भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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त्र्यशीतितमोऽध्यायः

( तत्त्वनिरूपणम् )

त्रिविधं त्रिविधाकारं त्रिविधं पञ्चसंस्थितम्।
त्रिविधेन तु योगेन लभ्यते तत्त्वनिश्चलम् ॥१॥
यस्य योगः स्मृतः शास्त्रे परे तु परमोद्भवे।
लिङ्गं तस्य सदा योज्यं ज्ञानयोगाच्च कर्मतः ॥२॥
अहिंसा च क्षमा चैव धृतिरिन्द्रियनिग्रहः।
शौचमक्रोधनं सत्यं कर्मशास्त्रविदांवरम् ॥३॥
शास्त्रज्ञादथ योगाच्च गुरुदारेषु किल्विषात्।
मुक्तिस्तत्राविकल्पेन त्रिविधा परिकीर्तिता ॥४॥

तीन, तीन आकार तथा तीन पञ्च संस्थित त्रिविध योग से तत्त्व की स्थिरता मिलती है। परमोद्भव शास्त्र जिसका योग स्मृत हुआ है, ज्ञान योग द्वारा कर्म से उसका लिंग सदा युक्त रहता है। अहिंसा, क्षमा, धैर्य, इन्द्रियसयंम, शौच, अक्रोध तथा सत्य—ये सब शास्त्रविद्वण के श्रेष्ठ कर्म हैं। शास्त्रज्ञों से, योग से, गुरुदारादि (गमन) के पाप से अविकल्प तीन प्रकार की मुक्ति कही गयी है॥१-४॥

आसने च तथा पाने निश्वासोच्छ्वासदृष्टिषु।
त्रिषु वाप्यपचारेषु ज्ञानेन समता यदा ॥५॥
कारणानि निगृह्णीयाद्धटमानानि योगिनः।
प्रसूते तु तथा योगः क्रीडन्ति विषयोरगैः ॥६॥

आसन, पान तथा निश्वास-उच्छ्वास-दृष्टि विषय में तीन प्रकार के किये अप-आचरण में ज्ञान द्वारा जब समता प्राप्त हो जाती है, तब योगीगण घटमान कारणसमूह को निगृहीत करते हैं। ऐसा योग होने पर विषयरूप सर्प के साथ वे क्रीड़ा करते हैं (विषयरूप सर्प उनको डस नहीं पाते)॥५-६॥

निरुद्ध्य दग्धावासस्य गुरुपूजा च सर्वदा।
विना विज्ञानयोगाभ्यां मृतस्य न विपर्ययः ॥७॥
कर्मयोगं तु विज्ञानात् प्रवृत्तः सर्वदा दहेत् ॥८॥
ज्ञानेन केवलेनैव साधकः सर्वतश्चरेत्।
आत्मना हि स भेदज्ञः सुखं भिन्नः समाचरेत् ॥९॥