साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४०२ श्रीसाम्बपुराणम्
एषां तत्त्वेन वै चात्मा नाभाव्यो भावचिन्तकैः ।
अभाव्यं भावयेद्भावं भावो भाव्यं न भावकैः ॥३४॥
भावस्य भावनाज्ञानात् प्रजानां चेद्विपर्ययः ।
त्रिंशकात्प्रभृति ज्ञानं स्याद्योगवित् भ्रमात् ॥३५॥
कर्मकृच्च विदित्वैतज्ज्ञात्वैतद्वै प्रमुच्यते ।
विस्तरेण तदा ज्ञेयं ज्ञानिनां दीक्षितेन च ॥३६॥
योगसाधनयोर्नित्यमविभ्रंशः प्रकीर्तितः ।
बहुपाशावृतोऽप्येष जीवः कर्मवशानुगः ॥३७॥
इस तत्त्व द्वारा आत्मा की भावचिन्तन से भावना न करे। अभाव्य वस्तु की भावना करे। भाव्य वस्तु भावना द्वारा न करे अर्थात् आत्मा भाव के अन्तर्गत नहीं है। आत्मा में भाव से भावना करने से (भावना ज्ञान से) प्रजा का (उत्पन्न जीवगण का) विपर्यय घटित होता है। त्रिंशक प्रभृति ज्ञान क्रम से साधक योगविद् हो जाता है। कर्मकर्त्ता यह जानकर इसी ज्ञान से मुक्त हो जाते हैं। ज्ञानीगण के पास से दीक्षित होकर इसे विस्तार से जानना होगा। योग तथा साधन से नित्य संलग्न रहे। भ्रष्ट न हो, यह कहा गया है। बहुत से पाशों में बंधा जीव कर्म के वशीभूत होकर उसी का अनुगत हो जाता है।।३४-३७।।
तद्योगात् स चरत्यत्र तद्योगात् केवलं भवेत् ।
सम्भवं प्रसवं चैव चालयं च पृथक्पृथक् ॥३८॥
करणान्याकृतिश्चित्तं त्रिकं च दशकं च तत् ।
तदेव भावयेच्छिन्नो ह्यच्छेद्यं छेद्यवित्तमः ॥३९॥
कर्म के योग में वह विचरण करता है। वह ज्ञानयोग के (अनुशीलन से) कारण मुक्त हो जाता है। जन्म, उत्पत्ति तथा लय पृथक्-पृथक् होते हैं। चित्त करण की आकृति पाकर ३-१० प्रकार का होता है। श्रेष्ठ छेदनकर्त्ता उस अच्छेद्य की छिन्न रूप में भावना करते हैं।
सर्वभावैरभाव्यं तद्भावयेच्छिवमव्ययम् ।
ज्ञानेन केवलेनास्य योगेनापि च भावयेत् ।
कर्मणि प्राकृते चापि क्वचिद् ध्यायंस्तु शास्त्रतः ॥४०॥
इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे तत्त्वनिरूपणन्नाम त्र्यशीतितमोऽध्यायः
समस्त भाव से इस अभाव्य अव्यय शिव की भावना करे। प्राकृत कर्म का कभी-कभी शास्त्रानुसार ध्यान करके ज्ञान द्वारा तथा योग द्वारा शिव की भावना करे॥४०॥
श्रीसाम्बपुराणोक्त ज्ञानोत्तर में तत्त्वनिरूपण नामक तिरासीवाँ अध्याय समाप्त