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साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

४०० श्रीसाम्बपुराणम्

तारके ज्ञानसंस्कारे न प्रभुर्बध्यते क्वचित्।
इच्छया चरते ज्ञानी योगी कालान्तरेण तु ॥१७॥
दग्धे चैव तु पाशेऽस्मिन् गुरुणा शास्त्रमात्मना।
अभिव्यक्तं रसं दिव्यं भू प्राप्तं गुरुसंस्मरेत् ॥१८॥
एवं संज्ञानसंयोगाच्चाद्यपाशाद्विमुच्यते।
न हिंसेदात्मनात्मानं न हिंसेदिन्द्रियाणि च ॥१९॥
यथाभागं तु वै युंज्यादन्यथा तु विपर्ययैः।
दिशो यस्य तु वै श्रोत्रे जीवः श्रोत्रे व्यवस्थितः ॥२०॥

यदि तारक (ॐ) से ज्ञान-संचार होता है, तब समर्थवान् व्यक्ति कभी भी बद्ध नहीं होता। ज्ञानी स्वेच्छा से विचरण करते हैं, किन्तु योगी कालान्तर में भी विचरण कर सकते हैं। गुरु, शास्त्र तथा आत्मा से यह पाश दग्ध हो जाता है तब दिव्य रसाभिव्यक्ति होती है। ऐसे संज्ञान के संयोग से शीघ्र ही पाश से छुटकारा मिलता है। आत्मा द्वारा आत्मा की हिंसा न करे तथा इन्द्रियों की भी हिंसा न करे। यथाभाग योग करे; अन्यथा विपर्यय होगा। दिक् समूह जिनका श्रोत्र है, जीव उसी में स्थित है॥१७-२०॥

स पश्येदात्मना शुद्धः परमात्मानमात्मना।
त्यक्तवायुरिति प्रोक्तः स्पर्शस्तत्रात्मसम्भवः।
वायुश्च स्पर्शनं युक्तो स्पर्शनं त्वरितं जनः ॥२१॥
चक्षुषा गृह्यते रूपं चक्षुरूपं समुद्भवम्।
जायते शक्तिस्तस्तेन न परस्तेन लिप्यते ॥२२॥
रसज्ञा रसना जिह्वा रसस्तु वरुणात्मकः।
आशश्च परतस्तत्र वरुणश्चात्र सम्भवः ॥२३॥

जो शुद्ध साधक आत्मा द्वारा दर्शन करते हैं, वे उसी से परमात्मा को देखते हैं। त्यक्त वायु जहाँ है, वहाँ स्पर्श आत्मस्वरूप है। वायु का गुण है—स्पर्श। स्पर्श से लोक त्वरित होते हैं। चक्षु से रूप ग्रहण होता है अथवा उसी से (रूप से) चक्षु उत्पन्न है। (रस) वह शक्ति से उत्पन्न होता है। इसी से परवर्त्ती (चक्षु) उसमें लिप्त हो जाता है। जिह्वा रसज्ञा (रसना) है; किन्तु रस वरुणात्मक है। (रस) वह परमात्मा से व्याप्त है। वहीं से है—वरुण की उत्पत्ति॥२१-२३॥

पार्थिवस्तु तथा घ्राणे गन्धस्तु पृथिवी गुणः।
युक्तस्तु पुरुषो ह्यत्र न परः पृथिवीगतः ॥२४॥
अग्निः सर्वमिति प्रोक्तः सर्वस्मिन्नात्मनि स्थितः।
वायुरप्यत्र विज्ञेयो न परो लिप्यते तदा ॥२५॥

त्र्यशीतितमोऽध्यायः ४०१

इन्द्रियस्येन्द्रगोप्तृत्वाद्धस्तौ चेन्द्रेण संयुतौ।
पुरुषः वापि संयुक्तो न परस्तेन लिप्यते ॥२६॥

