साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 395, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तसप्ततितमोऽध्यायः
(विसर्जनविधिः)
शिवतुल्यत्वमस्य स्यात् पाशच्छेदस्तु येन वै।
तमतो वर्णयिष्यामि संस्कारं क्रमशः परम्॥१॥
यह संस्कार का शिवतुल्यत्व कहा गया। जैसे शिव द्वारा पाश-छेदन होता है, वैसे ही संस्कार के द्वारा जीवन के बन्धन छिन्न हो जाते हैं। अतः क्रमशः श्रेष्ठ संस्कार का वर्णन करूँगा॥१॥
संस्कृत्य पूर्ववद् धीरो दृष्ट्वा देवं यथाविधि।
आलिखेन्मण्डलं सम्यग् भूतानां विधिवत्ततः॥२॥
धीर व्यक्ति पूर्व की तरह संस्कृत होकर यथाविधि देवदर्शन करके सम्यक् रूपेण मण्डल का अंकन करे। तदनन्तर विधिवत् भूतगण के मण्डल का अंकन करे॥२॥
तस्मिन्निवेश्य भूतानां सम्पूज्यैनं यथाविधि।
भूताधिपेन तत्त्वज्ञो मन्त्रपूतजलैस्तु तत्॥३॥
द्रव्यैस्तु मङ्गलैश्चैवमभिषिच्य सुपूजितः।
अलङ्कृतं गृहीत्वाथ देवायैनं निवेदयेत्॥४॥
उस मण्डल में भूतों का निवेश करके यथाविधि पूजन करके तत्त्वज्ञ साधक भूतपति का मन्त्रपूत जल एवं माङ्गलिक द्रव्य से अभिषेक करके पूजा करके इस अलंकृत का देवता के उद्देश्य से निवेदन करे॥३-४॥
प्रदक्षिणामतः कृत्वा विज्ञाप्यो विधिवत् प्रभुः।
प्रणम्य विधिवद्धीरः प्रसीदैतिह्यमुं वदेत्॥५॥
पप्रच्छ शिताम्यस्यादुक्तश्चापि यथासुखम्।
पाशेभ्यो मोक्षयेच्चैनं गुरुत्वं वै प्रसादजम्॥६॥
तदनन्तर प्रदक्षिणा करके विधिवत् प्रभु को बताये अर्थात् धीर साधक यथाविधि प्रणामोपरान्त ‘आप प्रसन्न होईये’ यह कहे। यह जिज्ञासा करे। यथासुख से कहे कि गुरु की कृपा से बन्धन से मुक्ति हो रही है॥५-६॥
अथास्य दक्षिणेनाग्नौ सूर्य्ययोन्यां विधानतः।
दत्वा दर्भासनं तत्र उपविश्य सुयन्त्रितम्॥७॥