भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 405, कुल 424 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 405

एकाशीतितमोऽध्यायः ३९१

आसने क्षुरिकां दत्त्वा ततो मन्त्रं प्रयोजयेत् ।
शलाका पूजने योज्या दत्त्वा चैवानुकर्तरी ॥९॥
अग्नेरर्चाविधानेषु दीपने चाभिषेचने ।
जपेत्तथा वै ध्यानेषु मन्त्रे च परमो विधिः ॥१०॥
शमी बिल्वपलाशं च तथा दूर्वासितास्तिलाः ।
दर्भा सुमनसां चैव गणाः स्याच्छान्तिकर्मणि ॥११॥

आसन में क्षुरिका देकर तब मन्त्रों का प्रयोग करे। शलाका-पूजन में अनुकर्तरी से योग करे। अग्नि के पूजाविधान, दीपन तथा अभिषेक के विषय में जप करना चाहिये। इसी प्रकार ध्यान तथा मन्त्र में भी यह श्रेष्ठ विधि है। शमी, बिल्व, पलाश की लकड़ी, दूर्वा, काला तिल, कुश एवं पुष्प शान्ति कर्म में प्रशस्त हैं॥९-११॥

योज्या क्षीरेण च तथाप्यापुष्पवृक्षयोनयः ।
अवृक्षः किंशुकॊ वृक्षो नित्यमेव धनप्रदः ॥१२॥
करवीरो कनकश्चैव कलक्षेत्रं च दायकः ।
प्रियङ्गुलोध्रपुष्पं च मृत्योस्तैलविपास्यता ॥१३॥

इन सबों से दुग्ध का योग करना चाहिये। ऐसे ही अपुष्प वृक्षयोनि, अवृक्ष, किंजल्क वृक्ष—ये सब नित्य धन देने वाले हैं। कनेर, कनक (धतूरा), कलक्षेत्र, दायक, प्रियंगु तथा लोध्र के पुष्प की (आहुति द्वारा) मृत्यु से रक्षा हो जाती है॥१२-१३॥

शतपुष्पाणि बीजानि लवणं मांसमेव च ।
मल्लिकादिजपैः सर्वैः योज्यः स्याद्धोमकर्मणि ॥१४॥
काकोलूकस्य पक्षाणि येषां द्वे पञ्च सर्वदा ।
द्वन्द्वानान्तु तथा तेषां मृगजैर्द्धे वनान्तरम् ॥१५॥
विभीतकः खादिरश्च सहचरो वासकस्तथा ।
विद्वेषे तु तथा क्रूरे इत्थं तूच्चाटनेषु च ॥१६॥

शतपुष्प, बीज, नमक, मांस, मल्लिकादि पुष्प, सभी प्रकार का जवापुष्प होमकर्म में युक्त करे। काक तथा उलूक के पंख तथा ऐसे सभी प्राणी, जिनमें परस्पर में द्वेष विपरीतता चलती है, ऐसे मृगज (पशु जैसे—मृग-व्याघ्र), विभीतक एवं खदिर, सहचर तथा वासक का विद्वेष कार्य में व्यवहार करे॥१४-१६॥

उक्ताः स्वल्पविधानेषु परतन्त्रेषु ये च वै ।
सर्वे तेनैव सिध्यन्ति विधियुक्तोदितैः परैः ॥१७॥
अरसा बाह्यबीजा वा योज्याश्च सर्वकर्मणि ।
दृष्ट्वा तु विधिना मन्त्रं व्योमस्थं वा महीगतम् ॥१८॥