साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४०० श्रीसाम्बपुराणम्
तारके ज्ञानसंस्कारे न प्रभुर्बध्यते क्वचित्।
इच्छया चरते ज्ञानी योगी कालान्तरेण तु ॥१७॥
दग्धे चैव तु पाशेऽस्मिन् गुरुणा शास्त्रमात्मना।
अभिव्यक्तं रसं दिव्यं भू प्राप्तं गुरुसंस्मरेत् ॥१८॥
एवं संज्ञानसंयोगाच्चाद्यपाशाद्विमुच्यते।
न हिंसेदात्मनात्मानं न हिंसेदिन्द्रियाणि च ॥१९॥
यथाभागं तु वै युंज्यादन्यथा तु विपर्ययैः।
दिशो यस्य तु वै श्रोत्रे जीवः श्रोत्रे व्यवस्थितः ॥२०॥
यदि तारक (ॐ) से ज्ञान-संचार होता है, तब समर्थवान् व्यक्ति कभी भी बद्ध नहीं होता। ज्ञानी स्वेच्छा से विचरण करते हैं, किन्तु योगी कालान्तर में भी विचरण कर सकते हैं। गुरु, शास्त्र तथा आत्मा से यह पाश दग्ध हो जाता है तब दिव्य रसाभिव्यक्ति होती है। ऐसे संज्ञान के संयोग से शीघ्र ही पाश से छुटकारा मिलता है। आत्मा द्वारा आत्मा की हिंसा न करे तथा इन्द्रियों की भी हिंसा न करे। यथाभाग योग करे; अन्यथा विपर्यय होगा। दिक् समूह जिनका श्रोत्र है, जीव उसी में स्थित है॥१७-२०॥
स पश्येदात्मना शुद्धः परमात्मानमात्मना।
त्यक्तवायुरिति प्रोक्तः स्पर्शस्तत्रात्मसम्भवः।
वायुश्च स्पर्शनं युक्तो स्पर्शनं त्वरितं जनः ॥२१॥
चक्षुषा गृह्यते रूपं चक्षुरूपं समुद्भवम्।
जायते शक्तिस्तस्तेन न परस्तेन लिप्यते ॥२२॥
रसज्ञा रसना जिह्वा रसस्तु वरुणात्मकः।
आशश्च परतस्तत्र वरुणश्चात्र सम्भवः ॥२३॥
जो शुद्ध साधक आत्मा द्वारा दर्शन करते हैं, वे उसी से परमात्मा को देखते हैं। त्यक्त वायु जहाँ है, वहाँ स्पर्श आत्मस्वरूप है। वायु का गुण है—स्पर्श। स्पर्श से लोक त्वरित होते हैं। चक्षु से रूप ग्रहण होता है अथवा उसी से (रूप से) चक्षु उत्पन्न है। (रस) वह शक्ति से उत्पन्न होता है। इसी से परवर्त्ती (चक्षु) उसमें लिप्त हो जाता है। जिह्वा रसज्ञा (रसना) है; किन्तु रस वरुणात्मक है। (रस) वह परमात्मा से व्याप्त है। वहीं से है—वरुण की उत्पत्ति॥२१-२३॥
पार्थिवस्तु तथा घ्राणे गन्धस्तु पृथिवी गुणः।
युक्तस्तु पुरुषो ह्यत्र न परः पृथिवीगतः ॥२४॥
अग्निः सर्वमिति प्रोक्तः सर्वस्मिन्नात्मनि स्थितः।
वायुरप्यत्र विज्ञेयो न परो लिप्यते तदा ॥२५॥