भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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एकाशीतितमोऽध्यायः ३९३

भस्मना सिद्धिमाप्नोति भस्मनिष्ठः सुसाधकः। भास्करस्य व्रतं ह्येतदन्ते ह्युक्तं क्रमागतम्॥२७॥

अपक्व द्रव्य भोजन करके यथालाभ से तुष्ट होकर देही देहसाधन करे। ज्येष्ठ की तप्त बालुका में घृत से लिप्त होकर सृष्टि का जप किया जाता है। जप के अन्त में मन्त्री अष्ट शान्तियुक्त शिव के समान दीप्त हो जाता है। भस्मधारी, भस्मशायी तथा यव का भोजन करके विचरण करे। भस्मनिष्ठ साधक भस्म से सिद्धिलाभ करते हैं। यह है—भास्कर का व्रत। बाकी क्रम से कहा जायेगा॥२५-२७॥

क्रमात्संक्रमणं चैव क्रमाद्विद्वेषतां व्रजेत्। संक्रमेद् देहमाक्षिप्य दृष्ट्वैवं क्रमयेत् परान्॥२८॥ इच्छया विचरेन् मन्त्री व्रतान्ते बीजवर्त्मनि। यदुक्तं मन्त्रकोष्ठे तु तस्मिन् शास्त्रे ह्यनेकशः॥२९॥ कन्दमूलफलं पत्रमस्विन्नं स्विन्नमेव च। अशक्तो विधिरुक्तो यमष्टौ ग्रासानुपानयेत्॥३०॥

क्रम से संक्रमण होता है। क्रम से विद्येश्वरत्व की प्राप्ति होती है। ऐसा देखकर अन्य का अतिक्रमण करे तथा देहत्याग करके (विद्येश्वरत्व में) संक्रमण करे। व्रत के अन्त में बीजवर्त्म में इच्छापूर्वक मन्त्रविचरण करके रहे, जैसा कि मन्त्रकोष्ठ में कहा गया है (उस प्रकार से)। उस शास्त्र में अनेक बार यह बतलाया गया है। भोजन में कन्द-मूल-फल-कच्चे पत्ते अथवा सूखे पत्ते ग्रहण करे। ऐसा करने में असमर्थ होने पर आठ ग्रास ग्रहण करना चाहिये॥२८-३०॥

भक्ष्यं वा विधिसम्पन्नं मन्त्रे सम्मानवर्जितम्। पावकं विधिवत्सिद्धं कुर्य्यान् मन्त्रस्य साधने॥३१॥ पूजामन्त्रस्य वै मन्त्री संवत्सरतनुस्थितैः। व्योमस्थं वा तथाग्निस्थं कुर्यात् पूर्वं यमेन वै॥३२॥

अथवा विधिसम्मत पानवर्जित भिक्षाद्रव्य मन्त्रों से ग्रहण करना चाहिये। मन्त्र के साधनार्थ यथाविधि अग्नि सिद्धि करे। जैसे पूर्व में यम ने व्योमस्थ अथवा अग्निस्थ मन्त्र का साधन किया था, वैसे ही संवत्सर तनुस्थित मन्त्रों द्वारा मन्त्री पूजामन्त्र की साधना करे॥३१-३२॥

अनुलोमाद्वयं स्यात् क्षुरिका कर्मभेदिनी। कर्त्तरीकवचं, घोरं शलाकात्रय एव च॥३३॥ अर्गलास्तु शिरः सौम्यः स्वाकायो निःशिखा पराः। प्रतिमास्थाः परा एता ह्यष्टौ ताः शक्तियोनयः॥३४॥