भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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३९६ श्रीसाम्बपुराणम्

को दिव्य ब्रह्माक्षर पद द्वारा प्रस्फुटित पद्मतुल्य सुन्दर हृदय में अवस्थित करके विज्ञजन को अर्चना करनी चाहिये॥३-४॥

हृदयं तु विजानीयाद्विश्वस्यायतनं महत्।
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्रत्युवाच महेश्वरः॥५॥

हृदय को विश्व का महत् आयतन जानना चाहिये। उनकी यह बात सुनकर प्रत्युत्तर में महेश्वर ने कहा॥५॥

शृणु यत्नेन वचनं पुष्पाणि कथयामि ते।
अहिंसा प्रथमं पुष्पं तथा चेन्द्रियनिग्रहः॥६॥
धृतिपुष्पं क्षमापुष्पं शौचं पुष्पं च पञ्चमम्।
अक्रोधः षष्ठपुष्पं तु ह्रीपुष्पं चैव सप्तमम्॥७॥

सयत्न मेरी बता सुनो। तुमको (हृदयस्थ) पुष्पों की बात बतलाता हूँ। अहिंसा प्रथम पुष्प है, इन्द्रियनिग्रह है—द्वितीय पुष्प। तृतीय है—धृति पुष्प। चतुर्थ है—क्षमा पुष्प। पञ्चम है—शौच पुष्प। षष्ठ को अक्रोध कहते हैं। सप्तम पुष्प है—लज्जा॥६-७॥

सत्यं चैवाष्टमं पुष्पमेभिः प्रीयेत वै शिवः।
एतान्यष्टौ च पुष्पाणि चाक्षयान्यव्ययानि च॥८॥
एतानि भावतो येन प्रकल्प्येन निवेदयेत्।
एभिर्यस्तु सदा पुष्पैर्चयेच्छिवमव्ययम्॥९॥

सत्य है—अष्टम पुष्प। इन सबसे शिव प्रसन्न होते हैं। ये आठो पुष्प अक्षय ऐवं अव्यय हैं। इन समस्त भावनारूप को जल से निवेदित करना चाहिये। इन समस्त पुष्पों द्वारा सर्वदा जो अव्यय शिव की अर्चना करते हैं॥८-९॥

उद्घाट्य तु तमोद्वारं शिवं पश्येन्निरञ्जनम्।
कृत्वा यमैस्तु लिङ्गं वै प्रत्याहारैस्तु वैदिकम्॥१०॥
ध्यानधारणपुष्पैस्तु चार्चयेच्छिवमव्ययम्।
शरीरे दीपयेदग्निं न्यासं कृत्वा तृणेन्धनम्॥११॥

वे तमोद्वार को पार करके निरंजन शिव का दर्शन प्राप्त करते हैं। यम से (संयम से) लिंग तथा प्रत्याहार द्वारा वैदिक (?) का (संयमन करके) ध्यान तथा धारणरूप पुष्पों से अव्यय शिव की अर्चना करनी चाहिये। शरीर में अग्नि प्रज्वलित करे, तृण काष्ठ के समान न्यासविधान से। (जैसे भौतिक अग्नि तृण-काष्ठ से प्रज्वलित होती है, वैसे शरीराग्नि न्यास विधान से प्रज्वलित होती है)॥१०-११॥

युञ्जयेदुद्गतान् दोषान् मनःकृत्वा सुनिश्चितम्।
विस्तीर्णाद्धारणाच्चैव नासाग्रे चिन्तयेच्छिवम्॥१२॥