भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 409

द्व्यशीतितमोऽध्यायः

(हृदयपुष्पम्)

अथातः परं गुह्यं मन्त्रसारसमुद्भवम्।
यैर्व्याप्तिमखिलं सर्वं मन्त्रं वै स चराचरम् ॥१॥

सामान्या सर्वसैवास्ते चराणाङ्कः फलव्याधं समया तु मध्यो-मध्यो निविध्यो-मङ्किक्रो समनीनाम परम परम क्षुरिकास्क फट् ना अयथाना अयन्ताना अपवासि-नोऽपि किंषु महामुखो नामकर्त्तरी। यः फट् सम्पापीडायोगतश्च गायवान् रुचमाश्रि गां गीं गुं पञ्चक्रमेण नाम शलाका। परमेष्ठिनस्यैताध्यायन् प्रेतजिह्वामूलीयूपरम्। दक्षिणा। ततो हरा नाम योगशलाकार्कस्य चरणैताः। फटन्तु मूलजाह्रोषायह्लाङ्ग-ददेशवायव्यादिन्द्ररोचनानाम क्षुरिका। सर्वासां मंगला ह्येषा निरोधिनी नाडीनां चतुष्कला निरञ्जनस्य क्षुरिका सर्वमन्त्रहृदया सर्वान् संक्रामयति। सर्वव्रतैश्च स्यात्प्र-योनामन्त्राणां कर्मणि करोति। लक्षकविंशके क्षुरिका समाप्ताः।

अब मन्त्रसार समुद्भव की परम गुह्य कथा कहते हैं, जिसके द्वारा चराचर सकल मन्त्र व्याप्त हैं। सामान्य इत्यादि कर्त्तरी है। 'यः फट्' इत्यादि शलाका है। 'हरा' नाम इत्यादि क्षुरिका है। सर्वमंगळरूपा नाड़ियों में निवासिनी, निरंजन की चक्षुकला, सर्वमन्त्रों की हृदयरूपा क्षुरिका सभी मन्त्रों में संक्रमण करती है। समस्त व्रतों में प्रयुक्त होकर मन्त्रों का कर्म करती है। बीस लाख में क्षुरिका मन्त्र समाप्त है।

ब्रह्मोवाच
आलयः सर्वभूतानां लयनाल्लिङ्गमुच्यते।
हृदि भावमिदं लिङ्गं सर्वजन्मवतां स्थितम् ॥२॥

ब्रह्मा कहते हैं समस्त प्राणियों की उत्पत्ति तथा विनाश के लिये उसे लिंग कहा जाता है। जो जन्म लाभ करते हैं, उन सबके हृदय में इस प्रकार से लिंग रहता है॥२॥

सदार्चयन्ति विद्वांसो भावपुष्पैर्हृदि स्थितैः।
भावजैः सुमनोभिश्च तमर्चेन्नान्यजैर्बुधैः ॥३॥
ब्रह्माक्षरपदैर्दिद्यैर्जरामरणकारकैः ।
प्रफुल्लपद्मसंस्थाने सुहृद्ये तिष्ठतो मुखे ॥४॥

विद्वान् गण सर्वदा हृदयस्थ भावपुष्पों से अर्चना करते हैं। विज्ञ व्यक्ति भावज पुष्पों से उनकी अर्चना करे; अन्य (वृक्षादि से उत्पन्न) पुष्पों से अर्चना न करे। जरा एवं मरण