साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
सप्तसप्ततितमोऽध्यायः
(विसर्जनविधिः)
शिवतुल्यत्वमस्य स्यात् पाशच्छेदस्तु येन वै।
तमतो वर्णयिष्यामि संस्कारं क्रमशः परम्॥१॥
यह संस्कार का शिवतुल्यत्व कहा गया। जैसे शिव द्वारा पाश-छेदन होता है, वैसे ही संस्कार के द्वारा जीवन के बन्धन छिन्न हो जाते हैं। अतः क्रमशः श्रेष्ठ संस्कार का वर्णन करूँगा॥१॥
संस्कृत्य पूर्ववद् धीरो दृष्ट्वा देवं यथाविधि।
आलिखेन्मण्डलं सम्यग् भूतानां विधिवत्ततः॥२॥
धीर व्यक्ति पूर्व की तरह संस्कृत होकर यथाविधि देवदर्शन करके सम्यक् रूपेण मण्डल का अंकन करे। तदनन्तर विधिवत् भूतगण के मण्डल का अंकन करे॥२॥
तस्मिन्निवेश्य भूतानां सम्पूज्यैनं यथाविधि।
भूताधिपेन तत्त्वज्ञो मन्त्रपूतजलैस्तु तत्॥३॥
द्रव्यैस्तु मङ्गलैश्चैवमभिषिच्य सुपूजितः।
अलङ्कृतं गृहीत्वाथ देवायैनं निवेदयेत्॥४॥
उस मण्डल में भूतों का निवेश करके यथाविधि पूजन करके तत्त्वज्ञ साधक भूतपति का मन्त्रपूत जल एवं माङ्गलिक द्रव्य से अभिषेक करके पूजा करके इस अलंकृत का देवता के उद्देश्य से निवेदन करे॥३-४॥
प्रदक्षिणामतः कृत्वा विज्ञाप्यो विधिवत् प्रभुः।
प्रणम्य विधिवद्धीरः प्रसीदैतिह्यमुं वदेत्॥५॥
पप्रच्छ शिताम्यस्यादुक्तश्चापि यथासुखम्।
पाशेभ्यो मोक्षयेच्चैनं गुरुत्वं वै प्रसादजम्॥६॥
तदनन्तर प्रदक्षिणा करके विधिवत् प्रभु को बताये अर्थात् धीर साधक यथाविधि प्रणामोपरान्त ‘आप प्रसन्न होईये’ यह कहे। यह जिज्ञासा करे। यथासुख से कहे कि गुरु की कृपा से बन्धन से मुक्ति हो रही है॥५-६॥
अथास्य दक्षिणेनाग्नौ सूर्य्ययोन्यां विधानतः।
दत्वा दर्भासनं तत्र उपविश्य सुयन्त्रितम्॥७॥
३८२ श्रीसाम्बपुराणम्
यथोक्तं पुरुषं देवं सन्निवेश्य प्रपूज्य च।
विज्ञापयेच्च तस्यार्थं यथानुग्रहवान् भवेत् ॥८॥
तदनन्तर अग्नि के दक्षिण में सूर्ययोनि में विधानतः कुशासन बिछाकर वहाँ संयत होकर बैठ जाय। यथोक्त देवता पुरुष को सन्निवेशित करके पूजा द्वारा निवेदन करे, जिससे अनुग्रह मिले॥७-८॥
आग्नेय्यां दिशि च प्राच्यां पुरुषं सन्निवेश्य च।
आपदं संस्थितैर्मन्त्रैर्जुहुयात्तु शिरः पुमान् ॥९॥
आग्नेय तथा पूर्व की दिशा में सूर्यदेव का सन्निवेश करके आपत्ति में संस्थित मन्त्र द्वारा आहुति देनी चाहिये॥९॥
अभिमन्त्र्य च तं शिष्यं जुहुयाच्च शतं शतम्।
स्वेन स्वेन तु मन्त्रेण सृष्ट्वा येन यथाविधि ॥१०॥
वह शिष्य को अभिमन्त्रित करके अपने-अपने मन्त्र से यथाविधि सृष्टि करे। शत-शत बार आहुति देनी चाहिये॥१०॥
अक्षयेन तु दैवेन सर्वेषामनु मन्त्रिणाम्।
जानुतो भूतयोनिः स्याद्वनात्मा धातुना समम् ॥११॥
लिङ्गे प्रसवयोनिश्च प्रतिबीजस्तु विनिःसृता।
नाभौ च भावयोनिः स्याद्बीजमस्य दशात्मकम् ॥१२॥
अक्षय दैव सबकी अनुमन्त्रणा है। जानु तक भूतयोनि होती है। वनात्मा धातु के समान है। लिङ्ग प्रसवयोनि प्रतिर्वन्ति (?) विनिसूत होती है। नाभि में भावयोनि है। इसका बीज है—दशात्मक॥११-१२॥
हृदये परमा योनिर्जाता सा परमेष्ठिनः।
कारणाख्या क्रियायोनिर्बाह्वी चैषा च बीजयेत्॥१३॥
परमेष्ठि के हृदय में परम योनि उत्पन्न होती है। कारण नामक यह क्रिया योनि है। इससे वाल्ही (गन्धर्वविशेष) बीज उत्पन्न होती है॥१३॥
संहारः चक्षुरुर्ध्वं स्यादष्टबीजं प्रकीर्तितम्।
सर्वाश्च जुहुयाद् ध्यायन् साधके चात्र विन्यसेत् ॥१४॥
अङ्गुष्ठेन सपुष्पेण न्यासः सर्वत्र शस्यते।
प्रतिमानं च भस्म स्याद्देयं पात्राधिवासितम् ॥१५॥
विश्वसृक्तर्पणं कुर्यात् साधकस्य च सम्पुटम्।
निवारस्तेन विघ्नानामन्यत्रापि प्रयुज्यते ॥१६॥
सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ३८३
संहार चक्षु ऊर्ध्व में होते हैं। उसे अष्टबीज कहा गया है। ध्यान करके सबको आहुति प्रदान करे तथा साधक में उसका विन्यास करे। पुष्प के साथ अंगुष्ठ द्वारा न्यास प्रशंसनीय है। भस्म है—प्रतिमान। उसे पात्राधिवासित करके देना होगा। विश्वस्रष्टा को तर्पण करना उचित हैं। तथा (यहाँ साधक का सम्पुट है। इसके द्वारा विघ्नों का निवारण होता है, अन्यत्र भी ऐसा प्रयोग करना चाहिये)॥१४-१६॥
देवस्याथ सकाशे तु श्राव्यं तस्यानुशासनम्।
अनुग्राह्यास्त्वया शिष्या यथा शास्त्रमनिन्दिताः ॥१७॥