पार्थिव वस्तु घ्राण से ग्राह्य होती है। गन्ध है—पृथिवी का गुण, जहाँ पुरुष युक्त होता है; परन्तु परमात्मा पृथिवीगत नहीं है। अग्नि को सर्व कहते हैं। वह सर्वस्वरूप आत्मा में स्थित है। यहाँ अग्नि के साथ वायु को जाना जाता है; किन्तु उसमें परमात्मा लिप्त नहीं होता। इन्द्रियों का रक्षक है—इन्द्र, इसीलिये हस्तद्वय इन्द्र के साथ युक्त हैं। पुरुष हस्त से युक्त है। परमात्मा उसमें लिप्त नहीं होता॥२४-२६॥

भोक्ता विष्णुश्च पापानामपानं स्थानमुच्यते।
पुरुषः पादसंयुक्तस्त्रिधा वै विश्वतोमुखः ॥२७॥
वायुर्वै वर्चसो मार्गस्स मित्रो मित्रयोगतः।
पुरुषश्चात्र संयुक्तो न परः पुरुषो यथा ॥२८॥
अनिन्दं नन्दयत्यस्य विश्वात्माऽसौ प्रजापतिः।
उद्देशान्मनसः श्रौतं परोपप्रस्थितो व्रजेत् ॥२९॥
मनसश्चात्र विज्ञेयं यत्र चैवात्मनः स्थितिः।
न परोऽनेनसंयुक्तश्चान्द्रं रागीयतन्मनः ॥३०॥

भोक्ता है—विष्णु; पापसमूह का स्थान अपान है। पुरुष पादयुक्त है। तीन प्रकार विश्वात्मा का मुख है। वायु है तेज का पथ। उसे समित्र कहते हैं; क्योंकि उसका योजन मित्र (सूर्य) के साथ है। पुरुष यहाँ संयुक्त है, किन्तु परमपुरुष संयुक्त नहीं है। वह विश्वात्मा प्रजापति अनिन्दनीय को आनन्द देता है। मन के उद्देश्य से श्रोत्र दूसरे के द्वारा प्रेरित होकर गमन करता है। मन को जानना चाहिये, जहाँ आत्मा की स्थिति है; उससे अलग नहीं, पाप-संयुक्त नहीं। चन्द्र के समान उसका मन अनुरञ्जित होता है॥२८-३०॥

अहङ्कर्तेऽत्यहंकारः स रौद्रपुरुषालयः।
अहङ्कारेण संयुक्तोऽसौ परो नात्र युज्यते ॥३१॥
परं सर्वात्मकं ब्रह्म ज्ञानब्रह्मेति बाध्यते।
तेन बुद्ध्यत्यथो बुद्धिर्ज्ञानेन विपर्ययः ॥३२॥
त्रैविध्यमन्तःकरणे योऽभिजानाति तत्त्ववित्।
दश च त्रीणि चैतानि यो विद्याद्वि स योगवित् ॥३३॥

‘मैं कर्त्ता हूँ’—यह है अहंकार, रौद्र तथा पुरुष का आलय। पुरुष अहंकार से संयुक्त होता है, परमात्मा इससे युक्त नहीं होता। परमात्मा है सर्वात्मक ब्रह्म। ज्ञान ब्रह्म द्वारा बाधित होता है। उस ज्ञान से उसे पहचाना जाता है। अज्ञान से इसका विपर्यय होता है। जो अन्तःकरण के त्रैविध्य को जानते हैं, वे हैं तत्त्वविद् और जो १०, ३ इनको जानते हैं, वे हैं—योगविद्॥३१-३३॥

साम्ब०—२६

४०२ श्रीसाम्बपुराणम्

एषां तत्त्वेन वै चात्मा नाभाव्यो भावचिन्तकैः ।
अभाव्यं भावयेद्भावं भावो भाव्यं न भावकैः ॥३४॥
भावस्य भावनाज्ञानात् प्रजानां चेद्विपर्ययः ।
त्रिंशकात्प्रभृति ज्ञानं स्याद्योगवित् भ्रमात् ॥३५॥
कर्मकृच्च विदित्वैतज्ज्ञात्वैतद्वै प्रमुच्यते ।
विस्तरेण तदा ज्ञेयं ज्ञानिनां दीक्षितेन च ॥३६॥
योगसाधनयोर्नित्यमविभ्रंशः प्रकीर्तितः ।
बहुपाशावृतोऽप्येष जीवः कर्मवशानुगः ॥३७॥

