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साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 406, कुल 424 में से

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पृष्ठ 406

३९२ श्रीसाम्बपुराणम्

तत्सर्वं साधयेत्तूर्णं यदुक्तं कल्पकल्पकैः।
न च शक्तिपरीचारे मन्त्रान्ते क्रमशस्ततः ॥१९॥

यहाँ अल्प विधान का वर्णन किया गया हैं। अन्यान्य तन्त्रों में (विस्तार में) इनका वर्णन है। यथाविधि प्रयुक्त होने पर इनसे सिद्धि मिलती है। रसविहीन अथवा बाह्य बीज सर्वकार्य में युक्त करे। व्योमस्थ अथवा पृथिवीगत मन्त्र का शीघ्र साधन करे; जैसा कि कल्प-कल्प में (विधि में) कहा गया है। किन्तु शक्ति-परिचार में शीघ्रता न करे। मन्त्रान्त में क्रमशः करना होगा।।१७-१९।।

मन्त्रसम्पुटयोगेन साधयेच्च शलाकया।
शक्रं तु कमले योगस्पर्शैः शक्तिं निरावृत्तम् ॥२०॥

मन्त्रसम्पुट योग में शलाका से साधना करनी चाहिये। इन्द्र की साधना कमल से करे। योग स्पर्श से शक्ति निरावृत हो जाती है।।२०।।

क्षुरिकाकर्त्तरीयुक्ता दक्षिणा निर्वाणमावहेत्।
अग्निपञ्चकयोगान्ते लिङ्गे वै स्थण्डिलेऽथवा ॥२१॥
लक्षत्रयस्य वै योगात् साधयेत् परमेष्ठिनम्।
शिलातले तु वै श्रेष्ठः क्रियाकारणसाधकः ॥२२॥

क्षुरिका तथा कर्त्तरीयुक्त दक्षिणा (दक्षिणकाली) निर्वाण प्रदान करती है। पञ्चाग्नि योग के अन्त में लिंग अथवा स्थण्डिल में तीन लाख के योग से (आहुति से) परमेष्ठि-साधन करे। क्रिया करने में साधक श्रेष्ठ शिलातल पर साधना करे।।२१-२२।।

आदित्यस्य निमित्तात्स्यात्साधनमुन्मिलोक्षिकम्।
भूतेशं निशि वा घोरे वायुभक्षो जलाधितः ॥२३॥
साधयेत् साधनायुक्तो देहे मन्त्री च वै क्षणात्।
बीजेश्वर्या सर्वैव श्मशानभक्ष्यभोजनः ॥२४॥

आदित्य का साधन होता है उन्मीलोक्षिक (उन्मीलित आँखों से) अथवा घोर निशा के समय वायुभक्षी होकर अथवा जल पीकर भूतेश का साधन करे। साधनायुक्त होने पर साधक के शरीर में तत्काल ही समस्त श्रेष्ठ बीजों की विद्यमानता हो जाती है। श्मशान में भक्ष्य भोजन करना चाहिये।।२३-२४।।

अपक्वाशी लब्धप्रभुर्देही देहस्य साधने।
अशीतसिकता ज्येष्ठे जपेत् सृष्टिं घृतप्लुतः ॥२५॥
जपान्ते दीपयेन्मन्त्री दृष्टशान्तिर्यथा शिवः।
चरित्वा भस्मचर्यञ्च भस्मशायी यवाशनः ॥२६॥

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