संयुज्य देववच्चापि गुरुं तद्वत् सगोचरम्।
सर्वं प्रदक्षिणीकृत्य ततो देवं विसर्जयेत् ॥१८॥
इति श्रीसाम्बपुराणे विसर्जनविधिर्नाम सप्तसप्ततितमोऽध्यायः
देवता के सामने उसके अनुशासन को सुनाये तथा अनिन्दित शिष्यों पर अनुग्रह करे। देवता के समान गुरुदेव को देखना चाहिये। सबकी प्रदक्षिणा करे। तदनन्तर देवता का विसर्जन करे॥१७-१८॥
श्री साम्बपुराणोक्त विसर्जनविधि नामक सतहत्तरवाँ अध्याय समाप्त
अष्टसप्ततितमोऽध्यायः
(संन्यासमार्गः)
संन्यासस्य त्वहं मार्गं संवक्ष्ये तत्त्वतः परम्।
समयाद्यं च पाशान्तं कृत्वा तु श्रावणादृते ॥१॥
न च पूजा प्रयोक्तव्या हुत्वा होमं यथाविधि।
हृदये हृदये न्यस्य होमभस्मादि निर्मितम् ॥२॥
स्वयोनौ पातयेदेवं ब्रह्मसूत्रं सकर्मकम्।
जुहुयाद्विश्वसृक्चाग्नौ वाचयेदगृहागतम् ॥३॥
स्वयोनौ यातयेदेवं ब्रह्मसूत्रं सकर्मकम्।
जुहुयाद्विश्वसृगग्नौ वाचयेदगृहागतम् ॥४॥
संन्यास श्रेष्ठ पथ है। उसे अब तत्त्वतः मैं कहूँगा। नियम से लेकर पाशान्त (पाशों के उच्छेद तक) अनुष्ठान क्षरण व्यतीत करे। इसमें पूजा नहीं करना है। यथाविधि होम करके प्रति हृदय में होम-भस्मादि निर्मित वस्तु विन्यस्त करे। स्वयोनि में ऐसे सकर्मक ब्रह्मसूत्र का पालन करना चाहिये। विश्वसृक् अग्नि में होम करे। अब अगृहागत का वर्णन करूँगा। अग्नि की एक आत्मा समस्त भुवन की प्रदक्षिणा करता है, बीज अक्षरों से पुण्य भस्मोदक का पान करे॥१-४॥
अग्निं प्रदक्षिणीकृत्य भुवनान्यस्य चात्मनि।
पिबेद् भस्मोदकं पुण्यं बीजेनैवाक्षरेण सः ॥५॥
संन्यस्तमिति च क्रमादाचरेच्च व्रतानि च।
प्रदक्षिणमतः कृत्वा देवमग्निं गुरुं तथा ॥६॥
सशिष्यं वपनं कृत्वा त्यजेत् सर्वमतः परम्।
सुखदुःखे समे कृत्वा देवाल्लोकाच्च सर्वतः ॥७॥
सब कुछ का त्याग करता हूँ, ऐसा कहे। व्रतों का पालन करे। तदनन्तर देवता, अग्नि तथा गुरु की प्रदक्षिणा करे। शिष्य के साथ क्षौरकार्य करके सब कुछ का त्याग करे। दैव तथा पार्थिक लोकों से आगत सुख-दुःख में समान भावना रखनी चाहिये॥५-७॥
पूतोदकेन कार्यं वै पाणिपादं चरेच्छनैः।
वर्षासु शून्यमागारं मूलं घृतस्य नाश्रयेत् ॥८॥
मौनी स्यात्तु त्यजेद् देहं ध्यायेच्च हृदयाधिपम्।
देवं दृष्ट्वा गुरुं चापि मनसा पूजयेच्च सः ॥९॥
अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ३८५
पवित्र जल में हाथ-पैर धोये। धीरे-धीरे चले। शून्य गृह अथवा वृक्ष के नीचे आश्रय न ले। मौनी होकर हृदयाधिपति का ध्यान करते हुये देहत्याग करे। देवता तथा गुरु को देखकर मन ही मन उनका पूजन करे॥८-९॥
स खल्वावर्त्तयस्त्वेवं शिवं शुद्धयत्यसंशयम्।
पुनरावर्त्तिनो न स्युः सर्वतन्त्राधिकारिणः ॥१०॥
इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे अष्टसप्ततितमोऽध्यायः
•
वह इस प्रकार का मंगल आचरण करके अवश्य शुद्ध हो जाता है। सभी तन्त्रों के अधिकारीगण पुनः जन्म नहीं लेते॥१०॥
श्रीसाम्बपुराणोक्त ज्ञानोत्तर संन्यास मार्ग नामक अठहत्तरवाँ अध्याय समाप्त
•
एकोनाशीतितमोऽध्यायः
(न्यासादिविनिर्वतनम्)
यदा निर्वेदमापन्नो यश्चेच्छापदमन्वगः।
दस्युभिर्निहिते राष्ट्रे शत्रुणा वा बलीयसा ॥१॥
प्रार्थितोऽपि नयेनाथ बलानां सम्भवादपि।
जीर्णो विगतचेष्टो वा सन्न्यासाद्विनिवर्त्तयेत् ॥२॥
अथागत्वाशुभं गोष्ठं संहारं च त्र्यहं जपेत्।
ततः सम्भाष्य योग्यः स्यान्नमस्कारादिपूजनैः ॥३॥
यतः स्नातः शुचिर्भूत्वा देवदेवं प्रणम्य च।
विज्ञापयेत् क्षमस्वेति रक्षां मम निवर्त्तय ॥४॥
जब निर्वेद प्राप्त होता है अथवा स्वेच्छाकृत भाव से अथवा जब दस्यु तथा बलवान शत्रु से राष्ट्र विपन्न हो जाता है, तब राजा द्वारा प्रार्थना करने पर, बलशालीगण का उद्भव होने पर अथवा स्वयं जीर्ण एवं निश्चेष्ट स्थिति में हो जाने पर संन्यास से लौट आये। तदनन्तर मंगलमय गोष्ठ में आकर तीन दिन संहार मन्त्र का जप करे। तदनन्तर नमस्कारादि पूजन द्वारा सम्भाषण करके योग्य हो जाय। तदनन्तर स्नान करके पवित्र स्थिति में देवदेव सूर्य को प्रणाम करके निवेदन करना चाहिये—‘हे देव! क्षमा करिये। मेरी रक्षा करिये’॥१-४॥
बीजयोन्यां समावाह्य पृथिवीं संन्यसेदतः।
न्यसेच्च वरुणं मूर्ध्नि यजेदेवं दशात्मना ॥५॥
संहारशक्तिमावाह्य चात्मन्यासं प्रयोजयेत्।
सकलीकृत्य भूतैश्च तथैतान् जुहुयात्ततः ॥६॥