इस तत्त्व द्वारा आत्मा की भावचिन्तन से भावना न करे। अभाव्य वस्तु की भावना करे। भाव्य वस्तु भावना द्वारा न करे अर्थात् आत्मा भाव के अन्तर्गत नहीं है। आत्मा में भाव से भावना करने से (भावना ज्ञान से) प्रजा का (उत्पन्न जीवगण का) विपर्यय घटित होता है। त्रिंशक प्रभृति ज्ञान क्रम से साधक योगविद् हो जाता है। कर्मकर्त्ता यह जानकर इसी ज्ञान से मुक्त हो जाते हैं। ज्ञानीगण के पास से दीक्षित होकर इसे विस्तार से जानना होगा। योग तथा साधन से नित्य संलग्न रहे। भ्रष्ट न हो, यह कहा गया है। बहुत से पाशों में बंधा जीव कर्म के वशीभूत होकर उसी का अनुगत हो जाता है।।३४-३७।।

तद्योगात् स चरत्यत्र तद्योगात् केवलं भवेत् ।
सम्भवं प्रसवं चैव चालयं च पृथक्पृथक् ॥३८॥
करणान्याकृतिश्चित्तं त्रिकं च दशकं च तत् ।
तदेव भावयेच्छिन्नो ह्यच्छेद्यं छेद्यवित्तमः ॥३९॥

कर्म के योग में वह विचरण करता है। वह ज्ञानयोग के (अनुशीलन से) कारण मुक्त हो जाता है। जन्म, उत्पत्ति तथा लय पृथक्-पृथक् होते हैं। चित्त करण की आकृति पाकर ३-१० प्रकार का होता है। श्रेष्ठ छेदनकर्त्ता उस अच्छेद्य की छिन्न रूप में भावना करते हैं।

सर्वभावैरभाव्यं तद्भावयेच्छिवमव्ययम् ।
ज्ञानेन केवलेनास्य योगेनापि च भावयेत् ।
कर्मणि प्राकृते चापि क्वचिद् ध्यायंस्तु शास्त्रतः ॥४०॥

इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे तत्त्वनिरूपणन्नाम त्र्यशीतितमोऽध्यायः

समस्त भाव से इस अभाव्य अव्यय शिव की भावना करे। प्राकृत कर्म का कभी-कभी शास्त्रानुसार ध्यान करके ज्ञान द्वारा तथा योग द्वारा शिव की भावना करे॥४०॥

श्रीसाम्बपुराणोक्त ज्ञानोत्तर में तत्त्वनिरूपण नामक तिरासीवाँ अध्याय समाप्त

चतुरशीतितमोऽध्यायः

(फलश्रुतिः)

श्रीसाम्ब उवाच

भगवन् प्राणिनः सर्वे कुष्ठरोगाद्युपद्रवैः।
सदा हि पीड्यमानास्ते तिष्ठन्ति मुनिसत्तम ॥१॥
येन कर्मविपाकेन सम्भवन्ति महामते।
तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तो ब्रह्मविदांवर ॥२॥

साम्ब कहते हैं—भगवन् मुनिश्रेष्ठ! सकल प्राणीगण सर्वदा कुष्ठ रोगादि उपद्रव से पीड़ित होते हैं। हे महामते! जिस कर्म का विपाक ऐसा होता है, वह सब आपसे सुनने की इच्छा है। आप ब्रह्मविद्या जानने वालों में श्रेष्ठ हैं।।१-२।।

नारद उवाच

व्रतोपवासैर्भानुर्नान्यो जन्मनि तोषितः।
तेनैव हेतुना ते तु कुष्ठरोगादिभागिनः ॥३॥

नारद कहते हैं—हे यदुश्रेष्ठ! जिन्होंने अन्य जन्मों में व्रतोपवास से सूर्यदेव को सन्तुष्ट नहीं किया है, वे ही कुष्ठरोगादि को प्राप्त होते हैं।।३।।

