साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 417, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुरशीतितमोऽध्यायः
(फलश्रुतिः)
श्रीसाम्ब उवाच
भगवन् प्राणिनः सर्वे कुष्ठरोगाद्युपद्रवैः।
सदा हि पीड्यमानास्ते तिष्ठन्ति मुनिसत्तम ॥१॥
येन कर्मविपाकेन सम्भवन्ति महामते।
तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तो ब्रह्मविदांवर ॥२॥
साम्ब कहते हैं—भगवन् मुनिश्रेष्ठ! सकल प्राणीगण सर्वदा कुष्ठ रोगादि उपद्रव से पीड़ित होते हैं। हे महामते! जिस कर्म का विपाक ऐसा होता है, वह सब आपसे सुनने की इच्छा है। आप ब्रह्मविद्या जानने वालों में श्रेष्ठ हैं।।१-२।।
नारद उवाच
व्रतोपवासैर्भानुर्नान्यो जन्मनि तोषितः।
तेनैव हेतुना ते तु कुष्ठरोगादिभागिनः ॥३॥
नारद कहते हैं—हे यदुश्रेष्ठ! जिन्होंने अन्य जन्मों में व्रतोपवास से सूर्यदेव को सन्तुष्ट नहीं किया है, वे ही कुष्ठरोगादि को प्राप्त होते हैं।।३।।
साम्ब उवाच
तेषां रोगोपशमनं जायते च कथं मुने।
तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि सत्यं सत्य वदस्व मे ॥४॥
साम्ब कहते हैं—मुनि! उनके रोग की शान्ति कैसे होती है? वह सब सुनने की इच्छा है। मुझे बताईये।।४।।
नारद उवाच
शृणु साम्ब महाबाहो कर्तव्यं रविपूजनम्।
यत्कृत्वा सर्वरोगेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥५॥
नारद कहते हैं—महाबाहु साम्ब! सुनो। वे रवि का पूजन करें। जिसे करने से सभी रोगों से मुक्ति मिलती है। इसमें संशय नहीं है।।५।।
साम्ब उवाच
एतत्सर्वं त्वया ख्यातं बह्वर्थं श्रुतिविस्तरम्।
यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥६॥