बीजयोनि में आवाहन करके पृथ्वी का सम्यक् न्यास करे। मस्तक में वरुण का न्यास करे। ऐसे ही दशात्म द्वारा संहार शक्ति का आवाहन करके अंगन्यास करने के अनन्तर भूत-गण द्वारा सकलीकरण (एकत्रीकरण) करे। इसके पश्चात् उनकी आहुति देनी चाहिये॥५-६॥
शेषं तु शतमाभाभिरधिकं तु पिबेत्ततः।
ततः प्रकृतिमापन्नो दीक्षां शक्तिमवाप्नुयात् ॥७॥
एकोनाशीतितमोऽध्यायः ३८७
पार्थिवः सकलीरग्नौ मन्त्रैर्होम्य शतं घृतम्।
वारुणेन ततो हुत्वा शेषं पानं यथा पुरा ॥८॥
बीजयोन्यां ततः स्तुत्वा पूजां कृत्वा प्रणम्य च।
अनुग्राह्योऽस्मि देवेश कामं सर्वसमृद्धये ॥९॥
पूर्वपक्षं क्षपा उक्ता नित्यं स्यात् समया यथा।
अनेन विधिना न्यासान्निवर्तनमनन्यथा ॥१०॥
इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे एकोनाशीतितमोऽध्यायः
अवशिष्ट १०० बार कहे। तदनन्तर उससे अधिक पान (?) करे। तदनन्तर प्रकृतिस्थ होकर दीक्षा की शक्ति प्राप्त करे। पार्थिव मन्त्र द्वारा एकत्र करके अग्नि में घृत से १०० होम करे। तदनन्तर वारुण मन्त्र से आहुति देकर अवशिष्ट का पूर्व के समान पान करे। बीजयोनि द्वारा स्तुति, पूजा तथा प्रणामोपरान्त कहे—'हे देवेश! यथेष्ट सर्व-समृद्धि के लिये मुझपर अनुग्रह करें। पूर्वपक्ष को क्षपा कहा गया है। वह नियमपूर्वक नित्य हो। इस विधानोक्त न्यास से निवर्त्तन होगा, अन्यथा नहीं होगा।।७-१०।।
श्री साम्ब पुराणोक्त ज्ञानोत्तर न्यास में निवर्त्तन नामक उन्यासीवाँ अध्याय समाप्त
अशीतितमोऽध्यायः
(मुक्तिमार्गः)
अथवा संशयापन्नं सद्योमुक्तिं समाचरेत्।
देवं सम्पूज्य सम्यक्च दक्षिणामूर्तिमाश्रितः ॥१॥
अप्यतद्दर्शनाद्धीरः स्थिरचित्तो दृढव्रतः।
स्वहृदि पुरुषं न्यस्य यथापूर्वविधानतः ॥२॥
आचान्तः पुनराचम्य युञ्जन् मन्त्रान् यथाक्रमम्।
वायव्याऽग्निं निवेश्याथ ह्यात्मानं तत्र योजयेत् ॥३॥
ततः संहारदेवेन सृष्टिमाग्नेर्नियोजयेत्।
विशेच्च दीपमापन्नो योनिं भूतेशसंज्ञिताम् ॥४॥
अथवा संन्यासापन्न होकर सद्यः मुक्ति का आचरण करे। दक्षिणामूर्त्ति का आश्रय लेकर देवता का सम्यक् पूजन करे। तदनन्तर उनके दर्शनार्थ धीर व्यक्ति स्थिर चित्त तथा दृढ़व्रत होकर अपने हृदय में पुरुष का विन्यास करके पूर्वोक्त विधान से आचमनोपरान्त पुनः आचमन करे तथा यथाक्रम से मन्त्रों को युक्त करे। वायव्य अग्नि में निवेश करे, वहाँ आत्मा को युक्त करना चाहिये। तदनन्तर संहार देव के साथ सृष्टि को अग्नि से युक्त करे। दीपलाभ करके भूतेश नामक योनि में प्रविष्ट हो जाय॥१-४॥
पापं दहति योनिः स संहारेण प्रचोदितः।
तत्त्वबीजस्य कात्स्थानात्क्षिप्तं विगतकल्मषः ॥५॥
दग्ध्वा भूतेशयोनिं स शिवयोनिं क्रमाद्विशेत्।
ततस्तु चैकसंयुक्तौ वायुना चाचलीकृतौ ॥६॥
संहार के द्वारा प्रचोदित होने से योनिपाप का दहन हो जाता है। तत्त्वबीज में भूमि स्थान से सत्वर पापमुक्ति हो जाती है। तदनन्तर भूतेश योनि को दग्ध करके क्रमशः शिवयोनि में प्रविष्ट हो जाय। तत्पश्चात् एकत्र संयुक्त होकर वायु के द्वारा अचलता में स्थित होना चाहिये॥५-६॥
शिवाग्नी चेरतुश्चैव सर्वभूतक्षयंकरौ।
ततस्तस्मिन् समीभूते हृदि प्रोक्ते ततोऽनले ॥७॥
दहेच्छरीरं सोष्माणि मन्त्राणि परमेष्ठिनः।
असम्भारस्ततो मन्त्री दह्यमानेन चेद् धृदि ॥८॥
अशीतितमोऽध्यायः ३८९
शिव तथा अग्नि विचरण करते हैं। वे समस्त प्राणीगण के क्षयकारक हैं। तत्पश्चात् हृदयउसमें मिलित हो जाते है। उष्मा शरीर को दग्ध कर देती है। यह परमेष्ठी का ऊष्म मन्त्र है। हृदय दह्यमान हो जाने पर मन्त्री मानरहित हो जाता है॥७-८॥
नात्मना विशयेदस्त्रं विसर्गास्त्रमकारजम्। द्वाराणां शीर्षरापानां विधाना च व्युपस्थितः ॥१९॥
आत्मा द्वारा अस्त्र प्रवेश न कराये (?) विसर्गान्त मकारजात है (इस श्लोक में आगे अर्थ अस्पष्ट है अतः बाकी का अनुवाद करने में असमर्थता है)॥१९॥
भित्वा मूर्ध्नि कपालं तु विधिना व्ययमीश्वरम्। यं प्राप्य न निवर्तेत योगिनः परमं शिवम् ॥२०॥
इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे अशीतितमोऽध्यायः
तदनन्तर मार्ग रुद्ध हो जाने पर वह्नि यज्ञशत का विनाश करती है। मस्तक में कपाल भेदन करके अव्यय ईश्वर में प्रवेश मिलता है। जो परा शिव को प्राप्त कर लेते हैं, वे योगी पुनः जन्म ग्रहण चक्र से मुक्त हो जाते हैं॥२०॥