साम्ब उवाच

तेषां रोगोपशमनं जायते च कथं मुने।
तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि सत्यं सत्य वदस्व मे ॥४॥

साम्ब कहते हैं—मुनि! उनके रोग की शान्ति कैसे होती है? वह सब सुनने की इच्छा है। मुझे बताईये।।४।।

नारद उवाच

शृणु साम्ब महाबाहो कर्तव्यं रविपूजनम्।
यत्कृत्वा सर्वरोगेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥५॥

नारद कहते हैं—महाबाहु साम्ब! सुनो। वे रवि का पूजन करें। जिसे करने से सभी रोगों से मुक्ति मिलती है। इसमें संशय नहीं है।।५।।

साम्ब उवाच

एतत्सर्वं त्वया ख्यातं बह्वर्थं श्रुतिविस्तरम्।
यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥६॥

४०४ || श्रीसाम्बपुराणम्

सूर्यमुद्दिश्य किं देयं पाठकाय महात्मने।
येन तुष्येत्तु भगवान् भास्करः पापतस्करः॥७॥

साम्ब कहते हैं—आपने अनेक अर्थयुक्त श्रुतिविस्तर यह सब कहा, जिसे सुनकर सब पापों से मुक्ति मिलती है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। सूर्य के उद्देश्य से पाठक को (जो इस पुराण के पाठक हैं या सुना है) क्या देना उचित है, जिससे पापनाशक भगवान् भास्कर प्रसन्न हो जायें?॥६-७॥

नारद उवाच

शृणु साम्ब महाबाहो कथयामि तवानघ।
तमेव सूर्यं विज्ञाय पूजयित्वा यथाविधि॥८॥
गन्धपुष्पाक्षतैश्चैव धूपदीपैस्तथोत्तमैः।
स्वर्णालङ्कारवस्त्रैश्च शिरोरत्नविभूषणैः॥९॥
प्रपूज्य सूर्यरूपं तं देया च कपिला शुभा।
गोधूमयवधान्यानि माषमुद्गांस्तिलांस्तथा॥१०॥
गजाश्वमहिषीर्दद्याद्रत्नानि विविधानि च।
हिरण्यं रजतं चैव कांस्यं ताम्रस्य भाजनम्॥११॥
दासदास्यौ तथा दद्याद् भूमिं शस्यवतीं तथा।
पट्टवस्त्राण्यनेकानि दद्याद्वै शुद्धमानसः॥१२॥

नारद कहते हैं—महाबाहु साम्ब! सुनो! तुम जैसे निष्पाप से कहता हूँ। उन सूर्य को जानकर यथाविधि पूजन करे। तत्पश्चात् गन्ध-पुष्प-अक्षत-धूप-दीप-उत्तम द्रव्य, स्वर्ण, अलंकार, वस्त्र, मस्तक का रत्नविभूषण—इन सबसे सूर्यरूप उनकी पाठक पूजा करे तथा शुभ कपिला गौ प्रदान करे। गेहूँ-जौ-धान्य-मूँग-तिल, हाथी, घोड़ा, भैंस, विभिन्न रत्न तथा चाँदी-कास्य तथा ताम्रपात्र प्रदान करे॥८-१२॥

निक्षुभा च तथा राज्ञी द्वे भार्ये च विवस्वतः।
उद्दिश्य तानि देयानि वस्त्रालङ्करणानि च॥१३॥
एवं यः कुरुते भक्त्या स मर्त्योऽत्र महीतले।
पुत्रपौत्रादिसंयुक्तो हर्षनिर्भरमानसः॥१४॥

निक्षुभा तथा राज्ञी सूर्य की भार्या हैं। उनके लिये वस्त्र तथा अलंकार प्रदान करे। जो मरणधर्मा व्यक्ति भक्ति से ऐसा करते हैं, वे इस पृथ्वी में पुत्र-पौत्रादि से युक्त होकर आनन्द से निरुद्वेग चित्त हो जाते हैं॥१३-१४॥

