साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३९४ | श्रीसाम्बपुराणम्
अनुलोम में हृदय होता है। कर्मभेदिनी क्षुरिका, कर्त्तरी, कवच, घोर शलाकात्रय, अर्गल, शिर, सौम्य स्वकाय निःशिखा तथा परा, प्रतिमास्थित परा—ये आठ शक्तियोनि हैं।।३३-३४।।
पूर्वपश्चिमयोश्चैव दक्षिणोत्तरयोस्तथा।
विदिक्षु चानुपूर्वेण स्वरान् सम्पूजयेत् क्रमात् ॥३५॥
प्रत्यहं यजनं कुर्याद्रात्रौ वापि हि साधकः।
द्रव्याभावे जपेनापि साधयेन् मन्त्रतत्परः ॥३६॥
पूर्व तथा पश्चिम दिक्, दक्षिण तथा उत्तर एवं सभी विदिक् में आनुपूर्वीक स्वर-समूह के द्वारा आनुपूर्वीक क्रमानुरूप स्वरसमूह की सम्यक् पूजा करे। साधक नित्य यजन करे। रात्रि में भी करे। द्रव्य का अभाव होने पर जल से ही मन्त्रतत्पर होकर साधन करना चाहिये।।३५-३६।।
चतुष्कं साधयेन्नित्यमेकैकस्य पृथक्-पृथक्।
क्षुरिकादिशलाकान्तामर्गलां चैव साधकः ॥३७॥
इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे साधनविधिर्नामाकाशीतितमोऽध्यायः
चतुष्क का (चार का) नित्य साधन करना चाहिये। एक-एक का पृथक् भाव से क्षुरिका, कर्त्तरी, कवच, घोर शलाकात्रय का एवं अर्गला का साधन करे।।३७।।
श्री साम्बपुराणोक्त ज्ञानोत्तर में साधनविधि नामक इक्यासीवाँ अध्याय समाप्त