श्री साम्बपुराणोक्त ज्ञानोत्तर में मुक्तिमार्ग नामक अस्सीवाँ अध्याय समाप्त
एकाशीतितमोऽध्यायः
एतेषां परवान् योगः संवत्सरतनुं स्थितः।
अष्टानामनुपूर्वेण भिन्नाभिन्नार्थवेदने ॥१॥
प्रतिलोमप्रधिः प्रोक्तो दीपयेत् स्पर्शयेत् क्रमात्।
चतुर्विंशत्तथा वह्नित्रिकयोगेन साधकः ॥२॥
व्यञ्जनं च विसर्गस्थमादावन्त उपाश्रितम्।
अन्ततो बिन्दुसंयुक्तमाकारेण तदेव तु ॥३॥
द्वाविंशत्यन्तरायुक्ता क्रूरेणैकादशेन च।
ओंकारं च वषट्कारं यदा नैतददीप्यते ॥४॥
ये सभी श्रेष्ठ योग संवत्सररूप तनु का आश्रय करके आनुपूर्विक आठ भिन्न तथा अभिन्न अर्थ जानने के लिये हैं। प्रतिलोम प्रधि का वर्णन किया गया है। उसे क्रम से दीप्त करे तथा स्पर्श कराये। ऐसा साधक तीन वह्नियों के योग से २४ बार स्पर्श करे। विसर्गस्थ व्यञ्जन आदि में तथा अन्त में उपाश्रित है। शेष बिन्दुसंयुक्त है। आकार के द्वारा भी वही है। २२ में एकादश क्रूरयुक्त हैं। जब वे दीप्त नहीं हुये तब ओंकार तथा वषट्कार प्रकाशित हुये।।१-४।।
अन्तःस्थाश्च शलाकान्ते संयोज्यादुष्मणापि च।
उत्तमस्पर्शयुक्तानि सुषुम्नान्तर्गतो मतः ॥५॥
क्षुरिका कर्तरी चैका लोका चैकस्तथान्तगाः।
प्रसवे योजयेदेतत्प्रतिमन्त्रत्रिकं तु वै ॥६॥
शलाकान्त में अन्तःस्थ वर्णों को ऊष्म वर्ण के साथ युक्त करे। उत्तम स्पर्शयुक्त वर्णों को सुषुम्ना के अन्तर्गत जाने। क्षुरिका, कर्तरी का लौकिक तथा अन्तग सृष्टि के समय योग करे, किन्तु यह प्रतिमन्त्र ३ करके होगा।।५-६।।
तिस्रस्तिस्रस्तथा चैवमेकैकस्य पृथक्-पृथक्।
ऊर्ध्वं तस्य च वक्त्रादेर्योगः स्यात् प्रतिनिर्मितः ॥७॥
मन्त्राणां साधनैः सूक्ष्माद् द्रव्याणां रक्षतः परः।
प्राणानां चालने चैव नित्यं योज्याद्यनुक्रमात् ॥८॥
तीन-तीन में इस प्रकार से एक-एक करके पृथक्-पृथक् हैं। उसके ऊर्ध्व में मुखादि का योग प्रतिनिर्मित है। मन्त्रों की साधना से सूक्ष्म से सूक्ष्म द्रव्यों की भी परम रक्षा होती है। प्राणों के चालन में अनुक्रम में नित्य युक्त करे।।७-८।।
एकाशीतितमोऽध्यायः ३९१
आसने क्षुरिकां दत्त्वा ततो मन्त्रं प्रयोजयेत् ।
शलाका पूजने योज्या दत्त्वा चैवानुकर्तरी ॥९॥
अग्नेरर्चाविधानेषु दीपने चाभिषेचने ।
जपेत्तथा वै ध्यानेषु मन्त्रे च परमो विधिः ॥१०॥
शमी बिल्वपलाशं च तथा दूर्वासितास्तिलाः ।
दर्भा सुमनसां चैव गणाः स्याच्छान्तिकर्मणि ॥११॥
आसन में क्षुरिका देकर तब मन्त्रों का प्रयोग करे। शलाका-पूजन में अनुकर्तरी से योग करे। अग्नि के पूजाविधान, दीपन तथा अभिषेक के विषय में जप करना चाहिये। इसी प्रकार ध्यान तथा मन्त्र में भी यह श्रेष्ठ विधि है। शमी, बिल्व, पलाश की लकड़ी, दूर्वा, काला तिल, कुश एवं पुष्प शान्ति कर्म में प्रशस्त हैं॥९-११॥
योज्या क्षीरेण च तथाप्यापुष्पवृक्षयोनयः ।
अवृक्षः किंशुकॊ वृक्षो नित्यमेव धनप्रदः ॥१२॥
करवीरो कनकश्चैव कलक्षेत्रं च दायकः ।
प्रियङ्गुलोध्रपुष्पं च मृत्योस्तैलविपास्यता ॥१३॥
इन सबों से दुग्ध का योग करना चाहिये। ऐसे ही अपुष्प वृक्षयोनि, अवृक्ष, किंजल्क वृक्ष—ये सब नित्य धन देने वाले हैं। कनेर, कनक (धतूरा), कलक्षेत्र, दायक, प्रियंगु तथा लोध्र के पुष्प की (आहुति द्वारा) मृत्यु से रक्षा हो जाती है॥१२-१३॥
शतपुष्पाणि बीजानि लवणं मांसमेव च ।
मल्लिकादिजपैः सर्वैः योज्यः स्याद्धोमकर्मणि ॥१४॥
काकोलूकस्य पक्षाणि येषां द्वे पञ्च सर्वदा ।
द्वन्द्वानान्तु तथा तेषां मृगजैर्द्धे वनान्तरम् ॥१५॥
विभीतकः खादिरश्च सहचरो वासकस्तथा ।
विद्वेषे तु तथा क्रूरे इत्थं तूच्चाटनेषु च ॥१६॥
शतपुष्प, बीज, नमक, मांस, मल्लिकादि पुष्प, सभी प्रकार का जवापुष्प होमकर्म में युक्त करे। काक तथा उलूक के पंख तथा ऐसे सभी प्राणी, जिनमें परस्पर में द्वेष विपरीतता चलती है, ऐसे मृगज (पशु जैसे—मृग-व्याघ्र), विभीतक एवं खदिर, सहचर तथा वासक का विद्वेष कार्य में व्यवहार करे॥१४-१६॥
उक्ताः स्वल्पविधानेषु परतन्त्रेषु ये च वै ।
सर्वे तेनैव सिध्यन्ति विधियुक्तोदितैः परैः ॥१७॥
अरसा बाह्यबीजा वा योज्याश्च सर्वकर्मणि ।
दृष्ट्वा तु विधिना मन्त्रं व्योमस्थं वा महीगतम् ॥१८॥
३९२ श्रीसाम्बपुराणम्
तत्सर्वं साधयेत्तूर्णं यदुक्तं कल्पकल्पकैः।
