भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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द्व्यशीतितमोऽध्यायः ३९७

चिन्तयेच्च सदा ह्येवं कृत्वा पूजां तु देहजाम्।
क्षणाद्ध्रस्वत्वमायान्ति प्रकीर्णानीन्द्रियाणि च॥१३॥
शुद्धो दोषस्तथा मन्त्री ध्यायन् मन्त्री न लिप्यते।
ज्ञानशुद्धस्तथा मन्त्री विचरेद्विषयैरपि ॥१४॥
भावग्राह्यं मनः कृत्वा बुध्वा भोक्तारमीश्वरम्।
सदा समत्वमायाति सामान्यः सर्वगोचरः ॥१५॥
इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे हृदयपुष्पनाम द्व्यशीतितमोऽध्यायः

मन को सुनिश्चित करके तद्गत दोषों को अग्नि में छोड़े अर्थात् दोषों का नाश करे। विस्तीर्ण धारणा से नासाग्र में शिवचिन्तन करना चाहिये।

ऐसी देहजात पूजा करके जो सदैव चिन्तन करता है, उसे क्षण काल में ह्रस्वत्व प्राप्त होता है तथा इन्द्रियाँ शुद्ध हो जाती हैं। ऐसे दोषों को शुद्ध करके मन्त्री जब ध्यान में लिप्त नहीं होता, तब भी ज्ञानशुद्ध मन्त्रज्ञ साधक विषयों के साथ भी विचरण कर सकता है (तब भी वह उसमें लिप्त नहीं होता)॥१२-१५॥

श्रीसाम्बपुराणोक्त ज्ञानोत्तर में हृदयपुष्प नामक बयासीवाँ अध्याय समाप्त