अष्टादशपुराणानां श्रवणे यत्फलं लभेत्।

चतुरशीतितमोऽध्यायः ४०५

भुक्त्वा तु सकलान् भोगान् सूर्यलोके महीयते।
अष्टादशपुराणानां श्रवणे यत्फलं लभेत्।
तत्फलं समवाप्नोति सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥१५॥

इति श्रीसाम्बपुराणे वशिष्ठबृहद्बलसंवादे
फलश्रुतिर्नाम चतुरशीतितमोऽध्यायः

इस संसार में समस्त भोगों का उपभोग करके वे सूर्यलोक में पूजित होते हैं। १८ पुराणों के सुनने से जो फल मिलता है, वह सब इसके पाठ से मिलता है; तुमसे यह सत्य-सत्य कहता हूँ॥१५॥

श्री साम्ब पुराणोक्त वशिष्ठ-बृहद्दल संवाद में फलश्रुति
नामक चौरासीवाँ अध्याय समाप्त

शुभं भवतु
॥ समाप्तोऽयं ग्रन्थः ॥

योगवासिष्ठः

(महारामायणम्)

भाषानुवादकारःसम्पादकौ
स्व. पण्डित श्री कृष्ण पन्त शास्त्री<br>अध्यक्ष, अच्युतग्रन्थमाला-काशीस्व. पण्डित श्री कृष्ण पन्त शास्त्री<br>स्व. पण्डित श्री मूलशङ्कर शास्त्री

भूमिकालेखकः संशोधकश्च
प्रोफेसर मदनमोहन अग्रवाल

योगवासिष्ठ, वेदान्तशास्त्र के मुख्य प्रमाणित ग्रन्थ प्रस्थानत्रयी = उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र और गीतादि में एक संस्कृत भाषा का बृहत् ग्रन्थ है । बृहद् योगवासिष्ठ में लगभग बत्तीस हजार (32000) या तैंतीस हजार (33000) श्लोक है । यह ग्रन्थ योगवासिष्ठमहारामायण, महारामायण, आर्षरामायण, वासिष्ठ रामायण, ज्ञानवासिष्ठ और वासिष्ठ आदि नामों से भी ज्ञात है । यह ग्रन्थ अत्यन्त आदरणीय है, क्योंकि इसमें किसी सम्प्रदायविशेष का उल्लेख नहीं है । भारत के एक कोने से दूसरे काने तक इसका पाठ, मूल तथा भाषानुवाद में, चिरकाल से होता चला आ रहा है । जो महत्त्व भगवद् भक्तों के लिए भागवतपुराण और रामचरितमानस का है, तथा कर्मयोगियों के लिए भगवद्गीता का है, वही महत्त्व ज्ञानियों के लिए योगवासिष्ठ का है । सहस्रों स्त्री-पुरुष-राजा से रङ्क तक-इस अद्भुत ग्रन्थ के अध्ययन से प्रतिदिन के जीवन में आनन्द और शान्ति प्राप्त करते रहे हैं । इस ग्रन्थ में प्रायः सभी प्रकार के पाठकों के अनुयोग के लिए सामग्री प्रस्तुत हैं । जहाँ अबोध बालक भी इसकी कहानियाँ सुनकर प्रसन्न होते हैं, वहां बड़े-बड़े विद्वानों के लिए गहनतम दार्शनिक सिद्धान्तों का इसमें प्रतिपादन है । ऐसा कोई भी प्रश्न नहीं है, जिसका समाधान इसमें प्राप्त न हो । यह ऐसा अद्भुत ग्रन्थ है कि इसमें काव्य, उपाख्यान तथा दर्शन—सभी का आनन्द वर्तमान है यह सब श्रुतियों का सार एवं माण्डूकारिका का वार्तिक = व्याख्यान ग्रन्थ है । महर्षि वसिष्ठ ने स्वयं कहा है—
'यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित् । इमं समस्तविज्ञानशास्त्रकोशं विदुर्बुधाः ॥'
योगवासिष्ठ के प्रस्तुत संस्करण में संस्कृत के प्रत्येक श्लोकों की अत्यन्त सरल हिन्दी भाषा में सुन्दर विवेचना की गई है, जो इसकी प्रमुख विशेषता है । कोई भी व्यक्ति, जो संस्कृत से सर्वथा अपरिचित है, इसका सरलतापूर्वक अध्ययन कर योगवासिष्ठ के गूढ़दार्शनिक स्थलों को हृदयंगम कर सकेगा और उसको मुक्तिलाभ के लिए अन्य साधनों की अपेक्षा नहीं रह जाती है । मोक्षप्राप्ति के उपाय ढूँढने की चेष्टा में व्यक्ति को आत्मानुभव होता है । इस ग्रन्थ के अध्ययन से व्यक्ति के सम्पूर्ण क्लेशों - दुःखों का अन्त होकर उसके हृदय में अपूर्व शान्ति प्राप्त होगी । अध्ययनार्थी सांसारिक सुख-दुःख की परिधि से बाहर निकलकर परम आनन्द का अनुभव करेगा । मनोयोगपूर्वक अध्ययन करनेवाले निश्चय ही इस जीवन में ब्रह्मज्ञान कर मुक्ति को प्राप्त करेंगे । यह ग्रन्थ ज्ञान का भण्डार है । वेदान्त के ग्रन्थों में यह चमकता हुआ रत्न है । मुमुक्षु, के लिए यह ग्रन्थ नित्य स्वाध्याय-योग्य है । ग्रन्थ की मौलिक उपादेयता की दृष्टि से आशा की जा सकती है कि वेदान्त के सच्चे जिज्ञासुओं में इसका विशेष प्रचार होगा ।