न च शक्तिपरीचारे मन्त्रान्ते क्रमशस्ततः ॥१९॥
यहाँ अल्प विधान का वर्णन किया गया हैं। अन्यान्य तन्त्रों में (विस्तार में) इनका वर्णन है। यथाविधि प्रयुक्त होने पर इनसे सिद्धि मिलती है। रसविहीन अथवा बाह्य बीज सर्वकार्य में युक्त करे। व्योमस्थ अथवा पृथिवीगत मन्त्र का शीघ्र साधन करे; जैसा कि कल्प-कल्प में (विधि में) कहा गया है। किन्तु शक्ति-परिचार में शीघ्रता न करे। मन्त्रान्त में क्रमशः करना होगा।।१७-१९।।
मन्त्रसम्पुटयोगेन साधयेच्च शलाकया।
शक्रं तु कमले योगस्पर्शैः शक्तिं निरावृत्तम् ॥२०॥
मन्त्रसम्पुट योग में शलाका से साधना करनी चाहिये। इन्द्र की साधना कमल से करे। योग स्पर्श से शक्ति निरावृत हो जाती है।।२०।।
क्षुरिकाकर्त्तरीयुक्ता दक्षिणा निर्वाणमावहेत्।
अग्निपञ्चकयोगान्ते लिङ्गे वै स्थण्डिलेऽथवा ॥२१॥
लक्षत्रयस्य वै योगात् साधयेत् परमेष्ठिनम्।
शिलातले तु वै श्रेष्ठः क्रियाकारणसाधकः ॥२२॥
क्षुरिका तथा कर्त्तरीयुक्त दक्षिणा (दक्षिणकाली) निर्वाण प्रदान करती है। पञ्चाग्नि योग के अन्त में लिंग अथवा स्थण्डिल में तीन लाख के योग से (आहुति से) परमेष्ठि-साधन करे। क्रिया करने में साधक श्रेष्ठ शिलातल पर साधना करे।।२१-२२।।
आदित्यस्य निमित्तात्स्यात्साधनमुन्मिलोक्षिकम्।
भूतेशं निशि वा घोरे वायुभक्षो जलाधितः ॥२३॥
साधयेत् साधनायुक्तो देहे मन्त्री च वै क्षणात्।
बीजेश्वर्या सर्वैव श्मशानभक्ष्यभोजनः ॥२४॥
आदित्य का साधन होता है उन्मीलोक्षिक (उन्मीलित आँखों से) अथवा घोर निशा के समय वायुभक्षी होकर अथवा जल पीकर भूतेश का साधन करे। साधनायुक्त होने पर साधक के शरीर में तत्काल ही समस्त श्रेष्ठ बीजों की विद्यमानता हो जाती है। श्मशान में भक्ष्य भोजन करना चाहिये।।२३-२४।।
अपक्वाशी लब्धप्रभुर्देही देहस्य साधने।
अशीतसिकता ज्येष्ठे जपेत् सृष्टिं घृतप्लुतः ॥२५॥
जपान्ते दीपयेन्मन्त्री दृष्टशान्तिर्यथा शिवः।
चरित्वा भस्मचर्यञ्च भस्मशायी यवाशनः ॥२६॥
एकाशीतितमोऽध्यायः ३९३
भस्मना सिद्धिमाप्नोति भस्मनिष्ठः सुसाधकः। भास्करस्य व्रतं ह्येतदन्ते ह्युक्तं क्रमागतम्॥२७॥
अपक्व द्रव्य भोजन करके यथालाभ से तुष्ट होकर देही देहसाधन करे। ज्येष्ठ की तप्त बालुका में घृत से लिप्त होकर सृष्टि का जप किया जाता है। जप के अन्त में मन्त्री अष्ट शान्तियुक्त शिव के समान दीप्त हो जाता है। भस्मधारी, भस्मशायी तथा यव का भोजन करके विचरण करे। भस्मनिष्ठ साधक भस्म से सिद्धिलाभ करते हैं। यह है—भास्कर का व्रत। बाकी क्रम से कहा जायेगा॥२५-२७॥
क्रमात्संक्रमणं चैव क्रमाद्विद्वेषतां व्रजेत्। संक्रमेद् देहमाक्षिप्य दृष्ट्वैवं क्रमयेत् परान्॥२८॥ इच्छया विचरेन् मन्त्री व्रतान्ते बीजवर्त्मनि। यदुक्तं मन्त्रकोष्ठे तु तस्मिन् शास्त्रे ह्यनेकशः॥२९॥ कन्दमूलफलं पत्रमस्विन्नं स्विन्नमेव च। अशक्तो विधिरुक्तो यमष्टौ ग्रासानुपानयेत्॥३०॥
क्रम से संक्रमण होता है। क्रम से विद्येश्वरत्व की प्राप्ति होती है। ऐसा देखकर अन्य का अतिक्रमण करे तथा देहत्याग करके (विद्येश्वरत्व में) संक्रमण करे। व्रत के अन्त में बीजवर्त्म में इच्छापूर्वक मन्त्रविचरण करके रहे, जैसा कि मन्त्रकोष्ठ में कहा गया है (उस प्रकार से)। उस शास्त्र में अनेक बार यह बतलाया गया है। भोजन में कन्द-मूल-फल-कच्चे पत्ते अथवा सूखे पत्ते ग्रहण करे। ऐसा करने में असमर्थ होने पर आठ ग्रास ग्रहण करना चाहिये॥२८-३०॥
भक्ष्यं वा विधिसम्पन्नं मन्त्रे सम्मानवर्जितम्। पावकं विधिवत्सिद्धं कुर्य्यान् मन्त्रस्य साधने॥३१॥ पूजामन्त्रस्य वै मन्त्री संवत्सरतनुस्थितैः। व्योमस्थं वा तथाग्निस्थं कुर्यात् पूर्वं यमेन वै॥३२॥
अथवा विधिसम्मत पानवर्जित भिक्षाद्रव्य मन्त्रों से ग्रहण करना चाहिये। मन्त्र के साधनार्थ यथाविधि अग्नि सिद्धि करे। जैसे पूर्व में यम ने व्योमस्थ अथवा अग्निस्थ मन्त्र का साधन किया था, वैसे ही संवत्सर तनुस्थित मन्त्रों द्वारा मन्त्री पूजामन्त्र की साधना करे॥३१-३२॥
अनुलोमाद्वयं स्यात् क्षुरिका कर्मभेदिनी। कर्त्तरीकवचं, घोरं शलाकात्रय एव च॥३३॥ अर्गलास्तु शिरः सौम्यः स्वाकायो निःशिखा पराः। प्रतिमास्थाः परा एता ह्यष्टौ ताः शक्तियोनयः॥३४॥
३९४ | श्रीसाम्बपुराणम्
