक) अनुष्ठान क्षरण व्यतीत करे। इसमें पूजा नहीं करना है। यथाविधि होम करके प्रति हृदय में होम-भस्मादि निर्मित वस्तु विन्यस्त करे। स्वयोनि में ऐसे सकर्मक ब्रह्मसूत्र का पालन करना चाहिये। विश्वसृक् अग्नि में होम करे। अब अगृहागत का वर्णन करूँगा। अग्नि की एक आत्मा समस्त भुवन की प्रदक्षिणा करता है, बीज अक्षरों से पुण्य भस्मोदक का पान करे॥१-४॥

अग्निं प्रदक्षिणीकृत्य भुवनान्यस्य चात्मनि।
पिबेद् भस्मोदकं पुण्यं बीजेनैवाक्षरेण सः ॥५॥
संन्यस्तमिति च क्रमादाचरेच्च व्रतानि च।
प्रदक्षिणमतः कृत्वा देवमग्निं गुरुं तथा ॥६॥
सशिष्यं वपनं कृत्वा त्यजेत् सर्वमतः परम्।
सुखदुःखे समे कृत्वा देवाल्लोकाच्च सर्वतः ॥७॥

सब कुछ का त्याग करता हूँ, ऐसा कहे। व्रतों का पालन करे। तदनन्तर देवता, अग्नि तथा गुरु की प्रदक्षिणा करे। शिष्य के साथ क्षौरकार्य करके सब कुछ का त्याग करे। दैव तथा पार्थिक लोकों से आगत सुख-दुःख में समान भावना रखनी चाहिये॥५-७॥

पूतोदकेन कार्यं वै पाणिपादं चरेच्छनैः।
वर्षासु शून्यमागारं मूलं घृतस्य नाश्रयेत् ॥८॥
मौनी स्यात्तु त्यजेद् देहं ध्यायेच्च हृदयाधिपम्।
देवं दृष्ट्वा गुरुं चापि मनसा पूजयेच्च सः ॥९॥