प्रथम संस्करण : 2011मूल्य : 10000/- ( 1-6 भाग सम्पूर्ण )

चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन-वाराणसी

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श्रीविद्यार्णवतन्त्रम्

हिन्दीभाष्यकारः श्रीकपिलदेवनारायण

‘श्रीविद्या’ शब्द श्रीत्रिपुरसुन्दरी के मन्त्र एवं उसके अधिष्ठात्री देवता–इन दोनों का बोधक है। सामान्यतः ‘श्री’ शब्द ‘लक्ष्मी’ अर्थ में प्रसिद्ध है, परन्तु हारितायन संहिता, ब्रह्माण्डपुराण-उत्तरखण्ड आदि पुराणेतिहासों में वर्णित आख्यायिकाओं के अनुसार ‘श्री’ शब्द का मुख्य अर्थ ‘महात्रिपुरसुन्दरी’ ही है। श्री महालक्ष्मी ने महात्रिपुरसुन्दरी की चिरकाल-पर्यन्त आराधना कर जो अनेक वरदान प्राप्त किये हैं, उनमें एक वरदान ‘श्री’ की आख्या से लोक में ख्याति प्राप्त करने का भी है। अस्तु; ‘श्री’ शब्द का ‘महालक्ष्मी’ अर्थ तो गौण ही है, मुख्य अर्थ है–‘श्री’ अर्थात् महात्रिपुरसुन्दरी की प्रतिपादिका विद्या-मन्त्र = ‘श्रीविद्या’। वाच्य एवं वाचक का भेद मानकर इस मन्त्र की अधिष्ठात्री देवता भी ‘श्रीविद्या’ ही सिद्ध होती हैं। इस श्रीविद्या के उपासकों को लौकिक फल तो प्राप्त होते ही हैं, आत्मज्ञानी को प्राप्त होने वाला शोकोत्तीर्णतारूप फल भी श्रीविद्यापासकों को निश्चित रूप से प्राप्त होता है; साथ ही यही फल ब्रह्मविद्या से भी प्राप्त होता है; अतः फलैक्य होने के कारण श्रीविद्या ही ब्रह्मविद्या है–यह निर्विवाद सत्य प्रतिष्ठापित होता है। ‘श्रीविद्या’ का साङ्गोपाङ्ग विवेचन करने वाला सर्वप्रामाणिक महनीय ग्रन्थ ‘श्रीविद्यार्णवतन्त्रम्’ न केवल श्री विद्या; अपितु दश महाविद्याओं के विशद् विवेचन के साथ-साथ शैव, शाक्त, गाणपत्य, वैष्णव, सौर आदि सभी मन्त्रों एवं उनके तत्तद् यन्त्रों से पाठक को साक्षात्कार कराने वाला एक बृहत्काय ग्रन्थ है। स्वामी विद्यारण्य यति द्वारा छत्तीस श्वासों में गुम्फित यह ग्रन्थरत्न पूर्वार्द्ध एवं उत्तरार्द्ध रूप दो खण्डों में समुपलब्ध है। श्रीविद्या के सविधि विवेचन के साथ-साथ अन्य देवी-देवताओं के भी मन्त्र-यन्त्रों का समग्र रूप में विवेचन, उनके