अनुलोम में हृदय होता है। कर्मभेदिनी क्षुरिका, कर्त्तरी, कवच, घोर शलाकात्रय, अर्गल, शिर, सौम्य स्वकाय निःशिखा तथा परा, प्रतिमास्थित परा—ये आठ शक्तियोनि हैं।।३३-३४।।
पूर्वपश्चिमयोश्चैव दक्षिणोत्तरयोस्तथा।
विदिक्षु चानुपूर्वेण स्वरान् सम्पूजयेत् क्रमात् ॥३५॥
प्रत्यहं यजनं कुर्याद्रात्रौ वापि हि साधकः।
द्रव्याभावे जपेनापि साधयेन् मन्त्रतत्परः ॥३६॥
पूर्व तथा पश्चिम दिक्, दक्षिण तथा उत्तर एवं सभी विदिक् में आनुपूर्वीक स्वर-समूह के द्वारा आनुपूर्वीक क्रमानुरूप स्वरसमूह की सम्यक् पूजा करे। साधक नित्य यजन करे। रात्रि में भी करे। द्रव्य का अभाव होने पर जल से ही मन्त्रतत्पर होकर साधन करना चाहिये।।३५-३६।।
चतुष्कं साधयेन्नित्यमेकैकस्य पृथक्-पृथक्।
क्षुरिकादिशलाकान्तामर्गलां चैव साधकः ॥३७॥
इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे साधनविधिर्नामाकाशीतितमोऽध्यायः
चतुष्क का (चार का) नित्य साधन करना चाहिये। एक-एक का पृथक् भाव से क्षुरिका, कर्त्तरी, कवच, घोर शलाकात्रय का एवं अर्गला का साधन करे।।३७।।
श्री साम्बपुराणोक्त ज्ञानोत्तर में साधनविधि नामक इक्यासीवाँ अध्याय समाप्त
द्व्यशीतितमोऽध्यायः
(हृदयपुष्पम्)
अथातः परं गुह्यं मन्त्रसारसमुद्भवम्।
यैर्व्याप्तिमखिलं सर्वं मन्त्रं वै स चराचरम् ॥१॥
सामान्या सर्वसैवास्ते चराणाङ्कः फलव्याधं समया तु मध्यो-मध्यो निविध्यो-मङ्किक्रो समनीनाम परम परम क्षुरिकास्क फट् ना अयथाना अयन्ताना अपवासि-नोऽपि किंषु महामुखो नामकर्त्तरी। यः फट् सम्पापीडायोगतश्च गायवान् रुचमाश्रि गां गीं गुं पञ्चक्रमेण नाम शलाका। परमेष्ठिनस्यैताध्यायन् प्रेतजिह्वामूलीयूपरम्। दक्षिणा। ततो हरा नाम योगशलाकार्कस्य चरणैताः। फटन्तु मूलजाह्रोषायह्लाङ्ग-ददेशवायव्यादिन्द्ररोचनानाम क्षुरिका। सर्वासां मंगला ह्येषा निरोधिनी नाडीनां चतुष्कला निरञ्जनस्य क्षुरिका सर्वमन्त्रहृदया सर्वान् संक्रामयति। सर्वव्रतैश्च स्यात्प्र-योनामन्त्राणां कर्मणि करोति। लक्षकविंशके क्षुरिका समाप्ताः।
अब मन्त्रसार समुद्भव की परम गुह्य कथा कहते हैं, जिसके द्वारा चराचर सकल मन्त्र व्याप्त हैं। सामान्य इत्यादि कर्त्तरी है। 'यः फट्' इत्यादि शलाका है। 'हरा' नाम इत्यादि क्षुरिका है। सर्वमंगळरूपा नाड़ियों में निवासिनी, निरंजन की चक्षुकला, सर्वमन्त्रों की हृदयरूपा क्षुरिका सभी मन्त्रों में संक्रमण करती है। समस्त व्रतों में प्रयुक्त होकर मन्त्रों का कर्म करती है। बीस लाख में क्षुरिका मन्त्र समाप्त है।
ब्रह्मोवाच
आलयः सर्वभूतानां लयनाल्लिङ्गमुच्यते।
हृदि भावमिदं लिङ्गं सर्वजन्मवतां स्थितम् ॥२॥
ब्रह्मा कहते हैं समस्त प्राणियों की उत्पत्ति तथा विनाश के लिये उसे लिंग कहा जाता है। जो जन्म लाभ करते हैं, उन सबके हृदय में इस प्रकार से लिंग रहता है॥२॥
सदार्चयन्ति विद्वांसो भावपुष्पैर्हृदि स्थितैः।
भावजैः सुमनोभिश्च तमर्चेन्नान्यजैर्बुधैः ॥३॥
ब्रह्माक्षरपदैर्दिद्यैर्जरामरणकारकैः ।
प्रफुल्लपद्मसंस्थाने सुहृद्ये तिष्ठतो मुखे ॥४॥
विद्वान् गण सर्वदा हृदयस्थ भावपुष्पों से अर्चना करते हैं। विज्ञ व्यक्ति भावज पुष्पों से उनकी अर्चना करे; अन्य (वृक्षादि से उत्पन्न) पुष्पों से अर्चना न करे। जरा एवं मरण
३९६ श्रीसाम्बपुराणम्
को दिव्य ब्रह्माक्षर पद द्वारा प्रस्फुटित पद्मतुल्य सुन्दर हृदय में अवस्थित करके विज्ञजन को अर्चना करनी चाहिये॥३-४॥
हृदयं तु विजानीयाद्विश्वस्यायतनं महत्।
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्रत्युवाच महेश्वरः॥५॥
हृदय को विश्व का महत् आयतन जानना चाहिये। उनकी यह बात सुनकर प्रत्युत्तर में महेश्वर ने कहा॥५॥
शृणु यत्नेन वचनं पुष्पाणि कथयामि ते।
अहिंसा प्रथमं पुष्पं तथा चेन्द्रियनिग्रहः॥६॥
धृतिपुष्पं क्षमापुष्पं शौचं पुष्पं च पञ्चमम्।
अक्रोधः षष्ठपुष्पं तु ह्रीपुष्पं चैव सप्तमम्॥७॥
सयत्न मेरी बता सुनो। तुमको (हृदयस्थ) पुष्पों की बात बतलाता हूँ। अहिंसा प्रथम पुष्प है, इन्द्रियनिग्रह है—द्वितीय पुष्प। तृतीय है—धृति पुष्प। चतुर्थ है—क्षमा पुष्प। पञ्चम है—शौच पुष्प। षष्ठ को अक्रोध कहते हैं। सप्तम पुष्प है—लज्जा॥६-७॥
सत्यं चैवाष्टमं पुष्पमेभिः प्रीयेत वै शिवः।
