साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंत्र्यशीतितमोऽध्यायः ४०१
इन्द्रियस्येन्द्रगोप्तृत्वाद्धस्तौ चेन्द्रेण संयुतौ।
पुरुषः वापि संयुक्तो न परस्तेन लिप्यते ॥२६॥
पार्थिव वस्तु घ्राण से ग्राह्य होती है। गन्ध है—पृथिवी का गुण, जहाँ पुरुष युक्त होता है; परन्तु परमात्मा पृथिवीगत नहीं है। अग्नि को सर्व कहते हैं। वह सर्वस्वरूप आत्मा में स्थित है। यहाँ अग्नि के साथ वायु को जाना जाता है; किन्तु उसमें परमात्मा लिप्त नहीं होता। इन्द्रियों का रक्षक है—इन्द्र, इसीलिये हस्तद्वय इन्द्र के साथ युक्त हैं। पुरुष हस्त से युक्त है। परमात्मा उसमें लिप्त नहीं होता॥२४-२६॥
भोक्ता विष्णुश्च पापानामपानं स्थानमुच्यते।
पुरुषः पादसंयुक्तस्त्रिधा वै विश्वतोमुखः ॥२७॥
वायुर्वै वर्चसो मार्गस्स मित्रो मित्रयोगतः।
पुरुषश्चात्र संयुक्तो न परः पुरुषो यथा ॥२८॥
अनिन्दं नन्दयत्यस्य विश्वात्माऽसौ प्रजापतिः।
उद्देशान्मनसः श्रौतं परोपप्रस्थितो व्रजेत् ॥२९॥
मनसश्चात्र विज्ञेयं यत्र चैवात्मनः स्थितिः।
न परोऽनेनसंयुक्तश्चान्द्रं रागीयतन्मनः ॥३०॥
भोक्ता है—विष्णु; पापसमूह का स्थान अपान है। पुरुष पादयुक्त है। तीन प्रकार विश्वात्मा का मुख है। वायु है तेज का पथ। उसे समित्र कहते हैं; क्योंकि उसका योजन मित्र (सूर्य) के साथ है। पुरुष यहाँ संयुक्त है, किन्तु परमपुरुष संयुक्त नहीं है। वह विश्वात्मा प्रजापति अनिन्दनीय को आनन्द देता है। मन के उद्देश्य से श्रोत्र दूसरे के द्वारा प्रेरित होकर गमन करता है। मन को जानना चाहिये, जहाँ आत्मा की स्थिति है; उससे अलग नहीं, पाप-संयुक्त नहीं। चन्द्र के समान उसका मन अनुरञ्जित होता है॥२८-३०॥
अहङ्कर्तेऽत्यहंकारः स रौद्रपुरुषालयः।
अहङ्कारेण संयुक्तोऽसौ परो नात्र युज्यते ॥३१॥
परं सर्वात्मकं ब्रह्म ज्ञानब्रह्मेति बाध्यते।
तेन बुद्ध्यत्यथो बुद्धिर्ज्ञानेन विपर्ययः ॥३२॥
त्रैविध्यमन्तःकरणे योऽभिजानाति तत्त्ववित्।
दश च त्रीणि चैतानि यो विद्याद्वि स योगवित् ॥३३॥
‘मैं कर्त्ता हूँ’—यह है अहंकार, रौद्र तथा पुरुष का आलय। पुरुष अहंकार से संयुक्त होता है, परमात्मा इससे युक्त नहीं होता। परमात्मा है सर्वात्मक ब्रह्म। ज्ञान ब्रह्म द्वारा बाधित होता है। उस ज्ञान से उसे पहचाना जाता है। अज्ञान से इसका विपर्यय होता है। जो अन्तःकरण के त्रैविध्य को जानते हैं, वे हैं तत्त्वविद् और जो १०, ३ इनको जानते हैं, वे हैं—योगविद्॥३१-३३॥
साम्ब०—२६