उपासना की विधि एवं उपासना के फलस्वरूप प्राप्त होने वाले फलों को स्पष्टतया अभिव्यक्त करना इस ग्रन्थ की सर्वातिशायी विशेषता है। अन्य ग्रन्थों में जहाँ किसी भी उपास्य देवता के एक, दो, चार अथवा कतिपय प्रमुख मन्त्र-यन्त्रों का ही विवेचन उपलब्ध होता है, वहीं इस ग्रन्थ में विवेच्य समस्त देवी-देवताओं के प्रसिद्ध-अप्रसिद्ध सभी मन्त्र-यन्त्रों को उनकी विधियों सहित स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया गया है; फलस्वरूप सम्बद्ध देवता के किसी भी मन्त्र-यन्त्र अथवा उसकी विधि को जानने के लिये साधक को किसी अन्य ग्रन्थ का अवलम्ब ग्रहण करने की लेशमात्र भी आवश्यकता नहीं रह जाती। संक्षेप में कहा जा सकता है कि श्रीविद्यारण्य यति-प्रणीत ‘श्रीविद्यार्णवतन्त्रम्’ एकमात्र ऐसा ग्रन्थ है, जो साधक के समस्त कामनाओं की पूर्ति करने में सर्वतोभावेन समर्थ है। अस्तु; यह ग्रन्थ अद्यावधि अपने मूल स्वरूप में ही, बिना किसी भाषा-टीका के उपलब्ध था, जिससे जिज्ञासु साधकों को आराधना में पग-पग पर दुरूह कठिनाइयों का अनुभव होता था एवं ग्रन्थ के तात्पर्य से अवगत न हो पाने के कारण वे बार-बार संशयग्रस्त हो जाते थे। इसी को हृदयङ्गम कर तन्त्रग्रन्थों के ख्यातिनाम भाषा-भाष्यकार श्री कपिलदेव नारायण ने इस विशालकाय ग्रन्थ को भाषा टीका से अलंकृत कर सर्वसुलभ बनाने का साहसिक प्रयास किया है। पूर्वार्द्ध-उत्तरार्द्ध के विभाजन से दो भागों में विभक्त यह विशालकाय ग्रन्थ भाषा-भाष्य से अलंकृत होने के फलस्वरूप और भी बृहद् कलेवर को प्राप्त हो गया, फलस्वरूप जिज्ञासुओं के सौकर्य को दृष्टिगत कर इसे पाँच भागों (पूर्वार्द्ध–दो भाग एवं उत्तरार्द्ध–तीन भाग) में प्रकाशित किया जा रहा है। विद्वान भाष्यकार श्री कपिलदेवनारायण द्वारा प्रयोगपरक भाषा भाष्य से अलंकृत यह ग्रन्थ जिज्ञासुओं की समस्त जिज्ञासाओं का शमन करने में सर्वविध समर्थ होगा–इसमें विचिकित्सा के लिये लेशमात्र भी स्थान नहीं है।

(सम्पूर्ण पाँच भागों में)

❧ तन्त्रशास्त्र के महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ-मूल संस्कृत एवं हिन्दी टीका सहित ❧