एतान्यष्टौ च पुष्पाणि चाक्षयान्यव्ययानि च॥८॥
एतानि भावतो येन प्रकल्प्येन निवेदयेत्।
एभिर्यस्तु सदा पुष्पैर्चयेच्छिवमव्ययम्॥९॥
सत्य है—अष्टम पुष्प। इन सबसे शिव प्रसन्न होते हैं। ये आठो पुष्प अक्षय ऐवं अव्यय हैं। इन समस्त भावनारूप को जल से निवेदित करना चाहिये। इन समस्त पुष्पों द्वारा सर्वदा जो अव्यय शिव की अर्चना करते हैं॥८-९॥
उद्घाट्य तु तमोद्वारं शिवं पश्येन्निरञ्जनम्।
कृत्वा यमैस्तु लिङ्गं वै प्रत्याहारैस्तु वैदिकम्॥१०॥
ध्यानधारणपुष्पैस्तु चार्चयेच्छिवमव्ययम्।
शरीरे दीपयेदग्निं न्यासं कृत्वा तृणेन्धनम्॥११॥
वे तमोद्वार को पार करके निरंजन शिव का दर्शन प्राप्त करते हैं। यम से (संयम से) लिंग तथा प्रत्याहार द्वारा वैदिक (?) का (संयमन करके) ध्यान तथा धारणरूप पुष्पों से अव्यय शिव की अर्चना करनी चाहिये। शरीर में अग्नि प्रज्वलित करे, तृण काष्ठ के समान न्यासविधान से। (जैसे भौतिक अग्नि तृण-काष्ठ से प्रज्वलित होती है, वैसे शरीराग्नि न्यास विधान से प्रज्वलित होती है)॥१०-११॥
युञ्जयेदुद्गतान् दोषान् मनःकृत्वा सुनिश्चितम्।
विस्तीर्णाद्धारणाच्चैव नासाग्रे चिन्तयेच्छिवम्॥१२॥
द्व्यशीतितमोऽध्यायः ३९७
चिन्तयेच्च सदा ह्येवं कृत्वा पूजां तु देहजाम्।
क्षणाद्ध्रस्वत्वमायान्ति प्रकीर्णानीन्द्रियाणि च॥१३॥
शुद्धो दोषस्तथा मन्त्री ध्यायन् मन्त्री न लिप्यते।
ज्ञानशुद्धस्तथा मन्त्री विचरेद्विषयैरपि ॥१४॥
भावग्राह्यं मनः कृत्वा बुध्वा भोक्तारमीश्वरम्।
सदा समत्वमायाति सामान्यः सर्वगोचरः ॥१५॥
इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे हृदयपुष्पनाम द्व्यशीतितमोऽध्यायः
मन को सुनिश्चित करके तद्गत दोषों को अग्नि में छोड़े अर्थात् दोषों का नाश करे। विस्तीर्ण धारणा से नासाग्र में शिवचिन्तन करना चाहिये।
ऐसी देहजात पूजा करके जो सदैव चिन्तन करता है, उसे क्षण काल में ह्रस्वत्व प्राप्त होता है तथा इन्द्रियाँ शुद्ध हो जाती हैं। ऐसे दोषों को शुद्ध करके मन्त्री जब ध्यान में लिप्त नहीं होता, तब भी ज्ञानशुद्ध मन्त्रज्ञ साधक विषयों के साथ भी विचरण कर सकता है (तब भी वह उसमें लिप्त नहीं होता)॥१२-१५॥
श्रीसाम्बपुराणोक्त ज्ञानोत्तर में हृदयपुष्प नामक बयासीवाँ अध्याय समाप्त
त्र्यशीतितमोऽध्यायः
( तत्त्वनिरूपणम् )
त्रिविधं त्रिविधाकारं त्रिविधं पञ्चसंस्थितम्।
त्रिविधेन तु योगेन लभ्यते तत्त्वनिश्चलम् ॥१॥
यस्य योगः स्मृतः शास्त्रे परे तु परमोद्भवे।
लिङ्गं तस्य सदा योज्यं ज्ञानयोगाच्च कर्मतः ॥२॥
अहिंसा च क्षमा चैव धृतिरिन्द्रियनिग्रहः।
शौचमक्रोधनं सत्यं कर्मशास्त्रविदांवरम् ॥३॥
शास्त्रज्ञादथ योगाच्च गुरुदारेषु किल्विषात्।
मुक्तिस्तत्राविकल्पेन त्रिविधा परिकीर्तिता ॥४॥
तीन, तीन आकार तथा तीन पञ्च संस्थित त्रिविध योग से तत्त्व की स्थिरता मिलती है। परमोद्भव शास्त्र जिसका योग स्मृत हुआ है, ज्ञान योग द्वारा कर्म से उसका लिंग सदा युक्त रहता है। अहिंसा, क्षमा, धैर्य, इन्द्रियसयंम, शौच, अक्रोध तथा सत्य—ये सब शास्त्रविद्वण के श्रेष्ठ कर्म हैं। शास्त्रज्ञों से, योग से, गुरुदारादि (गमन) के पाप से अविकल्प तीन प्रकार की मुक्ति कही गयी है॥१-४॥
आसने च तथा पाने निश्वासोच्छ्वासदृष्टिषु।
त्रिषु वाप्यपचारेषु ज्ञानेन समता यदा ॥५॥
कारणानि निगृह्णीयाद्धटमानानि योगिनः।
प्रसूते तु तथा योगः क्रीडन्ति विषयोरगैः ॥६॥
आसन, पान तथा निश्वास-उच्छ्वास-दृष्टि विषय में तीन प्रकार के किये अप-आचरण में ज्ञान द्वारा जब समता प्राप्त हो जाती है, तब योगीगण घटमान कारणसमूह को निगृहीत करते हैं। ऐसा योग होने पर विषयरूप सर्प के साथ वे क्रीड़ा करते हैं (विषयरूप सर्प उनको डस नहीं पाते)॥५-६॥
निरुद्ध्य दग्धावासस्य गुरुपूजा च सर्वदा।
विना विज्ञानयोगाभ्यां मृतस्य न विपर्ययः ॥७॥
कर्मयोगं तु विज्ञानात् प्रवृत्तः सर्वदा दहेत् ॥८॥
ज्ञानेन केवलेनैव साधकः सर्वतश्चरेत्।
आत्मना हि स भेदज्ञः सुखं भिन्नः समाचरेत् ॥९॥
त्र्यशीतितमोऽध्यायः ३९९
