भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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त्र्यशीतितमोऽध्यायः ३९९

जो निरोध करके वासना को दग्ध करते हैं, उनकी गुरुपूजा सदा सार्थक होती है; विज्ञान तथा योग के विना कभी भी मृत्यु से छुटकारा नहीं होता। योग की तुलना में ज्ञान प्रशंसनीय है। लौकिक कर्म निकृष्ट है। विज्ञान द्वारा प्रवृत्त होकर सदा कर्मयोग (लौकिक कर्म) दग्ध होता है। (तत्त्वज्ञ) साधक को केवल ज्ञान द्वारा ही सर्वतोभावेन विचरण करना चाहिये। भेदज्ञ साधक आत्मा द्वारा आदि तत्त्व से अलग होकर सुख (की खोज) का आचरण करते हैं।।७-९।।

प्रकृतिं पुरुषं चैव ज्ञात्वा ज्ञानी न तप्यते।
तेषामुपरितः सूक्ष्मः सर्वव्यापी शिवोऽव्ययः ॥१०॥
विदित्वा ज्ञानबुद्ध्यन्तं जायते वेदवित्तमः।
ततः स्वकरणैः कार्यं न योगेन च कर्मणा ॥११॥
आत्मनो ज्ञानमात्रेण वीक्ष्यते तु चराचरम्।
प्रकृतौ पुरुषो लीनः पाशैस्तु प्रकृतिर्वृता ॥१२॥
परापरस्य ज्ञाता वै नरः कर्म परित्यजेत्।
प्रकृतेः पुरुषाश्चैव प्रज्ञानो परमो भवेत् ॥१३॥

ज्ञानी प्रकृति-पुरुष को जानकर कभी भी तृप्त नहीं होते; क्योंकि इसके ऊपर अवस्थित हैं—सर्वव्यापी अव्यय शिव। ज्ञान तथा बुद्धि का शेष जानकर वेदविद्गण उत्तम हो जाते हैं। तदनन्तर अपने करण द्वारा कार्य करना ही उचित है, यौगिक कर्म द्वारा उचित नहीं है। आत्मा के ज्ञानमात्र से चराचर का ज्ञान तथा दर्शन होने लगाता है। प्रकृति में पुरुष लीन हैं तथा पाशों से प्रकृति आवृत हैं। पर एवं अपर तत्त्व के ज्ञाता व्यक्ति कर्म का परित्याग कर देते हैं। प्रकृति से पृथक् होकर पुरुष परम प्रज्ञान हो जाता है।।१०-१३।।

पुमांसस्तेन मुच्यन्ते परावरविचारिणः।
विपर्यये पुनस्तेषां पूर्वस्यां प्रकृतौ स्थिताः ॥१४॥
एको यदि भवेज्जीवो बन्धः कस्य भवेत् पुनः।
कैवल्यं च कथं पुंसां बन्धः प्राधानिकौ यदि ॥१५॥
अथ चेन्नित्यताबन्धः पुंसस्तत्र निरर्थकः।
तस्माज्ज्ञानधरो योगी सर्वदा सुखमश्नुते ॥१६॥

स्थूल तथा सूक्ष्म तत्त्व में विचरण करने वाले पुरुषगण मुक्त हो जाते हैं। विपर्यय होने पर पुरुषगण पुनः प्रकृति में अवस्थान के लिये बाध्य हो जाते हैं। यदि जीव एक है, तब बन्धन किसका होगा? यदि पुरुष का बन्धन प्राधानिक है, तब कैवल्य किसका होगा? और यदि पुरुष नित्य है, तब पुरुष का बन्धन कहना अर्थहीन है। अतएव ज्ञानधर योगी सदा सुख (लौकिक सुख) का त्याग करते हैं।।१४-१६।।