तन्त्रसार : परमहंस मिश्र (1-2 भाग)स्पन्दकारिका : श्यामाकान्त द्विवेदी
कुलार्णवतन्त्रम् : परमहंस मिश्रसर्वोल्लासतन्त्रम् : एस. खण्डेलवाल
नित्योत्सव : (श्रीविद्याविमर्शकभद्रग्रन्थ)<br>परमहंस मिश्रनीलसरस्वतीतन्त्रम् : एस. खण्डेलवाल
त्रिपुरारहस्यम् : (ज्ञान एवं महात्म्य खण्ड)<br>जगदीशचन्द्र मिश्र (1-2 भाग)भूतडामरतन्त्रम् : एस. खण्डेलवाल
तन्त्रालोक : राधेश्याम चतुर्वेदी (1-5 भाग)सिद्धनागार्जुनतन्त्रम् : एस. खण्डेलवाल
स्वच्छन्दतन्त्रं : राधेश्याम चतुर्वेदी (1-2 भाग)अन्नदाकल्पतन्त्रम् : एस. खण्डेलवाल
नेत्रतन्त्रम् : राधेश्याम चतुर्वेदीत्रिपुरार्णवतन्त्रम् : एस. खण्डेलवाल
कामाख्यातन्त्रम् : राधेश्याम चतुर्वेदीविज्ञानभैरव : बापूलाल अंजना
महाकालसंहिता : (कामकला-कालीखण्ड)<br>राधेश्याम चतुर्वेदीश्रीविद्यार्णवतन्त्रम् : कपिलदेवनारायण (1-5 भाग सम्पूर्ण)
महाकालसंहिता : (गुह्यकाली-खण्ड)<br>राधेश्याम चतुर्वेदी (1-5 भाग)देवीरहस्यम् : (रुद्रयामलतन्त्रोक्तम्)<br>कपिलदेवनारायण (1-2 भाग)
रुद्रयामलम् : सुधाकर मालवीय (1-2 भाग)स्वर्णतन्त्र : भाषा टीका
शारदातिलकम्-सुधाकर मालवीय (1-2 भाग)महानिर्वाणतन्त्रम् : कपिलदेवनारायण
मन्त्रमहोदधि : सुधाकर मालवीयबृहत्तन्त्रसार : कपिलदेवनारायण (1-2 भाग)
लक्ष्मीतन्त्रम् : कपिलदेवनारायण (1-2 भाग)सौन्दर्यलहरी : लक्ष्मीधरी टीका सहित<br>सुधाकर मालवीय
तन्त्रराजतन्त्रम्-कपिलदेवनारायण (1-2 भाग)सिद्धसिद्धान्तपद्धति : द्वारकादास शास्त्री
महानिर्वाणतन्त्रम् : कपिलदेवनारायणआगमतत्त्वविलास : एस.एन. खण्डेलवाल (1-4 भाग सम्पूर्ण)
कामकलाविलास : श्यामाकान्त द्विवेदीराधातन्त्रम् : एस.एन. खण्डेलवाल
वरिवस्यारहस्यम् : श्यामाकान्त द्विवेदीसौभाग्यलक्ष्मीतन्त्रम् : एस.एन. खण्डेलवाल

❧ डॉ. श्यामाकान्त द्विवेदी द्वारा हिन्दी में लिखित तन्त्र विषयक महत्त्वपूर्ण शास्त्रीय ग्रन्थ ❧

  • श्रीविद्या-साधना : (श्रीविद्या-उपासना का साङ्गोपाङ्ग शास्त्रीय विवेचन) (1-2 भाग सम्पूर्ण)
  • भारतीय शक्ति-साधना : (शक्ति-विज्ञान: स्वरूप एवं सिद्धान्त का शास्त्रीय विवेचन)
  • ब्रह्मास्त्रविद्या एवं बगलामुखी-साधना : (महाविद्याबगला-उपासना का शास्त्रीय विवेचन)
  • काश्मीर शैवदर्शन एवं स्पन्दशास्त्र : (शिवसूत्र, शक्तिसूत्र एवं स्पन्दसूत्र के सन्दर्भ में)
  • मुद्राविज्ञान एवं साधना : (नित्यकर्म्य एवं तान्त्रिक मुद्राओं का सचित्र एवं शास्त्रीय विवेचन)

श्रीविष्णुमहापुराणम्

(मूल संस्कृत-भावप्रकाशिका हिन्दीटीका श्लोकानुक्रमणिका सहित)

श्री शिवप्रसाद द्विवेदी


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