जो निरोध करके वासना को दग्ध करते हैं, उनकी गुरुपूजा सदा सार्थक होती है; विज्ञान तथा योग के विना कभी भी मृत्यु से छुटकारा नहीं होता। योग की तुलना में ज्ञान प्रशंसनीय है। लौकिक कर्म निकृष्ट है। विज्ञान द्वारा प्रवृत्त होकर सदा कर्मयोग (लौकिक कर्म) दग्ध होता है। (तत्त्वज्ञ) साधक को केवल ज्ञान द्वारा ही सर्वतोभावेन विचरण करना चाहिये। भेदज्ञ साधक आत्मा द्वारा आदि तत्त्व से अलग होकर सुख (की खोज) का आचरण करते हैं।।७-९।।
प्रकृतिं पुरुषं चैव ज्ञात्वा ज्ञानी न तप्यते।
तेषामुपरितः सूक्ष्मः सर्वव्यापी शिवोऽव्ययः ॥१०॥
विदित्वा ज्ञानबुद्ध्यन्तं जायते वेदवित्तमः।
ततः स्वकरणैः कार्यं न योगेन च कर्मणा ॥११॥
आत्मनो ज्ञानमात्रेण वीक्ष्यते तु चराचरम्।
प्रकृतौ पुरुषो लीनः पाशैस्तु प्रकृतिर्वृता ॥१२॥
परापरस्य ज्ञाता वै नरः कर्म परित्यजेत्।
प्रकृतेः पुरुषाश्चैव प्रज्ञानो परमो भवेत् ॥१३॥
ज्ञानी प्रकृति-पुरुष को जानकर कभी भी तृप्त नहीं होते; क्योंकि इसके ऊपर अवस्थित हैं—सर्वव्यापी अव्यय शिव। ज्ञान तथा बुद्धि का शेष जानकर वेदविद्गण उत्तम हो जाते हैं। तदनन्तर अपने करण द्वारा कार्य करना ही उचित है, यौगिक कर्म द्वारा उचित नहीं है। आत्मा के ज्ञानमात्र से चराचर का ज्ञान तथा दर्शन होने लगाता है। प्रकृति में पुरुष लीन हैं तथा पाशों से प्रकृति आवृत हैं। पर एवं अपर तत्त्व के ज्ञाता व्यक्ति कर्म का परित्याग कर देते हैं। प्रकृति से पृथक् होकर पुरुष परम प्रज्ञान हो जाता है।।१०-१३।।
पुमांसस्तेन मुच्यन्ते परावरविचारिणः।
विपर्यये पुनस्तेषां पूर्वस्यां प्रकृतौ स्थिताः ॥१४॥
एको यदि भवेज्जीवो बन्धः कस्य भवेत् पुनः।
कैवल्यं च कथं पुंसां बन्धः प्राधानिकौ यदि ॥१५॥
अथ चेन्नित्यताबन्धः पुंसस्तत्र निरर्थकः।
तस्माज्ज्ञानधरो योगी सर्वदा सुखमश्नुते ॥१६॥
स्थूल तथा सूक्ष्म तत्त्व में विचरण करने वाले पुरुषगण मुक्त हो जाते हैं। विपर्यय होने पर पुरुषगण पुनः प्रकृति में अवस्थान के लिये बाध्य हो जाते हैं। यदि जीव एक है, तब बन्धन किसका होगा? यदि पुरुष का बन्धन प्राधानिक है, तब कैवल्य किसका होगा? और यदि पुरुष नित्य है, तब पुरुष का बन्धन कहना अर्थहीन है। अतएव ज्ञानधर योगी सदा सुख (लौकिक सुख) का त्याग करते हैं।।१४-१६।।
४०० श्रीसाम्बपुराणम्
तारके ज्ञानसंस्कारे न प्रभुर्बध्यते क्वचित्।
इच्छया चरते ज्ञानी योगी कालान्तरेण तु ॥१७॥
दग्धे चैव तु पाशेऽस्मिन् गुरुणा शास्त्रमात्मना।
अभिव्यक्तं रसं दिव्यं भू प्राप्तं गुरुसंस्मरेत् ॥१८॥
एवं संज्ञानसंयोगाच्चाद्यपाशाद्विमुच्यते।
न हिंसेदात्मनात्मानं न हिंसेदिन्द्रियाणि च ॥१९॥
यथाभागं तु वै युंज्यादन्यथा तु विपर्ययैः।
दिशो यस्य तु वै श्रोत्रे जीवः श्रोत्रे व्यवस्थितः ॥२०॥
यदि तारक (ॐ) से ज्ञान-संचार होता है, तब समर्थवान् व्यक्ति कभी भी बद्ध नहीं होता। ज्ञानी स्वेच्छा से विचरण करते हैं, किन्तु योगी कालान्तर में भी विचरण कर सकते हैं। गुरु, शास्त्र तथा आत्मा से यह पाश दग्ध हो जाता है तब दिव्य रसाभिव्यक्ति होती है। ऐसे संज्ञान के संयोग से शीघ्र ही पाश से छुटकारा मिलता है। आत्मा द्वारा आत्मा की हिंसा न करे तथा इन्द्रियों की भी हिंसा न करे। यथाभाग योग करे; अन्यथा विपर्यय होगा। दिक् समूह जिनका श्रोत्र है, जीव उसी में स्थित है॥१७-२०॥
स पश्येदात्मना शुद्धः परमात्मानमात्मना।
त्यक्तवायुरिति प्रोक्तः स्पर्शस्तत्रात्मसम्भवः।
वायुश्च स्पर्शनं युक्तो स्पर्शनं त्वरितं जनः ॥२१॥
चक्षुषा गृह्यते रूपं चक्षुरूपं समुद्भवम्।
जायते शक्तिस्तस्तेन न परस्तेन लिप्यते ॥२२॥
रसज्ञा रसना जिह्वा रसस्तु वरुणात्मकः।
आशश्च परतस्तत्र वरुणश्चात्र सम्भवः ॥२३॥
जो शुद्ध साधक आत्मा द्वारा दर्शन करते हैं, वे उसी से परमात्मा को देखते हैं। त्यक्त वायु जहाँ है, वहाँ स्पर्श आत्मस्वरूप है। वायु का गुण है—स्पर्श। स्पर्श से लोक त्वरित होते हैं। चक्षु से रूप ग्रहण होता है अथवा उसी से (रूप से) चक्षु उत्पन्न है। (रस) वह शक्ति से उत्पन्न होता है। इसी से परवर्त्ती (चक्षु) उसमें लिप्त हो जाता है। जिह्वा रसज्ञा (रसना) है; किन्तु रस वरुणात्मक है। (रस) वह परमात्मा से व्याप्त है। वहीं से है—वरुण की उत्पत्ति॥२१-२३॥
पार्थिवस्तु तथा घ्राणे गन्धस्तु पृथिवी गुणः।
युक्तस्तु पुरुषो ह्यत्र न परः पृथिवीगतः ॥२४॥
अग्निः सर्वमिति प्रोक्तः सर्वस्मिन्नात्मनि स्थितः।
वायुरप्यत्र विज्ञेयो न परो लिप्यते तदा ॥२५॥