साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४०४ || श्रीसाम्बपुराणम्
सूर्यमुद्दिश्य किं देयं पाठकाय महात्मने।
येन तुष्येत्तु भगवान् भास्करः पापतस्करः॥७॥
साम्ब कहते हैं—आपने अनेक अर्थयुक्त श्रुतिविस्तर यह सब कहा, जिसे सुनकर सब पापों से मुक्ति मिलती है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। सूर्य के उद्देश्य से पाठक को (जो इस पुराण के पाठक हैं या सुना है) क्या देना उचित है, जिससे पापनाशक भगवान् भास्कर प्रसन्न हो जायें?॥६-७॥
नारद उवाच
शृणु साम्ब महाबाहो कथयामि तवानघ।
तमेव सूर्यं विज्ञाय पूजयित्वा यथाविधि॥८॥
गन्धपुष्पाक्षतैश्चैव धूपदीपैस्तथोत्तमैः।
स्वर्णालङ्कारवस्त्रैश्च शिरोरत्नविभूषणैः॥९॥
प्रपूज्य सूर्यरूपं तं देया च कपिला शुभा।
गोधूमयवधान्यानि माषमुद्गांस्तिलांस्तथा॥१०॥
गजाश्वमहिषीर्दद्याद्रत्नानि विविधानि च।
हिरण्यं रजतं चैव कांस्यं ताम्रस्य भाजनम्॥११॥
दासदास्यौ तथा दद्याद् भूमिं शस्यवतीं तथा।
पट्टवस्त्राण्यनेकानि दद्याद्वै शुद्धमानसः॥१२॥
नारद कहते हैं—महाबाहु साम्ब! सुनो! तुम जैसे निष्पाप से कहता हूँ। उन सूर्य को जानकर यथाविधि पूजन करे। तत्पश्चात् गन्ध-पुष्प-अक्षत-धूप-दीप-उत्तम द्रव्य, स्वर्ण, अलंकार, वस्त्र, मस्तक का रत्नविभूषण—इन सबसे सूर्यरूप उनकी पाठक पूजा करे तथा शुभ कपिला गौ प्रदान करे। गेहूँ-जौ-धान्य-मूँग-तिल, हाथी, घोड़ा, भैंस, विभिन्न रत्न तथा चाँदी-कास्य तथा ताम्रपात्र प्रदान करे॥८-१२॥
निक्षुभा च तथा राज्ञी द्वे भार्ये च विवस्वतः।
उद्दिश्य तानि देयानि वस्त्रालङ्करणानि च॥१३॥
एवं यः कुरुते भक्त्या स मर्त्योऽत्र महीतले।
पुत्रपौत्रादिसंयुक्तो हर्षनिर्भरमानसः॥१४॥
निक्षुभा तथा राज्ञी सूर्य की भार्या हैं। उनके लिये वस्त्र तथा अलंकार प्रदान करे। जो मरणधर्मा व्यक्ति भक्ति से ऐसा करते हैं, वे इस पृथ्वी में पुत्र-पौत्रादि से युक्त होकर आनन्द से निरुद्वेग चित्त हो जाते हैं॥१३-१४॥